Ar-Rahmaan
अर-रहमान
दयावान
بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَـٰنِ ٱلرَّحِیمِ
बिस्मि अल्लाह अर-रहमान अर-रहीम
- 1 ٱلرَّحۡمَـٰنُ
अर-रहमान
बड़ा मेहरबान (ख़ुदा)
- 2 عَلَّمَ ٱلۡقُرۡءَانَ
अल्लामा कुरान
उसी ने क़ुरान की तालीम फरमाई
- 3 خَلَقَ ٱلۡإِنسَـٰنَ
ख़लक़ अल-इंसान
उसी ने इन्सान को पैदा किया
- 4 عَلَّمَهُ ٱلۡبَیَانَ
अल्लामाहु अल बयाना
उसी ने उनको (अपना मतलब) बयान करना सिखाया
- 5 ٱلشَّمۡسُ وَٱلۡقَمَرُ بِحُسۡبَانࣲ
अश-शम्सु वल-कमरु बेहुस्बान
सूरज और चाँद एक मुक़र्रर हिसाब से चल रहे हैं
- 6 وَٱلنَّجۡمُ وَٱلشَّجَرُ یَسۡجُدَانِ
वन-नज्मु वल अश्शजरु यस्जुदानि
और बूटियाँ बेलें, और दरख्त (उसी को) सजदा करते हैं
- 7 وَٱلسَّمَاۤءَ رَفَعَهَا وَوَضَعَ ٱلۡمِیزَانَ
वल-समा रफ़ाहा वोवज़ा अल-मीज़ान
और उसी ने आसमान बुलन्द किया और तराजू (इन्साफ) को क़ायम किया
- 8 أَلَّا تَطۡغَوۡا۟ فِی ٱلۡمِیزَانِ
अल्ला तात़्ग़ोवा फ़े अल-मीज़ान
ताकि तुम लोग तराज़ू (से तौलने) में हद से तजाउज़ न करो
- 9 وَأَقِیمُوا۟ ٱلۡوَزۡنَ بِٱلۡقِسۡطِ وَلَا تُخۡسِرُوا۟ ٱلۡمِیزَانَ
वा कीमू अल-वज़्न तोख़्सिरु अल-मीज़ान
और ईन्साफ के साथ ठीक तौलो और तौल कम न करो
- 10 وَٱلۡأَرۡضَ وَضَعَهَا لِلۡأَنَامِ
वल अर्द वदअहा लिल अनामि
और उसी ने लोगों के नफे क़े लिए ज़मीन बनायी
- 11 فِیهَا فَـٰكِهَةࣱ وَٱلنَّخۡلُ ذَاتُ ٱلۡأَكۡمَامِ
फ़िहा फ़ाकिता वल नख्लु ज़ात अल-अक्मामि
कि उसमें मेवे और खजूर के दरख्त हैं जिसके ख़ोशों में ग़िलाफ़ होते हैं
- 12 وَٱلۡحَبُّ ذُو ٱلۡعَصۡفِ وَٱلرَّیۡحَانُ
वल्हब्बु ज़ु अल-अस्फ़ि वर रैहान
और अनाज जिसके साथ भुस होता है और ख़ुशबूदार फूल
- 13 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो (ऐ गिरोह जिन व इन्स) तुम दोनों अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमतों को न मानोगे
- 14 خَلَقَ ٱلۡإِنسَـٰنَ مِن صَلۡصَـٰلࣲ كَٱلۡفَخَّارِ
ख़लक़ अल-इंसान मिन सलसल कल्फख़ारी
उसी ने इन्सान को ठीकरे की तरह खन खनाती हुई मिटटी से पैदा किया
- 15 وَخَلَقَ ٱلۡجَاۤنَّ مِن مَّارِجࣲ مِّن نَّارࣲ
वा-ख़लक़ अल-जन्ना मिन मारिज मिन नार
और उसी ने जिन्नात को आग के शोले से पैदा किया
- 16 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो (ऐ गिरोह जिन व इन्स) तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमतों से मुकरोगे
- 17 رَبُّ ٱلۡمَشۡرِقَیۡنِ وَرَبُّ ٱلۡمَغۡرِبَیۡنِ
रब्बु अल-मशरिकैन व रब्बु अल-मग़रिबैन
वही जाड़े गर्मी के दोनों मशरिकों का मालिक है और दोनों मग़रिबों का (भी) मालिक है
- 18 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो (ऐ जिनों) और (आदमियों) तुम अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे
- 19 مَرَجَ ٱلۡبَحۡرَیۡنِ یَلۡتَقِیَانِ
मारजा अल-बहरैन यल्तिकियान
उसी ने दरिया बहाए जो बाहम मिल जाते हैं
- 20 بَیۡنَهُمَا بَرۡزَخࣱ لَّا یَبۡغِیَانِ
बय्नहुमा बरज़ख़ ला यब्गियानि
दो के दरमियान एक हद्दे फ़ासिल (आड़) है जिससे तजाउज़ नहीं कर सकते
- 21 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो (ऐ जिन व इन्स) तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत को झुठलाओगे
- 22 یَخۡرُجُ مِنۡهُمَا ٱللُّؤۡلُؤُ وَٱلۡمَرۡجَانُ
यख़्रुजु मिन्हुमा अलुलुलु वल-मरजानु
इन दोनों दरियाओं से मोती और मूँगे निकलते हैं
- 23 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
(तो जिन व इन्स) तुम दोनों अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमत को न मानोगे
- 24 وَلَهُ ٱلۡجَوَارِ ٱلۡمُنشَـَٔاتُ فِی ٱلۡبَحۡرِ كَٱلۡأَعۡلَـٰمِ
वल्लाहु अल-जवारि अल-मुन्शिआतु फ़े अल-बह्रि कालआलामि
और जहाज़ जो दरिया में पहाड़ों की तरह ऊँचे खड़े रहते हैं उसी के हैं
- 25 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो (ऐ जिन व इन्स) तुम अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत को झुठलाओगे
- 26 كُلُّ مَنۡ عَلَیۡهَا فَانࣲ
कुल्लु अलय्हा फ़ान
जो (मख़लूक) ज़मीन पर है सब फ़ना होने वाली है
- 27 وَیَبۡقَىٰ وَجۡهُ رَبِّكَ ذُو ٱلۡجَلَـٰلِ وَٱلۡإِكۡرَامِ
वयबका वज्हु रब्बिक ज़ु अल जलाली वल-इकराम
और सिर्फ तुम्हारे परवरदिगार की ज़ात जो अज़मत और करामत वाली है बाक़ी रहेगी
- 28 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे
- 29 یَسۡـَٔلُهُۥ مَن فِی ٱلسَّمَـٰوَ ٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۚ كُلَّ یَوۡمٍ هُوَ فِی شَأۡنࣲ
यसअलुहु मैन फ़े अस-समावा विश्वास ते कुल्ला यौम हुव फ़े
और जितने लोग सारे आसमान व ज़मीन में हैं (सब) उसी से माँगते हैं वह हर रोज़ (हर वक्त) मख़लूक के एक न एक काम में है
- 30 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो तुम दोनों अपने सरपरस्त की कौन कौन सी नेअमत से मुकरोगे
- 31 سَنَفۡرُغُ لَكُمۡ أَیُّهَ ٱلثَّقَلَانِ
सानफ़रुग़ु लकुम अय्यह अस-सक़लानी
(ऐ दोनों गिरोहों) हम अनक़रीब ही तुम्हारी तरफ मुतावज्जे होंगे
- 32 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो तुम दोनों अपने पालने वाले की किस किस नेअमत को न मानोगे
- 33 یَـٰمَعۡشَرَ ٱلۡجِنِّ وَٱلۡإِنسِ إِنِ ٱسۡتَطَعۡتُمۡ أَن تَنفُذُوا۟ مِنۡ أَقۡطَارِ ٱلسَّمَـٰوَ ٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ فَٱنفُذُوا۟ۚ لَا تَنفُذُونَ إِلَّا بِسُلۡطَـٰنࣲ
या मशर अल-जिन्न वल-इन्स इनि इस्तताउतुम अन तनफ़ुज़ू अक़्तारि अस-समावा विश्वास ते वल अर्दि फानफुज़ू तनफ़ुज़ून इल्ला बिसुल्तान
ऐ गिरोह जिन व इन्स अगर तुममें क़ुदरत है कि आसमानों और ज़मीन के किनारों से (होकर कहीं) निकल (कर मौत या अज़ाब से भाग) सको तो निकल जाओ (मगर) तुम तो बग़ैर क़ूवत और ग़लबे के निकल ही नहीं सकते (हालॉ कि तुममें न क़ूवत है और न ही ग़लबा)
- 34 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो तुम अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत को झुठलाओगे
- 35 یُرۡسَلُ عَلَیۡكُمَا شُوَاظࣱ مِّن نَّارࣲ وَنُحَاسࣱ فَلَا تَنتَصِرَانِ
युर्सलु अलैकुमा शुआज़ मिन नार वनुहास फ़ला तन्तसिरन
(गुनाहगार जिनों और आदमियों जहन्नुम में) तुम दोनो पर आग का सब्ज़ शोला और सियाह धुऑं छोड़ दिया जाएगा तो तुम दोनों (किस तरह) रोक नहीं सकोगे
- 36 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
फिर तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे
- 37 فَإِذَا ٱنشَقَّتِ ٱلسَّمَاۤءُ فَكَانَتۡ وَرۡدَةࣰ كَٱلدِّهَانِ
फ़ैज़ा इन्शक्कति अस-समाउ फ़कानत वर्दा कल धान
फिर जब आसमान फट कर (क़यामत में) तेल की तरह लाल हो जाऐगा
- 38 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से मुकरोगे
- 39 فَیَوۡمَىِٕذࣲ لَّا یُسۡـَٔلُ عَن ذَنۢبِهِۦۤ إِنسࣱ وَلَا جَاۤنࣱّ
फ़यौमिज़ ला युसअलु अन ज़न्बिही इन्स जान
तो उस दिन न तो किसी इन्सान से उसके गुनाह के बारे में पूछा जाएगा न किसी जिन से
- 40 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत को न मानोगे
- 41 یُعۡرَفُ ٱلۡمُجۡرِمُونَ بِسِیمَـٰهُمۡ فَیُؤۡخَذُ بِٱلنَّوَ ٰصِی وَٱلۡأَقۡدَامِ
यू'रफ़ु अल-मुज-रि-मू-ना बेसिमाहुम फयुओख़ज़ु बिलनवा विश्वास से वल अक़्दाम
गुनाहगार लोग तो अपने चेहरों ही से पहचान लिए जाएँगे तो पेशानी के पटटे और पाँव पकड़े (जहन्नुम में डाल दिये जाएँगे)
- 42 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
आख़िर तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे
- 43 هَـٰذِهِۦ جَهَنَّمُ ٱلَّتِی یُكَذِّبُ بِهَا ٱلۡمُجۡرِمُونَ
हाज़िही अल-लाती युकज़्ज़िबु बेहा अल-मुज-रि-मू-ना
(फिर उनसे कहा जाएगा) यही वह जहन्नुम है जिसे गुनाहगार लोग झुठलाया करते थे
- 44 یَطُوفُونَ بَیۡنَهَا وَبَیۡنَ حَمِیمٍ ءَانࣲ
यातूफूना बयना वबैन हमीम अन
ये लोग दोज़ख़ और हद दरजा खौलते हुए पानी के दरमियान (बेक़रार दौड़ते) चक्कर लगाते फिरेंगे
- 45 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत को न मानोगे
- 46 وَلِمَنۡ خَافَ مَقَامَ رَبِّهِۦ جَنَّتَانِ
ख़ाफ़ मक़ाम जन्नतानि
और जो शख्स अपने परवरदिगार के सामने खड़े होने से डरता रहा उसके लिए दो दो बाग़ हैं
- 47 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमत से इन्कार करोगे
- 48 ذَوَاتَاۤ أَفۡنَانࣲ
ज़वाता अफ़्नान
दोनों बाग़ (दरख्तों की) टहनियों से हरे भरे (मेवों से लदे) हुए
- 49 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
फिर दोनों अपने सरपरस्त की किस किस नेअमतों को झुठलाओगे
- 50 فِیهِمَا عَیۡنَانِ تَجۡرِیَانِ
फ़ेहिमा ऐनयान तज्रियानी
इन दोनों में दो चश्में जारी होंगें
- 51 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से मुकरोगे
- 52 فِیهِمَا مِن كُلِّ فَـٰكِهَةࣲ زَوۡجَانِ
फ़ेहिमा मिन कुल्लि ज़ौजानी
इन दोनों बाग़ों में सब मेवे दो दो किस्म के होंगे
- 53 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे
- 54 مُتَّكِـِٔینَ عَلَىٰ فُرُشِۭ بَطَاۤىِٕنُهَا مِنۡ إِسۡتَبۡرَقࣲۚ وَجَنَى ٱلۡجَنَّتَیۡنِ دَانࣲ
मुत्तकीना अला फ़ुरोश बताइनुहा इस्ताबराक़ वजनाई अल-जन्नतय्नि दान
यह लोग उन फ़र्शों पर जिनके असतर अतलस के होंगे तकिये लगाकर बैठे होंगे तो दोनों बाग़ों के मेवे (इस क़दर) क़रीब होंगे (कि अगर चाहे तो लगे हुए खालें)
- 55 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत को न मानोगे
- 56 فِیهِنَّ قَـٰصِرَ ٰتُ ٱلطَّرۡفِ لَمۡ یَطۡمِثۡهُنَّ إِنسࣱ قَبۡلَهُمۡ وَلَا جَاۤنࣱّ
फ़ेहिन्न क़ासिर विश्वास त अल-तर्फ़ि लम यत्मिथुन्न इन्स क़बलहुम जान
इसमें (पाक दामन ग़ैर की तरफ ऑंख उठा कर न देखने वाली औरतें होंगी जिनको उन से पहले न किसी इन्सान ने हाथ लगाया होगा) और जिन ने
- 57 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किन किन नेअमतों को झुठलाओगे
- 58 كَأَنَّهُنَّ ٱلۡیَاقُوتُ وَٱلۡمَرۡجَانُ
काअन्नाहुन्ना अल याक़ूत वल-मरजानु
(ऐसी हसीन) गोया वह (मुजस्सिम) याक़ूत व मूँगे हैं
- 59 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किन किन नेअमतों से मुकरोगे
- 60 هَلۡ جَزَاۤءُ ٱلۡإِحۡسَـٰنِ إِلَّا ٱلۡإِحۡسَـٰنُ
हल जज़ाउ अल-इह्सानि इल्ला अल-इह्सानु
भला नेकी का बदला नेकी के सिवा कुछ और भी है
- 61 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
फिर तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत को झुठलाओगे
- 62 وَمِن دُونِهِمَا جَنَّتَانِ
वमेन दुनेहेमा जन्नतानि
उन दोनों बाग़ों के अलावा दो बाग़ और हैं
- 63 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो तुम दोनों अपने पालने वाले की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे
- 64 مُدۡهَاۤمَّتَانِ
मुद्हाम्मातानी
दोनों निहायत गहरे सब्ज़ व शादाब
- 65 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो तुम दोनों अपने सरपरस्त की किन किन नेअमतों को न मानोगे
- 66 فِیهِمَا عَیۡنَانِ نَضَّاخَتَانِ
फ़ेहिमा ऐनयान नज़्ख़ातानी
उन दोनों बाग़ों में दो चश्में जोश मारते होंगे
- 67 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से मुकरोगे
- 68 فِیهِمَا فَـٰكِهَةࣱ وَنَخۡلࣱ وَرُمَّانࣱ
फ़ेहिमा फ़ाकिता वेनख्लु वुरमान
उन दोनों में मेवें हैं खुरमें और अनार
- 69 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो तुम दोनों अपने मालिक की किन किन नेअमतों को झुठलाओगे
- 70 فِیهِنَّ خَیۡرَ ٰتٌ حِسَانࣱ
फ़ेहिन्न ख़ैर विश्वास तु हिसां
उन बाग़ों में ख़ुश ख़ुल्क और ख़ूबसूरत औरतें होंगी
- 71 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
तो तुम दोनों अपने मालिक की किन किन नेअमतों को झुठलाओगे
- 72 حُورࣱ مَّقۡصُورَ ٰتࣱ فِی ٱلۡخِیَامِ
हूर मक़्सूर विश्वास फ़े अल-ख़ियाम
वह हूरें हैं जो ख़ेमों में छुपी बैठी हैं
- 73 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
फिर तुम दोनों अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमत से इन्कार करोगे
- 74 لَمۡ یَطۡمِثۡهُنَّ إِنسࣱ قَبۡلَهُمۡ وَلَا جَاۤنࣱّ
लम यत्मिथुन्न इन्स क़बलहुम जान
उनसे पहले उनको किसी इन्सान ने उनको छुआ तक नहीं और न जिन ने
- 75 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
फिर तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत से मुकरोगे
- 76 مُتَّكِـِٔینَ عَلَىٰ رَفۡرَفٍ خُضۡرࣲ وَعَبۡقَرِیٍّ حِسَانࣲ
मुत्तकीना अला रफ़रफ़िन वा अब्करिय्यिन
ये लोग सब्ज़ कालीनों और नफीस व हसीन मसनदों पर तकिए लगाए (बैठे) होंगे
- 77 فَبِأَیِّ ءَالَاۤءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फ़बैय्यि अलाइ रब्बीकुमा तुकज़्ज़िबानी
फिर तुम अपने परवरदिगार की किन किन नेअमतों से इन्कार करोगे
- 78 تَبَـٰرَكَ ٱسۡمُ رَبِّكَ ذِی ٱلۡجَلَـٰلِ وَٱلۡإِكۡرَامِ
तबारका इस्मु रब्बिक ज़ी अल जलाली वल-इकराम
(ऐ रसूल) तुम्हारा परवरदिगार जो साहिबे जलाल व करामत है उसी का नाम बड़ा बाबरकत है
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