Al-Qamar
अल-क़मर
चाँद
بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَـٰنِ ٱلرَّحِیمِ
बिस्मि अल्लाह अर-रहमान अर-रहीम
- 1 ٱقۡتَرَبَتِ ٱلسَّاعَةُ وَٱنشَقَّ ٱلۡقَمَرُ
इक़्तरबत अस-साआ वान शिक़्क़ा अल-क़मरु
क़यामत क़रीब आ गयी और चाँद दो टुकड़े हो गया
- 2 وَإِن یَرَوۡا۟ ءَایَةࣰ یُعۡرِضُوا۟ وَیَقُولُوا۟ سِحۡرࣱ مُّسۡتَمِرࣱّ
वा-इन यारो आयत युरिफ़ु वा यक़ूलू सेहर मुस्तमिर
और अगर ये कुफ्फ़ार कोई मौजिज़ा देखते हैं, तो मुँह फेर लेते हैं, और कहते हैं कि ये तो बड़ा ज़बरदस्त जादू है
- 3 وَكَذَّبُوا۟ وَٱتَّبَعُوۤا۟ أَهۡوَاۤءَهُمۡۚ وَكُلُّ أَمۡرࣲ مُّسۡتَقِرࣱّ
व कज़़्ज़़ाबू अहवाहुम वा कुल्लु अम्र मुस्तकिर्र
और उन लोगों ने झुठलाया और अपनी नफ़सियानी ख्वाहिशों की पैरवी की, और हर काम का वक्त मुक़र्रर है
- 4 وَلَقَدۡ جَاۤءَهُم مِّنَ ٱلۡأَنۢبَاۤءِ مَا فِیهِ مُزۡدَجَرٌ
व-लक्द जाआहुम मिन अल-अन्बा फ़िये मुज़्झर
और उनके पास तो वह हालात पहुँच चुके हैं जिनमें काफी तम्बीह थीं
- 5 حِكۡمَةُۢ بَـٰلِغَةࣱۖ فَمَا تُغۡنِ ٱلنُّذُرُ
हिक्मह बालिगाह फ़मा तुग्नि अन-नुज़ुर
और इन्तेहा दर्जे की दानाई मगर (उनको तो) डराना कुछ फ़ायदा नहीं देता
- 6 فَتَوَلَّ عَنۡهُمۡۘ یَوۡمَ یَدۡعُ ٱلدَّاعِ إِلَىٰ شَیۡءࣲ نُّكُرٍ
फ़तवल्ला यौम यदउ अद-दाइ इला शै नुकुर
तो (ऐ रसूल) तुम भी उनसे किनाराकश रहो, जिस दिन एक बुलाने वाला (इसराफ़ील) एक अजनबी और नागवार चीज़ की तरफ़ बुलाएगा
- 7 خُشَّعًا أَبۡصَـٰرُهُمۡ یَخۡرُجُونَ مِنَ ٱلۡأَجۡدَاثِ كَأَنَّهُمۡ جَرَادࣱ مُّنتَشِرࣱ
ख़ोश्अन अब्सारुहुम यख़रुजून मिन अल-अज-दास काअन्नाहुम जराद मुंतशिर
तो (निदामत से) ऑंखें नीचे किए हुए कब्रों से निकल पड़ेंगे गोया वह फैली हुई टिड्डियाँ हैं
- 8 مُّهۡطِعِینَ إِلَى ٱلدَّاعِۖ یَقُولُ ٱلۡكَـٰفِرُونَ هَـٰذَا یَوۡمٌ عَسِرࣱ
मुहतिईन इला यकूलु अल-काफिरून हाज़ा यौम असिर
(और) बुलाने वाले की तरफ गर्दनें बढ़ाए दौड़ते जाते होंगे, कुफ्फ़ार कहेंगे ये तो बड़ा सख्त दिन है
- 9 ۞ كَذَّبَتۡ قَبۡلَهُمۡ قَوۡمُ نُوحࣲ فَكَذَّبُوا۟ عَبۡدَنَا وَقَالُوا۟ مَجۡنُونࣱ وَٱزۡدُجِرَ
कज़़्ज़़बत क़बलहुम क़ौम फकज़्दू अब्दना व क़ालू मजनून वज़्ज़िरा
इनसे पहले नूह की क़ौम ने भी झुठलाया था, तो उन्होने हमारे (ख़ास) बन्दे (नूह) को झुठलाया, और कहने लगे ये तो दीवाना है
- 10 فَدَعَا رَبَّهُۥۤ أَنِّی مَغۡلُوبࣱ فَٱنتَصِرۡ
फदआ अन्नी मग़्लुब फ़ान्तासिर
और उनको झिड़कियाँ भी दी गयीं, तो उन्होंने अपने परवरदिगार से दुआ की कि (बारे इलाहा मैं) इनके मुक़ाबले में कमज़ोर हूँ
- 11 فَفَتَحۡنَاۤ أَبۡوَ ٰبَ ٱلسَّمَاۤءِ بِمَاۤءࣲ مُّنۡهَمِرࣲ
फ़फ़ेतहना अबू विश्वास बा अस-समा बिमा मुन्हमिर
तो अब तू ही (इनसे) बदला ले तो हमने मूसलाधार पानी से आसमान के दरवाज़े खोल दिए
- 12 وَفَجَّرۡنَا ٱلۡأَرۡضَ عُیُونࣰا فَٱلۡتَقَى ٱلۡمَاۤءُ عَلَىٰۤ أَمۡرࣲ قَدۡ قُدِرَ
वफज्जर्ना अल-अर्द उयूनन फ़ाल्ताकी अल-मा अम्र क़द कुदिर
और ज़मीन से चश्में जारी कर दिए, तो एक काम के लिए जो मुक़र्रर हो चुका था (दोनों) पानी मिलकर एक हो गया
- 13 وَحَمَلۡنَـٰهُ عَلَىٰ ذَاتِ أَلۡوَ ٰحࣲ وَدُسُرࣲ
वहमलनाहु अला ज़ात अल-वा विश्वास हिन वदुसुर
और हमने एक कश्ती पर जो तख्तों और कीलों से तैयार की गयी थी सवार किया
- 14 تَجۡرِی بِأَعۡیُنِنَا جَزَاۤءࣰ لِّمَن كَانَ كُفِرَ
तजरी बे आयुनिना जज़ा लिमेन काना कुफ़िरा
और वह हमारी निगरानी में चल रही थी (ये) उस शख़्श (नूह) का बदला लेने के लिए जिसको लोग न मानते थे
- 15 وَلَقَد تَّرَكۡنَـٰهَاۤ ءَایَةࣰ فَهَلۡ مِن مُّدَّكِرࣲ
तर्कनाहा आयत फहल मिन मुद्दाकिर
और हमने उसको एक इबरत बना कर छोड़ा तो कोई है जो इबरत हासिल करे
- 16 فَكَیۡفَ كَانَ عَذَابِی وَنُذُرِ
फकयफ काना अज़ाबी वनुज़ुर
तो (उनको) मेरा अज़ाब और डराना कैसा था
- 17 وَلَقَدۡ یَسَّرۡنَا ٱلۡقُرۡءَانَ لِلذِّكۡرِ فَهَلۡ مِن مُّدَّكِرࣲ
व-लक्द यस्सर्ना कुरान लिल-ज़िक्रि फहल मिन मुद्दाकिर
और हमने तो क़ुरान को नसीहत हासिल करने के वास्ते आसान कर दिया है तो कोई है जो नसीहत हासिल करे
- 18 كَذَّبَتۡ عَادࣱ فَكَیۡفَ كَانَ عَذَابِی وَنُذُرِ
कज़़्ज़़बत अद फकयफ काना अज़ाबी वनुज़ुर
आद (की क़ौम ने) (अपने पैग़म्बर) को झुठलाया तो (उनका) मेरा अज़ाब और डराना कैसा था,
- 19 إِنَّاۤ أَرۡسَلۡنَا عَلَیۡهِمۡ رِیحࣰا صَرۡصَرࣰا فِی یَوۡمِ نَحۡسࣲ مُّسۡتَمِرࣲّ
इन्ना अलैहिम रेहान सर्सरन फ़े यौम नह्स
हमने उन पर बहुत सख्त मनहूस दिन में बड़े ज़न्नाटे की ऑंधी चलायी
- 20 تَنزِعُ ٱلنَّاسَ كَأَنَّهُمۡ أَعۡجَازُ نَخۡلࣲ مُّنقَعِرࣲ
तंज़िउ अन-नास काअन्नाहुम अअज़ाज़ नख्ल मुन्काइर
जो लोगों को (अपनी जगह से) इस तरह उखाड़ फेकती थी गोया वह उखड़े हुए खजूर के तने हैं
- 21 فَكَیۡفَ كَانَ عَذَابِی وَنُذُرِ
फकयफ काना अज़ाबी वनुज़ुर
तो (उनको) मेरा अज़ाब और डराना कैसा था
- 22 وَلَقَدۡ یَسَّرۡنَا ٱلۡقُرۡءَانَ لِلذِّكۡرِ فَهَلۡ مِن مُّدَّكِرࣲ
व-लक्द यस्सर्ना कुरान लिल-ज़िक्रि फहल मिन मुद्दाकिर
और हमने तो क़ुरान को नसीहत हासिल करने के वास्ते आसान कर दिया, तो कोई है जो नसीहत हासिल करे
- 23 كَذَّبَتۡ ثَمُودُ بِٱلنُّذُرِ
कज़़्ज़़बत थमूदु बिल्नुज़ुरि
(क़ौम) समूद ने डराने वाले (पैग़म्बरों) को झुठलाया
- 24 فَقَالُوۤا۟ أَبَشَرࣰا مِّنَّا وَ ٰحِدࣰا نَّتَّبِعُهُۥۤ إِنَّاۤ إِذࣰا لَّفِی ضَلَـٰلࣲ وَسُعُرٍ
फ़कालू अबशरन मिन्ना और विश्वास हेदन नत्ताबिहु इन्ना इज़ा लाफ़ी ज़लालीन वसुर
तो कहने लगे कि भला एक आदमी की जो हम ही में से हो उसकी पैरवीं करें ऐसा करें तो गुमराही और दीवानगी में पड़ गए
- 25 أَءُلۡقِیَ ٱلذِّكۡرُ عَلَیۡهِ مِنۢ بَیۡنِنَا بَلۡ هُوَ كَذَّابٌ أَشِرࣱ
अ उल्किय अज़-ज़िक्र अलय्हि बय्निना हुव कज़्ज़ाबुन अशिर
क्या हम सबमें बस उसी पर वही नाज़िल हुई है (नहीं) बल्कि ये तो बड़ा झूठा तअल्ली करने वाला है
- 26 سَیَعۡلَمُونَ غَدࣰا مَّنِ ٱلۡكَذَّابُ ٱلۡأَشِرُ
सायलमून ग़दन मन-इ अल-कज़्ज़ाब अल-अशिरु
उनको अनक़रीब कल ही मालूम हो जाएगा कि कौन बड़ा झूठा तकब्बुर करने वाला है
- 27 إِنَّا مُرۡسِلُوا۟ ٱلنَّاقَةِ فِتۡنَةࣰ لَّهُمۡ فَٱرۡتَقِبۡهُمۡ وَٱصۡطَبِرۡ
मुर्सिलुआ अन-नासति फितना ल्लाहुम फ़ारताकिब्हुम वसबिर
(ऐ सालेह) हम उनकी आज़माइश के लिए ऊँटनी भेजने वाले हैं तो तुम उनको देखते रहो और (थोड़ा) सब्र करो
- 28 وَنَبِّئۡهُمۡ أَنَّ ٱلۡمَاۤءَ قِسۡمَةُۢ بَیۡنَهُمۡۖ كُلُّ شِرۡبࣲ مُّحۡتَضَرࣱ
व नब्बिहुम अन्ना अल-मा क़िस्मत कुल्लु शिर्ब मुहतदार
और उनको ख़बर कर दो कि उनमें पानी की बारी मुक़र्रर कर दी गयी है हर (बारी वाले को अपनी) बारी पर हाज़िर होना चाहिए
- 29 فَنَادَوۡا۟ صَاحِبَهُمۡ فَتَعَاطَىٰ فَعَقَرَ
फ़नादौ साहिबेहुम फ़तअताया फ़करा
तो उन लोगों ने अपने रफीक़ (क़ेदार) को बुलाया तो उसने पकड़ कर (ऊँटनी की) कूंचे काट डालीं
- 30 فَكَیۡفَ كَانَ عَذَابِی وَنُذُرِ
फकयफ काना अज़ाबी वनुज़ुर
तो (देखो) मेरा अज़ाब और डराना कैसा था
- 31 إِنَّاۤ أَرۡسَلۡنَا عَلَیۡهِمۡ صَیۡحَةࣰ وَ ٰحِدَةࣰ فَكَانُوا۟ كَهَشِیمِ ٱلۡمُحۡتَظِرِ
इन्ना अलैहिम सैहा और विश्वास फकानू कहेशिमे अल-मुहताज़िरि
हमने उन पर एक सख्त चिंघाड़ (का अज़ाब) भेज दिया तो वह बाड़े वालो के सूखे हुए चूर चूर भूसे की तरह हो गए
- 32 وَلَقَدۡ یَسَّرۡنَا ٱلۡقُرۡءَانَ لِلذِّكۡرِ فَهَلۡ مِن مُّدَّكِرࣲ
व-लक्द यस्सर्ना कुरान लिल-ज़िक्रि फहल मिन मुद्दाकिर
और हमने क़ुरान को नसीहत हासिल करने के वास्ते आसान कर दिया है तो कोई है जो नसीहत हासिल करे
- 33 كَذَّبَتۡ قَوۡمُ لُوطِۭ بِٱلنُّذُرِ
कज़़्ज़़बत क़ौम लूत बिल्नुज़ुरि
लूत की क़ौम ने भी डराने वाले (पैग़म्बरों) को झुठलाया
- 34 إِنَّاۤ أَرۡسَلۡنَا عَلَیۡهِمۡ حَاصِبًا إِلَّاۤ ءَالَ لُوطࣲۖ نَّجَّیۡنَـٰهُم بِسَحَرࣲ
इन्ना अलैहिम हासिबान आल लूत नज्जीना हुम बेसहर
तो हमने उन पर कंकर भरी हवा चलाई मगर लूत के लड़के बाले को हमने उनको अपने फज़ल व करम से पिछले ही को बचा लिया
- 35 نِّعۡمَةࣰ مِّنۡ عِندِنَاۚ كَذَ ٰلِكَ نَجۡزِی مَن شَكَرَ
इंदेना कज़ा विश्वास लेका नज्ज़ी मैन शकर
हम शुक्र करने वालों को ऐसा ही बदला दिया करते हैं
- 36 وَلَقَدۡ أَنذَرَهُم بَطۡشَتَنَا فَتَمَارَوۡا۟ بِٱلنُّذُرِ
व-लक्द अंज़रहुम बत्शतना फ़तमारौ बिल्नुज़ुरि
और लूत ने उनको हमारी पकड़ से भी डराया था मगर उन लोगों ने डराते ही में शक़ किया
- 37 وَلَقَدۡ رَ ٰوَدُوهُ عَن ضَیۡفِهِۦ فَطَمَسۡنَاۤ أَعۡیُنَهُمۡ فَذُوقُوا۟ عَذَابِی وَنُذُرِ
व-लक्द रा विश्वास वदुहु अन ज़ैफ़िही फ़ातमस्ना अयुनहुम फ़ज़ूकू अज़ाबी वनुज़ुर
और उनसे उनके मेहमान (फ़रिश्ते) के बारे में नाजायज़ मतलब की ख्वाहिश की तो हमने उनकी ऑंखें अन्धी कर दीं तो मेरे अज़ाब और डराने का मज़ा चखो
- 38 وَلَقَدۡ صَبَّحَهُم بُكۡرَةً عَذَابࣱ مُّسۡتَقِرࣱّ
व-लक्द सब्बहुम बुक्रतन अज़ाब मुस्तकिर्र
और सुबह सवेरे ही उन पर अज़ाब आ गया जो किसी तरह टल ही नहीं सकता था
- 39 فَذُوقُوا۟ عَذَابِی وَنُذُرِ
फ़ज़ूकू अज़ाबी वनुज़ुर
तो मेरे अज़ाब और डराने के (पड़े) मज़े चखो
- 40 وَلَقَدۡ یَسَّرۡنَا ٱلۡقُرۡءَانَ لِلذِّكۡرِ فَهَلۡ مِن مُّدَّكِرࣲ
व-लक्द यस्सर्ना कुरान लिल-ज़िक्रि फहल मिन मुद्दाकिर
और हमने तो क़ुरान को नसीहत हासिल करने के वास्ते आसान कर दिया तो कोई है जो नसीहत हासिल करे
- 41 وَلَقَدۡ جَاۤءَ ءَالَ فِرۡعَوۡنَ ٱلنُّذُرُ
व-लक्द जा आल फ़िरऔन अन-नुज़ुर
और फिरऔन के पास भी डराने वाले (पैग़म्बर) आए
- 42 كَذَّبُوا۟ بِـَٔایَـٰتِنَا كُلِّهَا فَأَخَذۡنَـٰهُمۡ أَخۡذَ عَزِیزࣲ مُّقۡتَدِرٍ
कज़्ज़ाबू बे-आ-या-ती-ना कुल्लिहा फ़ाअख़ज़्नाहुम अख़्ज़ मुक्तादिर
तो उन लोगों ने हमारी कुल निशानियों को झुठलाया तो हमने उनको इस तरह सख्त पकड़ा जिस तरह एक ज़बरदस्त साहिबे क़ुदरत पकड़ा करता है
- 43 أَكُفَّارُكُمۡ خَیۡرࣱ مِّنۡ أُو۟لَـٰۤىِٕكُمۡ أَمۡ لَكُم بَرَاۤءَةࣱ فِی ٱلزُّبُرِ
अकुफ़ारुकुम ख़ैर उलाइकुम अम बराअतुन फ़े अल-ज़ुबुरि
(ऐ अहले मक्का) क्या उन लोगों से भी तुम्हारे कुफ्फार बढ़ कर हैं या तुम्हारे वास्ते (पहली) किताबों में माफी (लिखी हुई) है
- 44 أَمۡ یَقُولُونَ نَحۡنُ جَمِیعࣱ مُّنتَصِرࣱ
अम याक़ुलून नह्नु जमीउ मुंतसिर
क्या ये लोग कहते हैं कि हम बहुत क़वी जमाअत हैं
- 45 سَیُهۡزَمُ ٱلۡجَمۡعُ وَیُوَلُّونَ ٱلدُّبُرَ
सयुहज़मु अल-जम-उ वयुल्लुवन अद-दुबुरा
अनक़रीब ही ये जमाअत शिकस्त खाएगी और ये लोग पीठ फेर कर भाग जाएँगे
- 46 بَلِ ٱلسَّاعَةُ مَوۡعِدُهُمۡ وَٱلسَّاعَةُ أَدۡهَىٰ وَأَمَرُّ
बले अस-साआ मौइदुहुम वल-साअह अद्ह्या वा अमर्रु
बात ये है कि इनके वायदे का वक्त क़यामत है और क़यामत बड़ी सख्त और बड़ी तल्ख़ (चीज़) है
- 47 إِنَّ ٱلۡمُجۡرِمِینَ فِی ضَلَـٰلࣲ وَسُعُرࣲ
इन्ना अल-मुजरिमीन फ़े ज़लालीन वसुरन
बेशक गुनाहगार लोग गुमराही और दीवानगी में (मुब्तिला) हैं
- 48 یَوۡمَ یُسۡحَبُونَ فِی ٱلنَّارِ عَلَىٰ وُجُوهِهِمۡ ذُوقُوا۟ مَسَّ سَقَرَ
यौम युसहबून फ़े अन-नार अला वुजुहिहिम ज़ुकू मिस्सा सक़र
उस रोज़ ये लोग अपने अपने मुँह के बल (जहन्नुम की) आग में घसीटे जाएँगे (और उनसे कहा जाएगा) अब जहन्नुम की आग का मज़ा चखो
- 49 إِنَّا كُلَّ شَیۡءٍ خَلَقۡنَـٰهُ بِقَدَرࣲ
कुल्ला शै ख़लक़्नाह बेकदर
बेशक हमने हर चीज़ एक मुक़र्रर अन्दाज़ से पैदा की है
- 50 وَمَاۤ أَمۡرُنَاۤ إِلَّا وَ ٰحِدَةࣱ كَلَمۡحِۭ بِٱلۡبَصَرِ
अमरुनआ इल्ला और विश्वास हेदा कलेम्हि बिल-बसरी
और हमारा हुक्म तो बस ऑंख के झपकने की तरह एक बात होती है
- 51 وَلَقَدۡ أَهۡلَكۡنَاۤ أَشۡیَاعَكُمۡ فَهَلۡ مِن مُّدَّكِرࣲ
व-लक्द अह्लक्ना अशयाउम फहल मिन मुद्दाकिर
और हम तुम्हारे हम मशरबो को हलाक कर चुके हैं तो कोई है जो नसीहत हासिल करे
- 52 وَكُلُّ شَیۡءࣲ فَعَلُوهُ فِی ٱلزُّبُرِ
वा कुल्लु शै फ़ाअलूहु फ़े अल-ज़ुबुरि
और अगर चे ये लोग जो कुछ कर चुके हैं (इनके) आमाल नामों में (दर्ज) है
- 53 وَكُلُّ صَغِیرࣲ وَكَبِیرࣲ مُّسۡتَطَرٌ
वा कुल्लु सग़ीर वकबीर मुस्तातर
(यानि) हर छोटा और बड़ा काम लिख दिया गया है
- 54 إِنَّ ٱلۡمُتَّقِینَ فِی جَنَّـٰتࣲ وَنَهَرࣲ
इन्ना अल-मुत्तक़ीन फ़े वनहर
बेशक परहेज़गार लोग (बेहिश्त के) बाग़ों और नहरों में
- 55 فِی مَقۡعَدِ صِدۡقٍ عِندَ مَلِیكࣲ مُّقۡتَدِرِۭ
फ़े मक़अद सेदक़िन एंदा मलिक मुक्तदिर
(यानि) पसन्दीदा मक़ाम में हर तरह की कुदरत रखने वाले बादशाह की बारगाह में (मुक़र्रिब) होंगे
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