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Ash-Shura

अश-शूरा

परामर्श

53 ayahsMeccanहिन्दी

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بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَـٰنِ ٱلرَّحِیمِ

बिस्मि अल्लाह अर-रहमान अर-रहीम

  1. 1 حمۤ

    हम

    हा मीम

  2. 2 عۤسۤقۤ

    असिक

    ऐन सीन काफ़

  3. 3 كَذَ ٰ⁠لِكَ یُوحِیۤ إِلَیۡكَ وَإِلَى ٱلَّذِینَ مِن قَبۡلِكَ ٱللَّهُ ٱلۡعَزِیزُ ٱلۡحَكِیمُ

    कज़ा विश्वास लेका युही इलैक व इला अल्लाज़ीना मिन क़ब्लिक अल्लाह अल-अज़ीज़ अल-हकीम

    (ऐ रसूल) ग़ालिब व दाना ख़ुदा तुम्हारी तरफ़ और जो (पैग़म्बर) तुमसे पहले गुज़रे उनकी तरफ यूँ ही वही भेजता रहता है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है ग़रज़ सब कुछ उसी का है

  4. 4 لَهُۥ مَا فِی ٱلسَّمَـٰوَ ٰ⁠تِ وَمَا فِی ٱلۡأَرۡضِۖ وَهُوَ ٱلۡعَلِیُّ ٱلۡعَظِیمُ

    फ़े अस-समावा विश्वास ते वमा फ़े वहुव अल-अलिय्यु अल-अज़ीम

    और वह तो (बड़ा) आलीशान (और) बुर्ज़ुग है

  5. 5 تَكَادُ ٱلسَّمَـٰوَ ٰ⁠تُ یَتَفَطَّرۡنَ مِن فَوۡقِهِنَّۚ وَٱلۡمَلَـٰۤىِٕكَةُ یُسَبِّحُونَ بِحَمۡدِ رَبِّهِمۡ وَیَسۡتَغۡفِرُونَ لِمَن فِی ٱلۡأَرۡضِۗ أَلَاۤ إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلۡغَفُورُ ٱلرَّحِیمُ

    तकादु अस-समावा विश्वास त यतफत्तर्न मिन फौकिहिन्ना वल्मलाइकतु युसब्बिहूना बेहम्दि रब्बिहिम वयस्तग़फ़िरून फ़े अला इन्ना अल्लाह हुव अल-ग़फ़ूर अर-रहीम

    (उनकी बातों से) क़रीब है कि सारे आसमान (उसकी हैबत के मारे) अपने ऊपर वार से फट पड़े और फ़रिश्ते तो अपने परवरदिगार की तारीफ़ के साथ तसबीह करते हैं और जो लोग ज़मीन में हैं उनके लिए (गुनाहों की) माफी माँगा करते हैं सुन रखो कि ख़ुदा ही यक़ीनन बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है

  6. 6 وَٱلَّذِینَ ٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِهِۦۤ أَوۡلِیَاۤءَ ٱللَّهُ حَفِیظٌ عَلَیۡهِمۡ وَمَاۤ أَنتَ عَلَیۡهِم بِوَكِیلࣲ

    वल्लाज़ीना मिन औलिया अल्लाह हफ़ीज़ अलैहिम अन्त बेवकील

    और जिन लोगों ने ख़ुदा को छोड़ कर (और) अपने सरपरस्त बना रखे हैं ख़ुदा उनकी निगरानी कर रहा है (ऐ रसूल) तुम उनके निगेहबान नहीं हो

  7. 7 وَكَذَ ٰ⁠لِكَ أَوۡحَیۡنَاۤ إِلَیۡكَ قُرۡءَانًا عَرَبِیࣰّا لِّتُنذِرَ أُمَّ ٱلۡقُرَىٰ وَمَنۡ حَوۡلَهَا وَتُنذِرَ یَوۡمَ ٱلۡجَمۡعِ لَا رَیۡبَ فِیهِۚ فَرِیقࣱ فِی ٱلۡجَنَّةِ وَفَرِیقࣱ فِی ٱلسَّعِیرِ

    वक़ज़ा विश्वास लेका औहैना इलैक कुरान अरबी लिनज़िरा उम्मा अल-कुरा हौलहा वा तुन्ज़िरा यौम रैब फ़रीक़ फ़े अल जन्नत वफ़ारिक फ़े अस-सईर

    और हमने तुम्हारे पास अरबी क़ुरान यूँ भेजा ताकि तुम मक्का वालों को और जो लोग इसके इर्द गिर्द रहते हैं उनको डराओ और (उनको) क़यामत के दिन से भी डराओ जिस (के आने) में कुछ भी शक़ नहीं (उस दिन) एक फरीक़ (मानने वाला) जन्नत में होगा और फरीक़ (सानी) दोज़ख़ में

  8. 8 وَلَوۡ شَاۤءَ ٱللَّهُ لَجَعَلَهُمۡ أُمَّةࣰ وَ ٰ⁠حِدَةࣰ وَلَـٰكِن یُدۡخِلُ مَن یَشَاۤءُ فِی رَحۡمَتِهِۦۚ وَٱلظَّـٰلِمُونَ مَا لَهُم مِّن وَلِیࣲّ وَلَا نَصِیرٍ

    वलाउ शा अल्लाह लजाअलहुम और विश्वास वलाकिन युज़्खिलु मैन यशा फ़े रहमतिहि वज़-ज़ालिमून मिन वली नसीर

    और अगर ख़ुदा चाहता तो इन सबको एक ही गिरोह बना देता मगर वह तो जिसको चाहता है (हिदायत करके) अपनी रहमत में दाख़िल कर लेता है और ज़ालिमों का तो (उस दिन) न कोई यार है और न मददगार

  9. 9 أَمِ ٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِهِۦۤ أَوۡلِیَاۤءَۖ فَٱللَّهُ هُوَ ٱلۡوَلِیُّ وَهُوَ یُحۡیِ ٱلۡمَوۡتَىٰ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَیۡءࣲ قَدِیرࣱ

    अमि मिन फ़ल्लाहु हुव अल वलीय्यु वहुव अल मौता वहुव अला कुल्लि शै क़दीर

    क्या उन लोगों ने ख़ुदा के सिवा (दूसरे) कारसाज़ बनाए हैं तो कारसाज़ बस ख़ुदा ही है और वही मुर्दों को ज़िन्दा करेगा और वही हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है

  10. 10 وَمَا ٱخۡتَلَفۡتُمۡ فِیهِ مِن شَیۡءࣲ فَحُكۡمُهُۥۤ إِلَى ٱللَّهِۚ ذَ ٰ⁠لِكُمُ ٱللَّهُ رَبِّی عَلَیۡهِ تَوَكَّلۡتُ وَإِلَیۡهِ أُنِیبُ

    वमा इख्तलफ़्तुम फ़िये मिन शै फ़हुक्मुहु इला ज़ा विश्वास लेकुम अल्लाह अलय्हि तवक्कलतु वा इलय्हि उनीबु

    और तुम लोग जिस चीज़ में बाहम एख्तेलाफ़ात रखते हो उसका फैसला ख़ुदा ही के हवाले है वही ख़ुदा तो मेरा परवरदिगार है मैं उसी पर भरोसा रखता हूँ और उसी की तरफ रूजू करता हूँ

  11. 11 فَاطِرُ ٱلسَّمَـٰوَ ٰ⁠تِ وَٱلۡأَرۡضِۚ جَعَلَ لَكُم مِّنۡ أَنفُسِكُمۡ أَزۡوَ ٰ⁠جࣰا وَمِنَ ٱلۡأَنۡعَـٰمِ أَزۡوَ ٰ⁠جࣰا یَذۡرَؤُكُمۡ فِیهِۚ لَیۡسَ كَمِثۡلِهِۦ شَیۡءࣱۖ وَهُوَ ٱلسَّمِیعُ ٱلۡبَصِیرُ

    फ़ातिरु अस-समावा विश्वास ते जाला अनफुसिकुम अज़्वा विश्वास जा वोमेन अल-अनआम अज़्वा विश्वास जा यिज़राउकुम लैस कमिस्लिही वहुव अस-समीउ अल-बसीर

    सारे आसमान व ज़मीन का पैदा करने वाला (वही) है उसी ने तुम्हारे लिए तुम्हारी ही जिन्स के जोड़े बनाए और चारपायों के जोड़े भी (उसी ने बनाए) उस (तरफ) में तुमको फैलाता रहता है कोई चीज़ उसकी मिसल नहीं और वह हर चीज़ को सुनता देखता है

  12. 12 لَهُۥ مَقَالِیدُ ٱلسَّمَـٰوَ ٰ⁠تِ وَٱلۡأَرۡضِۖ یَبۡسُطُ ٱلرِّزۡقَ لِمَن یَشَاۤءُ وَیَقۡدِرُۚ إِنَّهُۥ بِكُلِّ شَیۡءٍ عَلِیمࣱ

    मक़ालिदु अस-समावा विश्वास ते यब्सुट अर-रिज़्क़ यशा वा यक़्दिरु इन्नाहु बिकुल्लि शै अलीम

    सारे आसमान व ज़मीन की कुन्जियाँ उसके पास हैं जिसके लिए चाहता है रोज़ी को फराख़ कर देता है (जिसके लिए) चाहता है तंग कर देता है बेशक वह हर चीज़ से ख़ूब वाक़िफ़ है

  13. 13 ۞ شَرَعَ لَكُم مِّنَ ٱلدِّینِ مَا وَصَّىٰ بِهِۦ نُوحࣰا وَٱلَّذِیۤ أَوۡحَیۡنَاۤ إِلَیۡكَ وَمَا وَصَّیۡنَا بِهِۦۤ إِبۡرَ ٰ⁠هِیمَ وَمُوسَىٰ وَعِیسَىٰۤۖ أَنۡ أَقِیمُوا۟ ٱلدِّینَ وَلَا تَتَفَرَّقُوا۟ فِیهِۚ كَبُرَ عَلَى ٱلۡمُشۡرِكِینَ مَا تَدۡعُوهُمۡ إِلَیۡهِۚ ٱللَّهُ یَجۡتَبِیۤ إِلَیۡهِ مَن یَشَاۤءُ وَیَهۡدِیۤ إِلَیۡهِ مَن یُنِیبُ

    शरअ मिन अद-दीन वस्सा बेहि नूह औहैना इलैक वमा वस्सैना इबरा विश्वास हेइम वमूसा वईसा अकीमू अद-दीन ततफर्रकू कबुरा अलै अल-मुश्रिकीन तदउहुम अल्लाह यज्तबी इलायहि मैन यशा इलायहि मैन युनेबु

    उसने तुम्हारे लिए दीन का वही रास्ता मुक़र्रर किया जिस (पर चलने का) नूह को हुक्म दिया था और (ऐ रसूल) उसी की हमने तुम्हारे पास वही भेजी है और उसी का इब्राहीम और मूसा और ईसा को भी हुक्म दिया था (वह) ये (है कि) दीन को क़ायम रखना और उसमें तफ़रक़ा न डालना जिस दीन की तरफ तुम मुशरेकीन को बुलाते हो वह उन पर बहुत शाक़ ग़ुज़रता है ख़ुदा जिसको चाहता है अपनी बारगाह का बरगुज़ीदा कर लेता है और जो उसकी तरफ रूजू करे (अपनी तरफ़ (पहुँचने) का रास्ता दिखा देता है

  14. 14 وَمَا تَفَرَّقُوۤا۟ إِلَّا مِنۢ بَعۡدِ مَا جَاۤءَهُمُ ٱلۡعِلۡمُ بَغۡیَۢا بَیۡنَهُمۡۚ وَلَوۡلَا كَلِمَةࣱ سَبَقَتۡ مِن رَّبِّكَ إِلَىٰۤ أَجَلࣲ مُّسَمࣰّى لَّقُضِیَ بَیۡنَهُمۡۚ وَإِنَّ ٱلَّذِینَ أُورِثُوا۟ ٱلۡكِتَـٰبَ مِنۢ بَعۡدِهِمۡ لَفِی شَكࣲّ مِّنۡهُ مُرِیبࣲ

    वमा तफ़र्रुआ इल्ला बादि जाआहुम अल-इल्मु बग़िया कलिमा सबकत मिन रब्बिक अजल लाकुड़िया वा इन्ना अल्लाज़ीना उरिथु अल किताब बादिहिम लाफ़ी शक्क मुरीबीन

    और ये लोग मुतफ़र्रिक़ हुए भी तो इल्म (हक़) आ चुकने के बाद और (वह भी) महज़ आपस की ज़िद से और अगर तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से एक वक्ते मुक़र्रर तक के लिए (क़यामत का) वायदा न हो चुका होता तो उनमें कबका फैसला हो चुका होता और जो लोग उनके बाद (ख़ुदा की) किताब के वारिस हुए वह उसकी तरफ से बहुत सख्त शुबहे में (पड़े हुए) हैं

  15. 15 فَلِذَ ٰ⁠لِكَ فَٱدۡعُۖ وَٱسۡتَقِمۡ كَمَاۤ أُمِرۡتَۖ وَلَا تَتَّبِعۡ أَهۡوَاۤءَهُمۡۖ وَقُلۡ ءَامَنتُ بِمَاۤ أَنزَلَ ٱللَّهُ مِن كِتَـٰبࣲۖ وَأُمِرۡتُ لِأَعۡدِلَ بَیۡنَكُمُۖ ٱللَّهُ رَبُّنَا وَرَبُّكُمۡۖ لَنَاۤ أَعۡمَـٰلُنَا وَلَكُمۡ أَعۡمَـٰلُكُمۡۖ لَا حُجَّةَ بَیۡنَنَا وَبَیۡنَكُمُۖ ٱللَّهُ یَجۡمَعُ بَیۡنَنَاۖ وَإِلَیۡهِ ٱلۡمَصِیرُ

    फ़ालेज़ विश्वास लेका फ़ादु वस्तकिम कमा उमिर्ता तत्बि वा क़ुल अमेनतु अंज़ल अल्लाह मिन वा अमिर्तु ले अदिल अल्लाह आमालुना वलकुम हुज्जत ब्येनना अल्लाह यजमाउ वा इलय्हि अलमासिरु

    तो (ऐ रसूल) तुम (लोगों को) उसी (दीन) की तरफ बुलाते रहे जो और जैसा तुमको हुक्म हुआ है (उसी पर क़ायम रहो और उनकी नफ़सियानी ख्वाहिशों की पैरवी न करो और साफ़ साफ़ कह दो कि जो किताब ख़ुदा ने नाज़िल की है उस पर मैं ईमान रखता हूँ और मुझे हुक्म हुआ है कि मैं तुम्हारे एख्तेलाफात के (दरमेयान) इन्साफ़ (से फ़ैसला) करूँ ख़ुदा ही हमारा भी परवरदिगार है और वही तुम्हारा भी परवरदिगार है हमारी कारगुज़ारियाँ हमारे ही लिए हैं और तुम्हारी कारस्तानियाँ तुम्हारे वास्ते हममें और तुममें तो कुछ हुज्जत (व तक़रार की ज़रूरत) नहीं ख़ुदा ही हम (क़यामत में) सबको इकट्ठा करेगा

  16. 16 وَٱلَّذِینَ یُحَاۤجُّونَ فِی ٱللَّهِ مِنۢ بَعۡدِ مَا ٱسۡتُجِیبَ لَهُۥ حُجَّتُهُمۡ دَاحِضَةٌ عِندَ رَبِّهِمۡ وَعَلَیۡهِمۡ غَضَبࣱ وَلَهُمۡ عَذَابࣱ شَدِیدٌ

    वल्लाज़ीना युहाज्जून फ़े अल्लाह बादि उस्तुजिब हुज्जतुहुम दाहेसतुन एंदा रब्बिहिम वा अलय्हिम ग़ज़ब वलहुम अज़ाब शदीदुन

    और उसी की तरफ लौट कर जाना है और जो लोग उसके मान लिए जाने के बाद ख़ुदा के बारे में (ख्वाहमख्वाह) झगड़ा करते हैं उनके परवरदिगार के नज़दीक उनकी दलील लग़ो बातिल है और उन पर (ख़ुदा का) ग़ज़ब और उनके लिए सख्त अज़ाब है

  17. 17 ٱللَّهُ ٱلَّذِیۤ أَنزَلَ ٱلۡكِتَـٰبَ بِٱلۡحَقِّ وَٱلۡمِیزَانَۗ وَمَا یُدۡرِیكَ لَعَلَّ ٱلسَّاعَةَ قَرِیبࣱ

    अल्लाह अंज़ल अल किताब बिल-हक्की वमा यूद्रिक लअल्ल अस-साआ

    ख़ुदा ही तो है जिसने सच्चाई के साथ किताब नाज़िल की और अदल (व इन्साफ़ भी नाज़िल किया) और तुमको क्या मालूम यायद क़यामत क़रीब ही हो

  18. 18 یَسۡتَعۡجِلُ بِهَا ٱلَّذِینَ لَا یُؤۡمِنُونَ بِهَاۖ وَٱلَّذِینَ ءَامَنُوا۟ مُشۡفِقُونَ مِنۡهَا وَیَعۡلَمُونَ أَنَّهَا ٱلۡحَقُّۗ أَلَاۤ إِنَّ ٱلَّذِینَ یُمَارُونَ فِی ٱلسَّاعَةِ لَفِی ضَلَـٰلِۭ بَعِیدٍ

    यसतग़िलु बेहा अल्लाज़ीना यूमीनून वल्लाज़ीना अमेनुआ मुश्फिकून मिन्हा वायलमून अन्नाहा अला इन्ना अल्लाज़ीना यूमारौन फ़े अस-साअत लाफ़ी ज़लाल बईद

    (फिर ये ग़फ़लत कैसी) जो लोग इस पर ईमान नहीं रखते वह तो इसके लिए जल्दी कर रहे हैं और जो मोमिन हैं वह उससे डरते हैं और जानते हैं कि क़यामत यक़ीनी बरहक़ है आगाह रहो कि जो लोग क़यामत के बारे में शक़ किया करते हैं वह बड़े परले दर्जे की गुमराही में हैं

  19. 19 ٱللَّهُ لَطِیفُۢ بِعِبَادِهِۦ یَرۡزُقُ مَن یَشَاۤءُۖ وَهُوَ ٱلۡقَوِیُّ ٱلۡعَزِیزُ

    अल्लाह लतीफ़ बि इबादिहि यार्ज़ुकु मैन वहुव अल-क़विय्यु अल-अज़ीज़

    और ख़ुदा अपने बन्दों (के हाल) पर बड़ा मेहरबान है जिसको (जितनी) रोज़ी चाहता है देता है वह ज़ोर वाला ज़बरदस्त है

  20. 20 مَن كَانَ یُرِیدُ حَرۡثَ ٱلۡـَٔاخِرَةِ نَزِدۡ لَهُۥ فِی حَرۡثِهِۦۖ وَمَن كَانَ یُرِیدُ حَرۡثَ ٱلدُّنۡیَا نُؤۡتِهِۦ مِنۡهَا وَمَا لَهُۥ فِی ٱلۡـَٔاخِرَةِ مِن نَّصِیبٍ

    मैन काना युरीदु हर्स अल-आख़िरति नज़ेद फ़े हार्थिही वमन काना युरीदु हर्स दुनिया नूतिही मिन्हा वमा फ़े अल-आख़िरति मिन नसीब

    जो शख़्श आखेरत की खेती का तालिब हो हम उसके लिए उसकी खेती में अफ़ज़ाइश करेंगे और दुनिया की खेती का ख़ास्तगार हो तो हम उसको उसी में से देंगे मगर आखेरत में फिर उसका कुछ हिस्सा न होगा

  21. 21 أَمۡ لَهُمۡ شُرَكَـٰۤؤُا۟ شَرَعُوا۟ لَهُم مِّنَ ٱلدِّینِ مَا لَمۡ یَأۡذَنۢ بِهِ ٱللَّهُۚ وَلَوۡلَا كَلِمَةُ ٱلۡفَصۡلِ لَقُضِیَ بَیۡنَهُمۡۗ وَإِنَّ ٱلظَّـٰلِمِینَ لَهُمۡ عَذَابٌ أَلِیمࣱ

    अम लाहुम शुरकाऊ शरऊ मिन अद-दीन लम यज़न कलिमा अल-फ़स्ली लक़्सिया वा इन्ना अज़-ज़़ालिमीन लाहुम अज़ाब अलीम

    क्या उन लोगों के (बनाए हुए) ऐसे शरीक हैं जिन्होंने उनके लिए ऐसा दीन मुक़र्रर किया है जिसकी ख़ुदा ने इजाज़त नहीं दी और अगर फ़ैसले (के दिन) का वायदा न होता तो उनमें यक़ीनी अब तक फैसला हो चुका होता और ज़ालिमों के वास्ते ज़रूर दर्दनाक अज़ाब है

  22. 22 تَرَى ٱلظَّـٰلِمِینَ مُشۡفِقِینَ مِمَّا كَسَبُوا۟ وَهُوَ وَاقِعُۢ بِهِمۡۗ وَٱلَّذِینَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ فِی رَوۡضَاتِ ٱلۡجَنَّاتِۖ لَهُم مَّا یَشَاۤءُونَ عِندَ رَبِّهِمۡۚ ذَ ٰ⁠لِكَ هُوَ ٱلۡفَضۡلُ ٱلۡكَبِیرُ

    तरा अज़-ज़़ालिमीन मुश्फिकिना मेमा कसबुआ वहुव वाक़िउ वल्लाज़ीना अमेनुआ वा अमिलू अस-सालिहाति फ़े रौज़ात अल-जन्नात मा यशाऊन एंदा ज़ा विश्वास लेका हुव अल-फ़ज़्ल अल कबीर

    (क़यामत के दिन) देखोगे कि ज़ालिम लोग अपने आमाल (के वबाल) से डर रहे होंगे और वह उन पर पड़ कर रहेगा और जिन्होने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे काम किए वह बेहिश्त के बाग़ों में होंगे वह जो कुछ चाहेंगे उनके लिए उनके परवरदिगार की बारगाह में (मौजूद) है यही तो (ख़ुदा का) बड़ा फज़ल है

  23. 23 ذَ ٰ⁠لِكَ ٱلَّذِی یُبَشِّرُ ٱللَّهُ عِبَادَهُ ٱلَّذِینَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِۗ قُل لَّاۤ أَسۡـَٔلُكُمۡ عَلَیۡهِ أَجۡرًا إِلَّا ٱلۡمَوَدَّةَ فِی ٱلۡقُرۡبَىٰۗ وَمَن یَقۡتَرِفۡ حَسَنَةࣰ نَّزِدۡ لَهُۥ فِیهَا حُسۡنًاۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورࣱ شَكُورٌ

    ज़ा विश्वास लेका अल्लाज़ी युबश्शुरु अल्लाह इबादाह अल्लाज़ीना अमेनुआ वा अमिलू असअलुकुम अलय्हि अजरान इल्ला अल-मवद्दा फ़े वमन यक़्तरिफ़ नज़ीद फ़िहा हुस्ना इन्ना अल्लाह ग़फूर शकूर

    यही (ईनाम) है जिसकी ख़ुदा अपने उन बन्दों को ख़ुशख़बरी देता है जो ईमान लाए और नेक काम करते रहे (ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं इस (तबलीग़े रिसालत) का अपने क़रातबदारों (अहले बैत) की मोहब्बत के सिवा तुमसे कोई सिला नहीं मांगता और जो शख़्श नेकी हासिल करेगा हम उसके लिए उसकी ख़ूबी में इज़ाफा कर देंगे बेशक वह बड़ा बख्शने वाला क़दरदान है

  24. 24 أَمۡ یَقُولُونَ ٱفۡتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبࣰاۖ فَإِن یَشَإِ ٱللَّهُ یَخۡتِمۡ عَلَىٰ قَلۡبِكَۗ وَیَمۡحُ ٱللَّهُ ٱلۡبَـٰطِلَ وَیُحِقُّ ٱلۡحَقَّ بِكَلِمَـٰتِهِۦۤۚ إِنَّهُۥ عَلِیمُۢ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ

    अम याक़ुलून इफ़्तरा अलै अल्लाह फा-इन यशई अल्लाह यख़्तिम अला क़ल्बिक वयम्हु अल्लाह अल-बातिल वयुहिक्कु अल-हक़् बेकलिमातिही इन्नाहु अलीम बेज़ाति अस-सुदूर

    क्या ये लोग (तुम्हारी निस्बत कहते हैं कि इस (रसूल) ने ख़ुदा पर झूठा बोहतान बाँधा है तो अगर (ऐसा) होता तो) ख़ुदा चाहता तो तुम्हारे दिल पर मोहर लगा देता (कि तुम बात ही न कर सकते) और ख़ुदा तो झूठ को नेस्तनाबूद और अपनी बातों से हक़ को साबित करता है वह यक़ीनी दिलों के राज़ से ख़ूब वाक़िफ है

  25. 25 وَهُوَ ٱلَّذِی یَقۡبَلُ ٱلتَّوۡبَةَ عَنۡ عِبَادِهِۦ وَیَعۡفُوا۟ عَنِ ٱلسَّیِّـَٔاتِ وَیَعۡلَمُ مَا تَفۡعَلُونَ

    वहुव अल्लाज़ी यक़्बलु अत-तौबा इबादिहि वयाफ़ू अने अस-सय्यिआत वयालमु तफ़अलूना

    और वही तो है जो अपने बन्दों की तौबा क़ुबूल करता है और गुनाहों को माफ़ करता है और तुम लोग जो कुछ भी करते हो वह जानता है

  26. 26 وَیَسۡتَجِیبُ ٱلَّذِینَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَیَزِیدُهُم مِّن فَضۡلِهِۦۚ وَٱلۡكَـٰفِرُونَ لَهُمۡ عَذَابࣱ شَدِیدࣱ

    वा यस्तजिबु अल्लाज़ीना अमेनुआ वा अमिलू अस-सालिहाति वयज़ीदुहुम मिन वल काफिरून लाहुम अज़ाब

    और जो लोग ईमान लाए और अच्छे अच्छे काम करते रहे उनकी (दुआ) क़ुबूल करता है फज़ल व क़रम से उनको बढ़ कर देता है और काफिरों के लिए सख्त अज़ाब है

  27. 27 ۞ وَلَوۡ بَسَطَ ٱللَّهُ ٱلرِّزۡقَ لِعِبَادِهِۦ لَبَغَوۡا۟ فِی ٱلۡأَرۡضِ وَلَـٰكِن یُنَزِّلُ بِقَدَرࣲ مَّا یَشَاۤءُۚ إِنَّهُۥ بِعِبَادِهِۦ خَبِیرُۢ بَصِیرࣱ

    वलाउ बसट अल्लाह अर-रिज़्क़ लिइबादिहि लबगौ फ़े अल-अर्द वलाकिन यूनज़़्ज़िलु बेकदर मा इन्नाहु बि इबादिहि ख़बीर बसीर

    और अगर ख़ुदा ने अपने बन्दों की रोज़ी में फराख़ी कर दे तो वह लोग ज़रूर (रूए) ज़मीन से सरकशी करने लगें मगर वह तो बाक़दरे मुनासिब जिसकी रोज़ी (जितनी) चाहता है नाज़िल करता है वह बेशक अपने बन्दों से ख़बरदार (और उनको) देखता है

  28. 28 وَهُوَ ٱلَّذِی یُنَزِّلُ ٱلۡغَیۡثَ مِنۢ بَعۡدِ مَا قَنَطُوا۟ وَیَنشُرُ رَحۡمَتَهُۥۚ وَهُوَ ٱلۡوَلِیُّ ٱلۡحَمِیدُ

    वहुव अल्लाज़ी यूनज़़्ज़िलु अल ग़ैस बादि क़नतु वयनशुरु रहमतुहु वहुव अल वलीय्यु अल-हमीदु

    और वही तो है जो लोगों के नाउम्मीद हो जाने के बाद मेंह बरसाता है और अपनी रहमत (बारिश की बरकतों) को फैला देता है और वही कारसाज़ (और) हम्द व सना के लायक़ है

  29. 29 وَمِنۡ ءَایَـٰتِهِۦ خَلۡقُ ٱلسَّمَـٰوَ ٰ⁠تِ وَٱلۡأَرۡضِ وَمَا بَثَّ فِیهِمَا مِن دَاۤبَّةࣲۚ وَهُوَ عَلَىٰ جَمۡعِهِمۡ إِذَا یَشَاۤءُ قَدِیرࣱ

    आयातिहि ख़ल्क़ अस-समावा विश्वास ते वल अर्दि वमा बस्सा फ़ेहिमा मिन दाब्बा वहुव अला जमिहिम इज़ा यशा क़दीर

    और उसी की (क़ुदरत की) निशानियों में से सारे आसमान व ज़मीन का पैदा करना और उन जानदारों का भी जो उसने आसमान व ज़मीन में फैला रखे हैं और जब चाहे उनके जमा कर लेने पर (भी) क़ादिर है

  30. 30 وَمَاۤ أَصَـٰبَكُم مِّن مُّصِیبَةࣲ فَبِمَا كَسَبَتۡ أَیۡدِیكُمۡ وَیَعۡفُوا۟ عَن كَثِیرࣲ

    असाबाकुम मिन मुसीबत फ़बिमा कसबत अय्दीकुम वयाफ़ू अन कसीर

    और जो मुसीबत तुम पर पड़ती है वह तुम्हारे अपने ही हाथों की करतूत से और (उस पर भी) वह बहुत कुछ माफ कर देता है

  31. 31 وَمَاۤ أَنتُم بِمُعۡجِزِینَ فِی ٱلۡأَرۡضِۖ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِن وَلِیࣲّ وَلَا نَصِیرࣲ

    बिमुजिज़ीना फ़े वमा मिन दूने अल्लाह मिन वली नसीर

    और तुम लोग ज़मीन में (रह कर) तो ख़ुदा को किसी तरह हरा नहीं सकते और ख़ुदा के सिवा तुम्हारा न कोई दोस्त है और न मददगार

  32. 32 وَمِنۡ ءَایَـٰتِهِ ٱلۡجَوَارِ فِی ٱلۡبَحۡرِ كَٱلۡأَعۡلَـٰمِ

    अल-जवारि फ़े अल-बह्रि कालआलामि

    और उसी की (क़ुदरत) की निशानियों में से समन्दर में (चलने वाले) (बादबानी जहाज़) है जो गोया पहाड़ हैं

  33. 33 إِن یَشَأۡ یُسۡكِنِ ٱلرِّیحَ فَیَظۡلَلۡنَ رَوَاكِدَ عَلَىٰ ظَهۡرِهِۦۤۚ إِنَّ فِی ذَ ٰ⁠لِكَ لَـَٔایَـٰتࣲ لِّكُلِّ صَبَّارࣲ شَكُورٍ

    इन यशा युस्किनि अर-रीह फ़ैज़्ल्लान रवाकिदा अला इन्ना फ़े ज़ा विश्वास लेका ला-यात लिकुल सब्बार शकूर

    अगर ख़ुदा चाहे तो हवा को ठहरा दे तो जहाज़ भी समन्दर की सतह पर (खड़े के खड़े) रह जाएँ बेशक तमाम सब्र और शुक्र करने वालों के वास्ते इन बातों में (ख़ुदा की क़ुदरत की) बहुत सी निशानियाँ हैं

  34. 34 أَوۡ یُوبِقۡهُنَّ بِمَا كَسَبُوا۟ وَیَعۡفُ عَن كَثِیرࣲ

    औ यूबेखुन्ना बिमा कसबुआ वयाफ़ु अन कसीर

    (या वह चाहे तो) उनको उनके आमाल (बद) के सबब तबाह कर दे

  35. 35 وَیَعۡلَمَ ٱلَّذِینَ یُجَـٰدِلُونَ فِیۤ ءَایَـٰتِنَا مَا لَهُم مِّن مَّحِیصࣲ

    वया'ल्म अल्लाज़ीना युजादलून आयातिना मिन माहिस

    और वह बहुत कुछ माफ़ करता है और जो लोग हमारी निशानियों में (ख्वाहमाख्वाह) झगड़ा करते हैं वह अच्छी तरह समझ लें कि उनको किसी तरह (अज़ाब से) छुटकारा नहीं

  36. 36 فَمَاۤ أُوتِیتُم مِّن شَیۡءࣲ فَمَتَـٰعُ ٱلۡحَیَوٰةِ ٱلدُّنۡیَاۚ وَمَا عِندَ ٱللَّهِ خَیۡرࣱ وَأَبۡقَىٰ لِلَّذِینَ ءَامَنُوا۟ وَعَلَىٰ رَبِّهِمۡ یَتَوَكَّلُونَ

    उतितुम मिन शै फ़ामताउ अल-हयाति वमा एंदा अल्लाह ख़ैर लिल्लाज़िना अमेनुआ व अला रब्बिहिम यतवक्कलून

    (लोगों) तुमको जो कुछ (माल) दिया गया है वह दुनिया की ज़िन्दगी का (चन्द रोज़) साज़ोसामान है और जो कुछ ख़ुदा के यहाँ है वह कहीं बेहतर और पायदार है (मगर ये) ख़ास उन ही लोगों के लिए है जो ईमान लाए और अपने परवरदिगार पर भरोसा रखते हैं

  37. 37 وَٱلَّذِینَ یَجۡتَنِبُونَ كَبَـٰۤىِٕرَ ٱلۡإِثۡمِ وَٱلۡفَوَ ٰ⁠حِشَ وَإِذَا مَا غَضِبُوا۟ هُمۡ یَغۡفِرُونَ

    वल्लाज़ीना यज्तनिबून कबाइर अल-इथ्मि वल-फवा विश्वास हेशा वा इज़ा ग़ज़िबू हुम यग़फ़िरून

    और जो लोग बड़े बड़े गुनाहों और बेहयाई की बातों से बचे रहते हैं और ग़ुस्सा आ जाता है तो माफ कर देते हैं

  38. 38 وَٱلَّذِینَ ٱسۡتَجَابُوا۟ لِرَبِّهِمۡ وَأَقَامُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَأَمۡرُهُمۡ شُورَىٰ بَیۡنَهُمۡ وَمِمَّا رَزَقۡنَـٰهُمۡ یُنفِقُونَ

    वल्लाज़ीना इस्तजाबु ले रब्बिहिम वा अक़ामू अस-सलात वा अम्रुहुम शुरा बयनहुम वमम्मा रज़क़नाहुम युन्फिकून

    और जो अपने परवरदिगार का हुक्म मानते हैं और नमाज़ पढ़ते हैं और उनके कुल काम आपस के मशवरे से होते हैं और जो कुछ हमने उन्हें अता किया है उसमें से (राहे ख़ुदा में) ख़र्च करते हैं

  39. 39 وَٱلَّذِینَ إِذَاۤ أَصَابَهُمُ ٱلۡبَغۡیُ هُمۡ یَنتَصِرُونَ

    वल्लाज़ीना असाबहुमु अल-बग़्यु हुम यन्तसिरून

    और (वह ऐसे हैं) कि जब उन पर किसी किस्म की ज्यादती की जाती है तो बस वाजिबी बदला ले लेते हैं

  40. 40 وَجَزَ ٰ⁠ۤؤُا۟ سَیِّئَةࣲ سَیِّئَةࣱ مِّثۡلُهَاۖ فَمَنۡ عَفَا وَأَصۡلَحَ فَأَجۡرُهُۥ عَلَى ٱللَّهِۚ إِنَّهُۥ لَا یُحِبُّ ٱلظَّـٰلِمِینَ

    वजज़ विश्वास सय्यत मिस्लुहा अफा वा अस-लह फ़ा-अज्रुहु अलै इन्नाहु यूहिब्बु अज़-ज़़ालिमीन

    और बुराई का बदला तो वैसी ही बुराई है उस पर भी जो शख्स माफ कर दे और (मामले की) इसलाह कर दें तो इसका सवाब ख़ुदा के ज़िम्मे है बेशक वह ज़ुल्म करने वालों को पसन्द नहीं करता

  41. 41 وَلَمَنِ ٱنتَصَرَ بَعۡدَ ظُلۡمِهِۦ فَأُو۟لَـٰۤىِٕكَ مَا عَلَیۡهِم مِّن سَبِیلٍ

    वेलामेनि इन्तसर बाद ज़ुल्मिही फ़ौलैक मिन सबीलिन

    और जिस पर ज़ुल्म हुआ हो अगर वह उसके बाद इन्तेक़ाम ले तो ऐसे लोगों पर कोई इल्ज़ाम नहीं

  42. 42 إِنَّمَا ٱلسَّبِیلُ عَلَى ٱلَّذِینَ یَظۡلِمُونَ ٱلنَّاسَ وَیَبۡغُونَ فِی ٱلۡأَرۡضِ بِغَیۡرِ ٱلۡحَقِّۚ أُو۟لَـٰۤىِٕكَ لَهُمۡ عَذَابٌ أَلِیمࣱ

    अस-सबील अलै अल्लाज़ीना यज़्लिमून अन-नास वयबग़ून फ़े अल-अर्द बेग़ैर उलाइक लाहुम अज़ाब अलीम

    इल्ज़ाम तो बस उन्हीं लोगों पर होगा जो लोगों पर ज़ुल्म करते हैं और रूए ज़मीन में नाहक़ ज्यादतियाँ करते फिरते हैं उन्हीं लोगों के लिए दर्दनाक अज़ाब है

  43. 43 وَلَمَن صَبَرَ وَغَفَرَ إِنَّ ذَ ٰ⁠لِكَ لَمِنۡ عَزۡمِ ٱلۡأُمُورِ

    वेलामेन सबर वा ग़फ़रा इन्ना ज़ा विश्वास लेका लामेन अज़्मी अल-उमूरी

    और जो सब्र करे और कुसूर माफ़ कर दे तो बेशक ये बड़े हौसले के काम हैं

  44. 44 وَمَن یُضۡلِلِ ٱللَّهُ فَمَا لَهُۥ مِن وَلِیࣲّ مِّنۢ بَعۡدِهِۦۗ وَتَرَى ٱلظَّـٰلِمِینَ لَمَّا رَأَوُا۟ ٱلۡعَذَابَ یَقُولُونَ هَلۡ إِلَىٰ مَرَدࣲّ مِّن سَبِیلࣲ

    वमन युज़्लिल अल्लाह फ़मा मिन वली बादिहि वतरा अज़-ज़़ालिमीन लम्मा राउ अल-अज़ाब याक़ुलून हल इला मरद्द मिन सबील

    और जिसको ख़ुदा गुमराही में छोड़ दे तो उसके बाद उसका कोई सरपरस्त नहीं और तुम ज़ालिमों को देखोगे कि जब (दोज़ख़) का अज़ाब देखेंगे तो कहेंगे कि भला (दुनिया में) फिर लौट कर जाने की कोई सबील है

  45. 45 وَتَرَىٰهُمۡ یُعۡرَضُونَ عَلَیۡهَا خَـٰشِعِینَ مِنَ ٱلذُّلِّ یَنظُرُونَ مِن طَرۡفٍ خَفِیࣲّۗ وَقَالَ ٱلَّذِینَ ءَامَنُوۤا۟ إِنَّ ٱلۡخَـٰسِرِینَ ٱلَّذِینَ خَسِرُوۤا۟ أَنفُسَهُمۡ وَأَهۡلِیهِمۡ یَوۡمَ ٱلۡقِیَـٰمَةِۗ أَلَاۤ إِنَّ ٱلظَّـٰلِمِینَ فِی عَذَابࣲ مُّقِیمࣲ

    वा तरा हुम युर्दून अलय्हा ख़ाशेईन मिन अल-ज़ुल्लि यान्ज़ुरून मिन तर्फ़ ख़फ़िय्य व काला अल्लाज़ीना इन्ना अल-ख़ासिरीन अल्लाज़ीना ख़सरुआ वा अह्लिहिम यौम अला इन्ना अज़-ज़़ालिमीन फ़े मुक़ीम

    और तुम उनको देखोगे कि दोज़ख़ के सामने लाए गये हैं (और) ज़िल्लत के मारे कटे जाते हैं (और) कनक्खियों से देखे जाते हैं और मोमिनीन कहेंगे कि हकीक़त में वही बड़े घाटे में हैं जिन्होने क़यामत के दिन अपने आप को और अपने घर वालों को ख़सारे में डाला देखो ज़ुल्म करने वाले दाएमी अज़ाब में रहेंगे

  46. 46 وَمَا كَانَ لَهُم مِّنۡ أَوۡلِیَاۤءَ یَنصُرُونَهُم مِّن دُونِ ٱللَّهِۗ وَمَن یُضۡلِلِ ٱللَّهُ فَمَا لَهُۥ مِن سَبِیلٍ

    वमा काना औलिया मिन दूने वमन युज़्लिल अल्लाह फ़मा मिन सबीलिन

    और ख़ुदा के सिवा न उनके सरपरस्त ही होंगे जो उनकी मदद को आएँ और जिसको ख़ुदा गुमराही में छोड़ दे तो उसके लिए (हिदायत की) कोई राह नहीं

  47. 47 ٱسۡتَجِیبُوا۟ لِرَبِّكُم مِّن قَبۡلِ أَن یَأۡتِیَ یَوۡمࣱ لَّا مَرَدَّ لَهُۥ مِنَ ٱللَّهِۚ مَا لَكُم مِّن مَّلۡجَإࣲ یَوۡمَىِٕذࣲ وَمَا لَكُم مِّن نَّكِیرࣲ

    इस्तजीबु लेरब्बिकुम मिन क़ब्लि अन यातिया ला मरद्द मिन मिन मल्जा यौमाइज़ि वमा मिन नकीर

    (लोगों) उस दिन के पहले जो ख़ुदा की तरफ से आयेगा और किसी तरह (टाले न टलेगा) अपने परवरदिगार का हुक्म मान लो (क्यों कि) उस दिन न तो तुमको कहीं पनाह की जगह मिलेगी और न तुमसे (गुनाह का) इन्कार ही बन पड़ेगा

  48. 48 فَإِنۡ أَعۡرَضُوا۟ فَمَاۤ أَرۡسَلۡنَـٰكَ عَلَیۡهِمۡ حَفِیظًاۖ إِنۡ عَلَیۡكَ إِلَّا ٱلۡبَلَـٰغُۗ وَإِنَّاۤ إِذَاۤ أَذَقۡنَا ٱلۡإِنسَـٰنَ مِنَّا رَحۡمَةࣰ فَرِحَ بِهَاۖ وَإِن تُصِبۡهُمۡ سَیِّئَةُۢ بِمَا قَدَّمَتۡ أَیۡدِیهِمۡ فَإِنَّ ٱلۡإِنسَـٰنَ كَفُورࣱ

    अरदू अरसलनाका अलैहिम हफ़ीज़ान अलैक इल्ला अज़क़ना अल-इंसान मिन्ना रहमतन फ़रिह वा-इन तुसिभुम सय्यिअतु बिमा क़द्दामत अय्दिहिम फ़ाइन्ना अल-इंसान कफूर

    फिर अगर मुँह फेर लें तो (ऐ रसूल) हमने तुमको उनका निगेहबान बनाकर नहीं भेजा तुम्हारा काम तो सिर्फ (एहकाम का) पहुँचा देना है और जब हम इन्सान को अपनी रहमत का मज़ा चखाते हैं तो वह उससे ख़ुश हो जाता है और अगर उनको उन्हीं के हाथों की पहली करतूतों की बदौलत कोई तकलीफ पहुँचती (सब एहसान भूल गए) बेशक इन्सान बड़ा नाशुक्रा है

  49. 49 لِّلَّهِ مُلۡكُ ٱلسَّمَـٰوَ ٰ⁠تِ وَٱلۡأَرۡضِۚ یَخۡلُقُ مَا یَشَاۤءُۚ یَهَبُ لِمَن یَشَاۤءُ إِنَـٰثࣰا وَیَهَبُ لِمَن یَشَاۤءُ ٱلذُّكُورَ

    लिल्लाहि मुल्क अस-समावा विश्वास ते याख़्लुक़ु यहबु यशा इनास वयहबु यशा अल-ज़ुकूर

    सारे आसमान व ज़मीन की हुकूमत ख़ास ख़ुदा ही की है जो चाहता है पैदा करता है (और) जिसे चाहता है (फ़क़त) बेटियाँ देता है और जिसे चाहता है (महज़) बेटा अता करता है

  50. 50 أَوۡ یُزَوِّجُهُمۡ ذُكۡرَانࣰا وَإِنَـٰثࣰاۖ وَیَجۡعَلُ مَن یَشَاۤءُ عَقِیمًاۚ إِنَّهُۥ عَلِیمࣱ قَدِیرࣱ

    औ युज़व्विजुहुम ज़ुक्रानान वा इनासन वयजअलु मैन यशा अकीमा इन्नाहु अलीम क़दीर

    या उनको बेटे बेटियाँ (औलाद की) दोनों किस्में इनायत करता है और जिसको चाहता है बांझ बना देता है बेशक वह बड़ा वाकिफ़कार क़ादिर है

  51. 51 ۞ وَمَا كَانَ لِبَشَرٍ أَن یُكَلِّمَهُ ٱللَّهُ إِلَّا وَحۡیًا أَوۡ مِن وَرَاۤىِٕ حِجَابٍ أَوۡ یُرۡسِلَ رَسُولࣰا فَیُوحِیَ بِإِذۡنِهِۦ مَا یَشَاۤءُۚ إِنَّهُۥ عَلِیٌّ حَكِیمࣱ

    वमा काना लिबशर अन युकल्लिमहु अल्लाह इल्ला वहिया औ मिन वराई हिजाबिन औ युर्सिल रसूलन फ़यूहिया बि-इज़्निहि इन्नाहु अली हकीम

    और किसी आदमी के लिए ये मुमकिन नहीं कि ख़ुदा उससे बात करे मगर वही के ज़रिए से (जैसे) (दाऊद) परदे के पीछे से जैसे (मूसा) या कोई फ़रिश्ता भेज दे (जैसे मोहम्मद) ग़रज़ वह अपने एख्तेयार से जो चाहता है पैग़ाम भेज देता है बेशक वह आलीशान हिकमत वाला है

  52. 52 وَكَذَ ٰ⁠لِكَ أَوۡحَیۡنَاۤ إِلَیۡكَ رُوحࣰا مِّنۡ أَمۡرِنَاۚ مَا كُنتَ تَدۡرِی مَا ٱلۡكِتَـٰبُ وَلَا ٱلۡإِیمَـٰنُ وَلَـٰكِن جَعَلۡنَـٰهُ نُورࣰا نَّهۡدِی بِهِۦ مَن نَّشَاۤءُ مِنۡ عِبَادِنَاۚ وَإِنَّكَ لَتَهۡدِیۤ إِلَىٰ صِرَ ٰ⁠طࣲ مُّسۡتَقِیمࣲ

    वक़ज़ा विश्वास लेका औहैना इलैक रूहान अम्रिना कोंता तद्रि अल-किताब अल-ईमानु वलाकिन जाअलनाह नूरन नेहदी बेहि मैन नेशा व इन्नका लत्हदि इला सिरा विश्वास ते मुस्तक़ीम

    और इसी तरह हमने अपने हुक्म को रूह (क़ुरान) तुम्हारी तरफ 'वही' के ज़रिए से भेजे तो तुम न किताब ही को जानते थे कि क्या है और न ईमान को मगर इस (क़ुरान) को एक नूर बनाया है कि इससे हम अपने बन्दों में से जिसकी चाहते हैं हिदायत करते हैं और इसमें शक़ नहीं कि तुम (ऐ रसूल) सीधा ही रास्ता दिखाते हो

  53. 53 صِرَ ٰ⁠طِ ٱللَّهِ ٱلَّذِی لَهُۥ مَا فِی ٱلسَّمَـٰوَ ٰ⁠تِ وَمَا فِی ٱلۡأَرۡضِۗ أَلَاۤ إِلَى ٱللَّهِ تَصِیرُ ٱلۡأُمُورُ

    सिरा विश्वास ते अल्लाह अल्लाज़ी फ़े अस-समावा विश्वास ते वमा फ़े अला इला अल्लाह तसीरु अल-उमुरु

    (यानि) उसका रास्ता कि जो आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है (ग़रज़ सब कुछ) उसी का है सुन रखो सब काम ख़ुदा ही की तरफ रूजू होंगे और वही फैसला करेगा

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