Fussilat
फुस्सिलत
विस्तृत
بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَـٰنِ ٱلرَّحِیمِ
बिस्मि अल्लाह अर-रहमान अर-रहीम
- 1 حمۤ
हम
हा मीम
- 2 تَنزِیلࣱ مِّنَ ٱلرَّحۡمَـٰنِ ٱلرَّحِیمِ
तंज़ील मिन अर-रहमान अर-रहीम
(ये किताब) रहमान व रहीम ख़ुदा की तरफ से नाज़िल हुई है ये (वह) किताब अरबी क़ुरान है
- 3 كِتَـٰبࣱ فُصِّلَتۡ ءَایَـٰتُهُۥ قُرۡءَانًا عَرَبِیࣰّا لِّقَوۡمࣲ یَعۡلَمُونَ
किताब फुस्सिलत आयातुहु कुरान अरबी लिक़ौमिन यालमून
जिसकी आयतें समझदार लोगें के वास्ते तफ़सील से बयान कर दी गयीं हैं
- 4 بَشِیرࣰا وَنَذِیرࣰا فَأَعۡرَضَ أَكۡثَرُهُمۡ فَهُمۡ لَا یَسۡمَعُونَ
बशीर वनज़ीरन फ़ाअरद अक्सरुहुम यास्मऊन
ं(नेको कारों को) ख़़ुशख़बरी देने वाली और (बदकारों को) डराने वाली है इस पर भी उनमें से अक्सर ने मुँह फेर लिया और वह सुनते ही नहीं
- 5 وَقَالُوا۟ قُلُوبُنَا فِیۤ أَكِنَّةࣲ مِّمَّا تَدۡعُونَاۤ إِلَیۡهِ وَفِیۤ ءَاذَانِنَا وَقۡرࣱ وَمِنۢ بَیۡنِنَا وَبَیۡنِكَ حِجَابࣱ فَٱعۡمَلۡ إِنَّنَا عَـٰمِلُونَ
व क़ालू क़ुलूबुना अकिन्न मिम्मा तदूना इलायहि अज़ानिना वक्र बय्निना उबय्निक हिजाब फ़ाइल इन्नना आमिलून
और कहने लगे जिस चीज़ की तरफ तुम हमें बुलाते हो उससे तो हमारे दिल पर्दों में हैं (कि दिल को नहीं लगती) और हमारे कानों में गिर्दानी (बहरापन है) कि कुछ सुनायी नहीं देता और हमारे तुम्हारे दरमियान एक पर्दा (हायल) है तो तुम (अपना) काम करो हम (अपना) काम करते हैं
- 6 قُلۡ إِنَّمَاۤ أَنَا۠ بَشَرࣱ مِّثۡلُكُمۡ یُوحَىٰۤ إِلَیَّ أَنَّمَاۤ إِلَـٰهُكُمۡ إِلَـٰهࣱ وَ ٰحِدࣱ فَٱسۡتَقِیمُوۤا۟ إِلَیۡهِ وَٱسۡتَغۡفِرُوهُۗ وَوَیۡلࣱ لِّلۡمُشۡرِكِینَ
क़ुल इन्नामा अना बशर मिस्लुकुम इलय्य इलाहुकुम इलाह और विश्वास हेद फ़ास्तिकीमुआ इलायहि वस्तग़फिरुह वैल लिल मुश्रिकीन
(ऐ रसूल) कह दो कि मैं भी बस तुम्हारा ही सा आदमी हूँ (मगर फ़र्क ये है कि) मुझ पर 'वही' आती है कि तुम्हारा माबूद बस (वही) यकता ख़ुदा है तो सीधे उसकी तरफ मुतावज्जे रहो और उसी से बख़शिश की दुआ माँगो, और मुशरेकों पर अफसोस है
- 7 ٱلَّذِینَ لَا یُؤۡتُونَ ٱلزَّكَوٰةَ وَهُم بِٱلۡـَٔاخِرَةِ هُمۡ كَـٰفِرُونَ
अल्लाज़ीना यू'तूना बिल आख़िरत हुम काफ़िरून
जो ज़कात नहीं देते और आखेरत के भी क़ायल नहीं
- 8 إِنَّ ٱلَّذِینَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ لَهُمۡ أَجۡرٌ غَیۡرُ مَمۡنُونࣲ
इन्ना अल्लाज़ीना अमेनुआ वा अमिलू अस-सालिहाति लाहुम अज्र ग़ैर ममनून
बेशक जो लोग ईमान लाए और अच्छे अच्छे काम करते रहे और उनके लिए वह सवाब है जो कभी ख़त्म होने वाला नहीं
- 9 ۞ قُلۡ أَىِٕنَّكُمۡ لَتَكۡفُرُونَ بِٱلَّذِی خَلَقَ ٱلۡأَرۡضَ فِی یَوۡمَیۡنِ وَتَجۡعَلُونَ لَهُۥۤ أَندَادࣰاۚ ذَ ٰلِكَ رَبُّ ٱلۡعَـٰلَمِینَ
क़ुल अइन्नकुम लतकफुरून ख़लक़ अल-अर्द फ़े यौमैनि व तज'अलूना अंदादन ज़ा विश्वास लेका रब्बु अल-आलमीन
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि क्या तुम उस (ख़ुदा) से इन्कार करते हो जिसने ज़मीन को दो दिन में पैदा किया और तुम (औरों को) उसका हमसर बनाते हो, यही तो सारे जहाँ का सरपरस्त है
- 10 وَجَعَلَ فِیهَا رَوَ ٰسِیَ مِن فَوۡقِهَا وَبَـٰرَكَ فِیهَا وَقَدَّرَ فِیهَاۤ أَقۡوَ ٰتَهَا فِیۤ أَرۡبَعَةِ أَیَّامࣲ سَوَاۤءࣰ لِّلسَّاۤىِٕلِینَ
वजाला फ़िहा रवा विश्वास सेया मिन फौकिहा वेबारका फ़िहा वक़द्दर अक़्वा विश्वास ताहा अरबा अय्याम सवा लिल्साइलीन
और उसी ने ज़मीन में उसके ऊपर से पहाड़ पैदा किए और उसी ने इसमें बरकत अता की और उसी ने एक मुनासिब अन्दाज़ पर इसमें सामाने माईशत का बन्दोबस्त किया (ये सब कुछ) चार दिन में और तमाम तलबगारों के लिए बराबर है
- 11 ثُمَّ ٱسۡتَوَىٰۤ إِلَى ٱلسَّمَاۤءِ وَهِیَ دُخَانࣱ فَقَالَ لَهَا وَلِلۡأَرۡضِ ٱئۡتِیَا طَوۡعًا أَوۡ كَرۡهࣰا قَالَتَاۤ أَتَیۡنَا طَاۤىِٕعِینَ
सुम्म इला अस-समा वहिया दुख़ान फ़काला लहा वलिलार्दि इथिया ताऊ'अन औ करहान कालाता अतेयना ता'ईईन
फिर आसमान की तरफ मुतावज्जे हुआ और (उस वक्त) धुएँ (का सा) था उसने उससे और ज़मीन से फरमाया कि तुम दोनों आओ ख़़ुशी से ख्वाह कराहत से, दोनों ने अर्ज़ की हम ख़़ुशी ख़़ुशी हाज़िर हैं
- 12 فَقَضَىٰهُنَّ سَبۡعَ سَمَـٰوَاتࣲ فِی یَوۡمَیۡنِ وَأَوۡحَىٰ فِی كُلِّ سَمَاۤءٍ أَمۡرَهَاۚ وَزَیَّنَّا ٱلسَّمَاۤءَ ٱلدُّنۡیَا بِمَصَـٰبِیحَ وَحِفۡظࣰاۚ ذَ ٰلِكَ تَقۡدِیرُ ٱلۡعَزِیزِ ٱلۡعَلِیمِ
फ़क़दाहुन्ना सबआ समावात फ़े यौमैनि वाह्या फ़े कुल्लि समाइन अम्रहा वज़य्यन्ना अस-समाअ दुनिया बिमसाबिह वहिफ़्ज़ान ज़ा विश्वास लेका तक़दीरु अल-अज़ीज़ अल-अलीम
(और हुक्म के पाबन्द हैं) फिर उसने दोनों में उस (धुएँ) के सात आसमान बनाए और हर आसमान में उसके (इन्तेज़ाम) का हुक्म (कार कुनान कज़ा व क़दर के पास) भेज दिया और हमने नीचे वाले आसमान को (सितारों के) चिराग़ों से मज़य्यन किया और (शैतानों से महफूज़) रखा ये वाक़िफ़कार ग़ालिब ख़ुदा के (मुक़र्रर किए हुए) अन्दाज़ हैं
- 13 فَإِنۡ أَعۡرَضُوا۟ فَقُلۡ أَنذَرۡتُكُمۡ صَـٰعِقَةࣰ مِّثۡلَ صَـٰعِقَةِ عَادࣲ وَثَمُودَ
अरदू फ़कुल अंज़रतुकुम साइक़ा मिस्ल सैकाता थमूद
फिर अगर हम पर भी ये कुफ्फार मुँह फेरें तो कह दो कि मैं तुम को ऐसी बिजली गिरने (के अज़ाब से) डराता हूँ जैसी क़ौम आद व समूद की बिजली की कड़क
- 14 إِذۡ جَاۤءَتۡهُمُ ٱلرُّسُلُ مِنۢ بَیۡنِ أَیۡدِیهِمۡ وَمِنۡ خَلۡفِهِمۡ أَلَّا تَعۡبُدُوۤا۟ إِلَّا ٱللَّهَۖ قَالُوا۟ لَوۡ شَاۤءَ رَبُّنَا لَأَنزَلَ مَلَـٰۤىِٕكَةࣰ فَإِنَّا بِمَاۤ أُرۡسِلۡتُم بِهِۦ كَـٰفِرُونَ
इज़् जाआतहुम अर-रुसुलु बय्न अय्दिहिम ख़लीफ़िहिम अल्ला ताबुदू इल्ला लौ शा लाएंज़ल उरसिलतुम बेहि काफ़िरून
जब उनके पास उनके आगे से और पीछे से पैग़म्बर (ये ख़बर लेकर) आए कि ख़ुदा के सिवा किसी की इबादत न करो तो कहने लगे कि अगर हमारा परवरदिगार चाहता तो फ़रिश्ते नाज़िल करता और जो (बातें) देकर तुम लोग भेजे गए हो हम तो उसे नहीं मानते
- 15 فَأَمَّا عَادࣱ فَٱسۡتَكۡبَرُوا۟ فِی ٱلۡأَرۡضِ بِغَیۡرِ ٱلۡحَقِّ وَقَالُوا۟ مَنۡ أَشَدُّ مِنَّا قُوَّةًۖ أَوَلَمۡ یَرَوۡا۟ أَنَّ ٱللَّهَ ٱلَّذِی خَلَقَهُمۡ هُوَ أَشَدُّ مِنۡهُمۡ قُوَّةࣰۖ وَكَانُوا۟ بِـَٔایَـٰتِنَا یَجۡحَدُونَ
फ़ाम्मा अद फ़स्तकबरू फ़े अल-अर्द बेग़ैर अल-हक़्क़ी व क़ालू अशद्दु मिन्ना क़ुव्वतन औलम यारो अन्ना अल्लाह अल्लाज़ी ख़लकहुम हुव अशद्दु मिन्हुम वा कानू बे-आ-या-ती-ना यजहदूना
तो आद नाहक़ रूए ज़मीन में ग़ुरूर करने लगे और कहने लगे कि हम से बढ़ के क़ूवत में कौन है, क्या उन लोगों ने इतना भी ग़ौर न किया कि ख़ुदा जिसने उनको पैदा किया है वह उनसे क़ूवत में कहीं बढ़ के है, ग़रज़ वह लोग हमारी आयतों से इन्कार ही करते रहे
- 16 فَأَرۡسَلۡنَا عَلَیۡهِمۡ رِیحࣰا صَرۡصَرࣰا فِیۤ أَیَّامࣲ نَّحِسَاتࣲ لِّنُذِیقَهُمۡ عَذَابَ ٱلۡخِزۡیِ فِی ٱلۡحَیَوٰةِ ٱلدُّنۡیَاۖ وَلَعَذَابُ ٱلۡـَٔاخِرَةِ أَخۡزَىٰۖ وَهُمۡ لَا یُنصَرُونَ
फ़ा'अरसलना अलैहिम रेहान सर्सरन अय्याम नाहिसात लेनुज़िकहुम अज़ाब अल-खिज़ी फ़े अल-हयाति वलाअज़ाबु अल-आख़िरति अख़्ज़ा वहुम युन्सारून
तो हमने भी (तो उनके) नहूसत के दिनों में उन पर बड़ी ज़ोरों की ऑंधी चलाई ताकि दुनिया की ज़िन्दगी में भी उनको रूसवाई के अज़ाब का मज़ा चखा दें और आखेरत का अज़ाब तो और ज्यादा रूसवा करने वाला ही होगा और (फिर) उनको कहीं से मदद भी न मिलेगी
- 17 وَأَمَّا ثَمُودُ فَهَدَیۡنَـٰهُمۡ فَٱسۡتَحَبُّوا۟ ٱلۡعَمَىٰ عَلَى ٱلۡهُدَىٰ فَأَخَذَتۡهُمۡ صَـٰعِقَةُ ٱلۡعَذَابِ ٱلۡهُونِ بِمَا كَانُوا۟ یَكۡسِبُونَ
वा अम्मा थमूदु फहदाइनाहुम फ़ास्तहब्बू अल-अमा अलै फ़ाअहज़तुम साइक़ा अल-अज़ाबि अल-हूनी बिमा कानू यक्सिबून
और रहे समूद तो हमने उनको सीधा रास्ता दिखाया, मगर उन लोगों ने हिदायत के मुक़ाबले में गुमराही को पसन्द किया तो उन की करतूतों की बदौलत ज़िल्लत के अज़ाब की बिजली ने उनको ले डाला
- 18 وَنَجَّیۡنَا ٱلَّذِینَ ءَامَنُوا۟ وَكَانُوا۟ یَتَّقُونَ
वना ज्जैना अल्लाज़ीना अमेनुआ वा कानू यत्तकूना
और जो लोग ईमान लाए और परहेज़गारी करते थे उनको हमने (इस) मुसीबत से बचा लिया
- 19 وَیَوۡمَ یُحۡشَرُ أَعۡدَاۤءُ ٱللَّهِ إِلَى ٱلنَّارِ فَهُمۡ یُوزَعُونَ
वयोम युह्शरु अदाऊ अल्लाह इला अन-नार यूज़औन
और जिस दिन ख़ुदा के दुशमन दोज़ख़ की तरफ हकाए जाएँगे तो ये लोग तरतीब वार खड़े किए जाएँगे
- 20 حَتَّىٰۤ إِذَا مَا جَاۤءُوهَا شَهِدَ عَلَیۡهِمۡ سَمۡعُهُمۡ وَأَبۡصَـٰرُهُمۡ وَجُلُودُهُم بِمَا كَانُوا۟ یَعۡمَلُونَ
इज़ा जाआहुहा शहीद अलैहिम समउहुम और उनकी निगाहें वजुलुदुहुम बिमा कानू यामलून
यहाँ तक की जब सब के सब जहन्नुम के पास जाएँगे तो उनके कान और उनकी ऑंखें और उनके (गोश्त पोस्त) उनके ख़िलाफ उनके मुक़ाबले में उनकी कारस्तानियों की गवाही देगें
- 21 وَقَالُوا۟ لِجُلُودِهِمۡ لِمَ شَهِدتُّمۡ عَلَیۡنَاۖ قَالُوۤا۟ أَنطَقَنَا ٱللَّهُ ٱلَّذِیۤ أَنطَقَ كُلَّ شَیۡءࣲۚ وَهُوَ خَلَقَكُمۡ أَوَّلَ مَرَّةࣲ وَإِلَیۡهِ تُرۡجَعُونَ
व क़ालू लेजुलूदिहिम लेमा शहिद्तुम क़ालू अंतकाना अल्लाह अंतका कुल्ला वहुव ख़लककुम अव्वल मर्रा वा इलय्हि तुरजाउन
और ये लोग अपने आज़ा से कहेंगे कि तुमने हमारे ख़िलाफ क्यों गवाही दी तो वह जवाब देंगे कि जिस ख़ुदा ने हर चीज़ को गोया किया उसने हमको भी (अपनी क़ुदरत से) गोया किया और उसी ने तुमको पहली बार पैदा किया था और (आख़िर) उसी की तरफ लौट कर जाओगे
- 22 وَمَا كُنتُمۡ تَسۡتَتِرُونَ أَن یَشۡهَدَ عَلَیۡكُمۡ سَمۡعُكُمۡ وَلَاۤ أَبۡصَـٰرُكُمۡ وَلَا جُلُودُكُمۡ وَلَـٰكِن ظَنَنتُمۡ أَنَّ ٱللَّهَ لَا یَعۡلَمُ كَثِیرࣰا مِّمَّا تَعۡمَلُونَ
वमा तस्ततिरूनु अन यश्हद अलैकुम समउकुम वला अब्सारुकुम जुलूदुकुम वलाकिन ज़ननतुम अन्ना अल्लाह यालमु मिम्मा तामलून
और (तुम्हारी तो ये हालत थी कि) तुम लोग इस ख्याल से (अपने गुनाहों की) पर्दा दारी भी तो नहीं करते थे कि तुम्हारे कान और तुम्हारी ऑंखे और तुम्हारे आज़ा तुम्हारे बरख़िलाफ गवाही देंगे बल्कि तुम इस ख्याल मे (भूले हुए) थे कि ख़ुदा को तुम्हारे बहुत से कामों की ख़बर ही नहीं
- 23 وَذَ ٰلِكُمۡ ظَنُّكُمُ ٱلَّذِی ظَنَنتُم بِرَبِّكُمۡ أَرۡدَىٰكُمۡ فَأَصۡبَحۡتُم مِّنَ ٱلۡخَـٰسِرِینَ
वज़ा विश्वास लेकुम ज़न्नुकुम अल्लाज़ी बिरब्बिकुम अरदिआकुम फ़ास्बहतुम मिन अल-ख़ासिरीन
और तुम्हारी इस बदख्याली ने जो तुम अपने परवरदिगार के बारे में रखते थे तुम्हें तबाह कर छोड़ा आख़िर तुम घाटे में रहे
- 24 فَإِن یَصۡبِرُوا۟ فَٱلنَّارُ مَثۡوࣰى لَّهُمۡۖ وَإِن یَسۡتَعۡتِبُوا۟ فَمَا هُم مِّنَ ٱلۡمُعۡتَبِینَ
फा-इन यास्बिरु फ़ालनारु मसवा वा-इन यसतइतिबु फ़मा मिन अल-मुताबीन
फिर अगर ये लोग सब्र भी करें तो भी इनका ठिकाना दोज़ख़ ही है और अगर तौबा करें तो भी इनकी तौबा क़ुबूल न की जाएगी
- 25 ۞ وَقَیَّضۡنَا لَهُمۡ قُرَنَاۤءَ فَزَیَّنُوا۟ لَهُم مَّا بَیۡنَ أَیۡدِیهِمۡ وَمَا خَلۡفَهُمۡ وَحَقَّ عَلَیۡهِمُ ٱلۡقَوۡلُ فِیۤ أُمَمࣲ قَدۡ خَلَتۡ مِن قَبۡلِهِم مِّنَ ٱلۡجِنِّ وَٱلۡإِنسِۖ إِنَّهُمۡ كَانُوا۟ خَـٰسِرِینَ
वा क़य्यद्ना लाहुम कुरान फ़ज़ैय्यनू मा बयना अय्दिहिम वमा ख़लेफ़हुम वहक़ अलय्हिमु अल क़ौलु उमम क़द ख़लत मिन मिन अल-जिन्न इन्नाहुम कानू ख़ासिरीन
और हमने (गोया ख़ुद शैतान को) उनका हमनशीन मुक़र्रर कर दिया था तो उन्होने उनके अगले पिछले तमाम उमूर उनकी नज़रों में भले कर दिखाए तो जिन्नात और इन्सानो की उम्मतें जो उनसे पहले गुज़र चुकी थीं उनके शुमूल (साथ) में (अज़ाब का) वायदा उनके हक़ में भी पूरा हो कर रहा बेशक ये लोग अपने घाटे के दरपै थे
- 26 وَقَالَ ٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ لَا تَسۡمَعُوا۟ لِهَـٰذَا ٱلۡقُرۡءَانِ وَٱلۡغَوۡا۟ فِیهِ لَعَلَّكُمۡ تَغۡلِبُونَ
व काला अल्लाज़ीना कफ़रू तस्मऊ लेहाज़ा वल-ग़वा फ़िये लअलकुम तग़्लिबून
और कुफ्फ़ार कहने लगे कि इस क़ुरान को सुनो ही नहीं और जब पढ़ें (तो) इसके (बीच) में ग़ुल मचा दिया करो ताकि (इस तरकीब से) तुम ग़ालिब आ जाओ
- 27 فَلَنُذِیقَنَّ ٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ عَذَابࣰا شَدِیدࣰا وَلَنَجۡزِیَنَّهُمۡ أَسۡوَأَ ٱلَّذِی كَانُوا۟ یَعۡمَلُونَ
फ़लानुज़ीकन्ना अल्लाज़ीना कफ़रू अज़ाबाँ शदीदन वा लन ज़ियन्नहुम असवा अल्लाज़ी कानू यामलून
तो हम भी काफ़िरों को सख्त अज़ाब के मज़े चखाएँगे और इनकी कारस्तानियों की बहुत बड़ी सज़ा ये दोज़ख़ है
- 28 ذَ ٰلِكَ جَزَاۤءُ أَعۡدَاۤءِ ٱللَّهِ ٱلنَّارُۖ لَهُمۡ فِیهَا دَارُ ٱلۡخُلۡدِ جَزَاۤءَۢ بِمَا كَانُوا۟ بِـَٔایَـٰتِنَا یَجۡحَدُونَ
ज़ा विश्वास लेका जज़ाउ अअदा अल्लाह अन-नार लाहुम फ़िहा दार अल-खुल्दि जज़ा बिमा कानू बे-आ-या-ती-ना यजहदूना
ख़ुदा के दुशमनों का बदला है कि वह जो हमरी आयतों से इन्कार करते थे उसकी सज़ा में उनके लिए उसमें हमेशा (रहने) का घर है,
- 29 وَقَالَ ٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ رَبَّنَاۤ أَرِنَا ٱلَّذَیۡنِ أَضَلَّانَا مِنَ ٱلۡجِنِّ وَٱلۡإِنسِ نَجۡعَلۡهُمَا تَحۡتَ أَقۡدَامِنَا لِیَكُونَا مِنَ ٱلۡأَسۡفَلِینَ
व काला अल्लाज़ीना कफ़रू रब्बना अरेना अल्लाज़ीन अदल्लाना मिन अल-जिन्न वल-इन्स नजअलहुमा तहता अक़्दामिना ले-को-ना मिन अल-अस्फ़ालीन
और (क़यामत के दिन) कुफ्फ़ार कहेंगे कि ऐ हमारे परवरदिगार जिनों और इन्सानों में से जिन लोगों ने हमको गुमराह किया था (एक नज़र) उनको हमें दिखा दे कि हम उनको पाँव तले (रौन्द) डालें ताकि वह ख़ूब ज़लील हों
- 30 إِنَّ ٱلَّذِینَ قَالُوا۟ رَبُّنَا ٱللَّهُ ثُمَّ ٱسۡتَقَـٰمُوا۟ تَتَنَزَّلُ عَلَیۡهِمُ ٱلۡمَلَـٰۤىِٕكَةُ أَلَّا تَخَافُوا۟ وَلَا تَحۡزَنُوا۟ وَأَبۡشِرُوا۟ بِٱلۡجَنَّةِ ٱلَّتِی كُنتُمۡ تُوعَدُونَ
इन्ना अल्लाज़ीना अल्लाह सुम्म इस्तक़ामू ततनज़्ज़लु अलय्हिमु अल-मलाइका अल्ला तखाफ़ू तहज़नू और खुशखबरी पाओ बिल जन्नति अल-लाती तुआदूनों
और जिन लोगों ने (सच्चे दिल से) कहा कि हमारा परवरदिगार तो (बस) ख़ुदा है, फिर वह उसी पर भी क़ायम भी रहे उन पर मौत के वक्त (रहमत के) फ़रिश्ते नाज़िल होंगे (और कहेंगे) कि कुछ ख़ौफ न करो और न ग़म खाओ और जिस बेहिश्त का तुमसे वायदा किया गया था उसकी ख़ुशियां मनाओ
- 31 نَحۡنُ أَوۡلِیَاۤؤُكُمۡ فِی ٱلۡحَیَوٰةِ ٱلدُّنۡیَا وَفِی ٱلۡـَٔاخِرَةِۖ وَلَكُمۡ فِیهَا مَا تَشۡتَهِیۤ أَنفُسُكُمۡ وَلَكُمۡ فِیهَا مَا تَدَّعُونَ
नह्नु औलियाउकुम फ़े अल-हयाति दुनिया वफ़ी वलकुम फ़िहा तश्तही अनफुसुकुम वलकुम फ़िहा तद्दऔं
हम दुनिया की ज़िन्दगी में तुम्हारे दोस्त थे और आखेरत में भी तुम्हारे (रफ़ीक़) हैं और जिस चीज़ का भी तुम्हार जी चाहे बेहिश्त में तुम्हारे वास्ते मौजूद है और जो चीज़ तलब करोगे वहाँ तुम्हारे लिए (हाज़िर) होगी
- 32 نُزُلࣰا مِّنۡ غَفُورࣲ رَّحِیمࣲ
नुज़ुलन
(ये) बख्शने वाले मेहरबान (ख़ुदा) की तरफ़ से (तुम्हारी मेहमानी है)
- 33 وَمَنۡ أَحۡسَنُ قَوۡلࣰا مِّمَّن دَعَاۤ إِلَى ٱللَّهِ وَعَمِلَ صَـٰلِحࣰا وَقَالَ إِنَّنِی مِنَ ٱلۡمُسۡلِمِینَ
अहसनु कौलन मिम्मन दाआ इला अल्लाह वा अमिल सालेह व काला इन्नानी मिन अल-मुस्लिमीन
और इस से बेहतर किसकी बात हो सकती है जो (लोगों को) ख़ुदा की तरफ बुलाए और अच्छे अच्छे काम करे और कहे कि मैं भी यक़ीनन (ख़ुदा के) फरमाबरदार बन्दों में हूं
- 34 وَلَا تَسۡتَوِی ٱلۡحَسَنَةُ وَلَا ٱلسَّیِّئَةُۚ ٱدۡفَعۡ بِٱلَّتِی هِیَ أَحۡسَنُ فَإِذَا ٱلَّذِی بَیۡنَكَ وَبَیۡنَهُۥ عَدَ ٰوَةࣱ كَأَنَّهُۥ وَلِیٌّ حَمِیمࣱ
तस्तवि अल-हसना अस-सय्यिअह इद्फे बियाल्ती हेया अहसनु फ़ैज़ा अल्लाज़ी बैनक उबैनहु अदा विश्वास वह काअन्नाहु वलीय्युन हमीम
और भलाई बुराई (कभी) बराबर नहीं हो सकती तो (सख्त कलामी का) ऐसे तरीके से जवाब दो जो निहायत अच्छा हो (ऐसा करोगे) तो (तुम देखोगे) जिस में और तुममें दुशमनी थी गोया वह तुम्हारा दिल सोज़ दोस्त है
- 35 وَمَا یُلَقَّىٰهَاۤ إِلَّا ٱلَّذِینَ صَبَرُوا۟ وَمَا یُلَقَّىٰهَاۤ إِلَّا ذُو حَظٍّ عَظِیمࣲ
वमा युलक्काहा इल्ला अल्लाज़ीना सबरू वमा युलक्काहा इल्ला ज़ु हज़् अज़ीम
ये बात बस उन्हीं लोगों को हासिल हुईहै जो सब्र करने वाले हैं और उन्हीं लोगों को हासिल होती है जो बड़े नसीबवर हैं
- 36 وَإِمَّا یَنزَغَنَّكَ مِنَ ٱلشَّیۡطَـٰنِ نَزۡغࣱ فَٱسۡتَعِذۡ بِٱللَّهِۖ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِیعُ ٱلۡعَلِیمُ
वा इम्मा यान्ज़गन्नक मिन अश-शैतान नज़्ग फ़स्तइज़ इन्नाहु हुव अस-समीउ अल-अलीम
और अगर तुम्हें शैतान की तरफ से वसवसा पैदा हो तो ख़ुदा की पनाह माँग लिया करो बेशक वह (सबकी) सुनता जानता है
- 37 وَمِنۡ ءَایَـٰتِهِ ٱلَّیۡلُ وَٱلنَّهَارُ وَٱلشَّمۡسُ وَٱلۡقَمَرُۚ لَا تَسۡجُدُوا۟ لِلشَّمۡسِ وَلَا لِلۡقَمَرِ وَٱسۡجُدُوا۟ لِلَّهِ ٱلَّذِی خَلَقَهُنَّ إِن كُنتُمۡ إِیَّاهُ تَعۡبُدُونَ
अल्लैलु वल्नहारु वश शम्सु तसजुदु लिल शम्स लिल-कमर वस्जुदू लिल्लाहिह अल्लाज़ी ख़लक़हुन्ना इन इय्याहु ताबुदून
और उसकी (कुदरत की) निशानियों में से रात और दिन और सूरज और चाँद हैं तो तुम लोग न सूरज को सजदा करो और न चाँद को, और अगर तुम ख़ुदा ही की इबादत करनी मंज़ूर रहे तो बस उसी को सजदा करो जिसने इन चीज़ों को पैदा किया है
- 38 فَإِنِ ٱسۡتَكۡبَرُوا۟ فَٱلَّذِینَ عِندَ رَبِّكَ یُسَبِّحُونَ لَهُۥ بِٱلَّیۡلِ وَٱلنَّهَارِ وَهُمۡ لَا یَسۡـَٔمُونَ ۩
फा-इनि इस्तकबरू फ़ल्लाज़ीना एंदा रब्बिक युसब्बिहूना बिलायल वल्नहार वहुम यासमून
पस अगर ये लोग सरकशी करें तो (ख़ुदा को भी उनकी परवाह नहीं) वो लोग (फ़रिश्ते) तुम्हारे परवरदिगार की बारगाह में हैं वह रात दिन उसकी तसबीह करते रहते हैं और वह लोग उकताते भी नहीं
- 39 وَمِنۡ ءَایَـٰتِهِۦۤ أَنَّكَ تَرَى ٱلۡأَرۡضَ خَـٰشِعَةࣰ فَإِذَاۤ أَنزَلۡنَا عَلَیۡهَا ٱلۡمَاۤءَ ٱهۡتَزَّتۡ وَرَبَتۡۚ إِنَّ ٱلَّذِیۤ أَحۡیَاهَا لَمُحۡیِ ٱلۡمَوۡتَىٰۤۚ إِنَّهُۥ عَلَىٰ كُلِّ شَیۡءࣲ قَدِیرٌ
अन्नक तरा अल-अर्द अलय्हा अल-मा इहतज़्ज़त वरबत इन्ना अहयाहा लामुही इन्नाहु अला कुल्लि शै क़दीर
उसकी क़ुदरत की निशानियों में से एक ये भी है कि तुम ज़मीन को ख़़ुश्क और बेआब ओ गयाह देखते हो फिर जब हम उस पर पानी बरसा देते हैं तो लहलहाने लगती है और फूल जाती है जिस ख़ुदा ने (मुर्दा) ज़मीन को ज़िन्दा किया वह यक़ीनन मुर्दों को भी जिलाएगा बेशक वह हर चीज़ पर क़ादिर है
- 40 إِنَّ ٱلَّذِینَ یُلۡحِدُونَ فِیۤ ءَایَـٰتِنَا لَا یَخۡفَوۡنَ عَلَیۡنَاۤۗ أَفَمَن یُلۡقَىٰ فِی ٱلنَّارِ خَیۡرٌ أَم مَّن یَأۡتِیۤ ءَامِنࣰا یَوۡمَ ٱلۡقِیَـٰمَةِۚ ٱعۡمَلُوا۟ مَا شِئۡتُمۡ إِنَّهُۥ بِمَا تَعۡمَلُونَ بَصِیرٌ
इन्ना अल्लाज़ीना युल्हिदून आयातिना यख़्फौना अफामन युल्का फ़े अन-नार खैरुन मेन आमीन यौम आमलू शे'तुम इन्नाहु बिमा तामलून बसीरुन
जो लोग हमारी आयतों में हेर फेर पैदा करते हैं वह हरगिज़ हमसे पोशीदा नहीं हैं भला जो शख्स दोज़ख़ में डाला जाएगा वह बेहतर है या वह शख्स जो क़यामत के दिन बेख़ौफ व ख़तर आएगा (ख़ैर) जो चाहो सो करो (मगर) जो कुछ तुम करते हो वह (ख़ुदा) उसको देख रहा है
- 41 إِنَّ ٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ بِٱلذِّكۡرِ لَمَّا جَاۤءَهُمۡۖ وَإِنَّهُۥ لَكِتَـٰبٌ عَزِیزࣱ
इन्ना अल्लाज़ीना कफ़रू बिल्ज़िक्रि लम्मा वा इन्नाहु लकिताबुन अज़ीज़
जिन लोगों ने नसीहत को जब वह उनके पास आयी न माना (वह अपना नतीजा देख लेंगे) और ये क़ुरान तो यक़ीनी एक आली मरतबा किताब है
- 42 لَّا یَأۡتِیهِ ٱلۡبَـٰطِلُ مِنۢ بَیۡنِ یَدَیۡهِ وَلَا مِنۡ خَلۡفِهِۦۖ تَنزِیلࣱ مِّنۡ حَكِیمٍ حَمِیدࣲ
ला यातिहि अल-बातिल बय्न यदय्हि तंज़ील हकीम
कि झूठ न तो उसके आगे फटक सकता है और न उसके पीछे से और खूबियों वाले दाना (ख़ुदा) की बारगाह से नाज़िल हुई है
- 43 مَّا یُقَالُ لَكَ إِلَّا مَا قَدۡ قِیلَ لِلرُّسُلِ مِن قَبۡلِكَۚ إِنَّ رَبَّكَ لَذُو مَغۡفِرَةࣲ وَذُو عِقَابٍ أَلِیمࣲ
मा यूकालु लका इल्ला क़द क़िला लिलर्रुसुलि मिन इन्ना रब्बक लज़ू मग़फ़िरत वज़ू इक़ाब
(ऐ रसूल) तुमसे से भी बस वही बातें कहीं जाती हैं जो तुमसे और रसूलों से कही जा चुकी हैं बेशक तुम्हारा परवरदिगार बख्शने वाला भी है और दर्दनाक अज़ाब वाला भी है
- 44 وَلَوۡ جَعَلۡنَـٰهُ قُرۡءَانًا أَعۡجَمِیࣰّا لَّقَالُوا۟ لَوۡلَا فُصِّلَتۡ ءَایَـٰتُهُۥۤۖ ءَا۬عۡجَمِیࣱّ وَعَرَبِیࣱّۗ قُلۡ هُوَ لِلَّذِینَ ءَامَنُوا۟ هُدࣰى وَشِفَاۤءࣱۚ وَٱلَّذِینَ لَا یُؤۡمِنُونَ فِیۤ ءَاذَانِهِمۡ وَقۡرࣱ وَهُوَ عَلَیۡهِمۡ عَمًىۚ أُو۟لَـٰۤىِٕكَ یُنَادَوۡنَ مِن مَّكَانِۭ بَعِیدࣲ
वलाउ जाअलनाह कुरान अजमी लाक़ालू लौला फुस्सिलत आअजमिय्य वा अरबिय्यु क़ुल हुव लिल्लाज़िना अमेनुआ हुदन वश्फा वल्लाज़ीना यूमीनून अज़ानिहिम वक्र वहुव अलैहिम अमी उलाइक यूनादौना मिन मकान
और अगर हम इस क़ुरान को अरबी ज़बान के सिवा दूसरी ज़बान में नाज़िल करते तो ये लोग ज़रूर कह न बैठते कि इसकी आयतें (हमारी) ज़बान में क्यों तफ़सीलदार बयान नहीं की गयी क्या (खूब क़ुरान तो) अजमी और (मुख़ातिब) अरबी (ऐ रसूल) तुम कह दो कि ईमानदारों के लिए तो ये (कुरान अज़सरतापा) हिदायत और (हर मर्ज़ की) शिफ़ा है और जो लोग ईमान नहीं रखते उनके कानों (के हक़) में गिरानी (बहरापन) है और वह (कुरान) उनके हक़ में नाबीनाई (का सबब) है तो गिरानी की वजह से गोया वह लोग बड़ी दूर की जगह से पुकारे जाते है
- 45 وَلَقَدۡ ءَاتَیۡنَا مُوسَى ٱلۡكِتَـٰبَ فَٱخۡتُلِفَ فِیهِۚ وَلَوۡلَا كَلِمَةࣱ سَبَقَتۡ مِن رَّبِّكَ لَقُضِیَ بَیۡنَهُمۡۚ وَإِنَّهُمۡ لَفِی شَكࣲّ مِّنۡهُ مُرِیبࣲ
व-लक्द अतिना मूसा अल किताब फ़ख़्तुलिफ़ा कलिमा सबकत मिन रब्बिक लक़्सिया वा इन्नाहुम लाफ़ी शक्क मुरीबीन
(और नहीं सुनते) और हम ही ने मूसा को भी किताब (तौरैत) अता की थी तो उसमें भी इसमें एख्तेलाफ किया गया और अगर तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से एक बात पहले न हो चुकी होती तो उनमें कब का फैसला कर दिया गया होता, और ये लोग ऐसे शक़ में पड़े हुए हैं जिसने उन्हें बेचैन कर दिया है
- 46 مَّنۡ عَمِلَ صَـٰلِحࣰا فَلِنَفۡسِهِۦۖ وَمَنۡ أَسَاۤءَ فَعَلَیۡهَاۗ وَمَا رَبُّكَ بِظَلَّـٰمࣲ لِّلۡعَبِیدِ
अमिल सालेह फ़ालेनफ़्सिही असा वमा रब्बुक बेज़ल्लाम लिल-अबीद
जिसने अच्छे अच्छे काम किये तो अपने नफे क़े लिए और जो बुरा काम करे उसका वबाल भी उसी पर है और तुम्हारा परवरदिगार तो बन्दों पर (कभी) ज़ुल्म करने वाला नहीं
- 47 ۞ إِلَیۡهِ یُرَدُّ عِلۡمُ ٱلسَّاعَةِۚ وَمَا تَخۡرُجُ مِن ثَمَرَ ٰتࣲ مِّنۡ أَكۡمَامِهَا وَمَا تَحۡمِلُ مِنۡ أُنثَىٰ وَلَا تَضَعُ إِلَّا بِعِلۡمِهِۦۚ وَیَوۡمَ یُنَادِیهِمۡ أَیۡنَ شُرَكَاۤءِی قَالُوۤا۟ ءَاذَنَّـٰكَ مَا مِنَّا مِن شَهِیدࣲ
इलायहि युरद्दु इल्मु वमा तख़रुज मिन सामारा विश्वास ते अक्मामिहा वमा तहमिलु उन्सा तज़ऊ इल्ला बिइल्मिहि वयोम यूनादिहिम ऐना शुरकाई क़ालू अज़ाना मिन्ना मिन
क़यामत के इल्म का हवाला उसी की तरफ है (यानि वही जानता है) और बगैर उसके इल्म व (इरादे) के न तो फल अपने पौरों से निकलते हैं और न किसी औरत को हमल रखता है और न वह बच्चा जनती है और जिस दिन (ख़ुदा) उन (मुशरेकीन) को पुकारेगा और पूछेगा कि मेरे शरीक कहाँ हैं- वह कहेंगे हम तो तुझ से अर्ज़ कर चूके हैं कि हम में से कोई (उनसे) वाकिफ़ ही नहीं
- 48 وَضَلَّ عَنۡهُم مَّا كَانُوا۟ یَدۡعُونَ مِن قَبۡلُۖ وَظَنُّوا۟ مَا لَهُم مِّن مَّحِیصࣲ
वज़ल्ला मा कानू यदऊन मिन मिन माहिस
और इससे पहले जिन माबूदों की परसतिश करते थे वह ग़ायब हो गये और ये लोग समझ जाएगें कि उनके लिए अब मुख़लिसी नहीं
- 49 لَّا یَسۡـَٔمُ ٱلۡإِنسَـٰنُ مِن دُعَاۤءِ ٱلۡخَیۡرِ وَإِن مَّسَّهُ ٱلشَّرُّ فَیَـُٔوسࣱ قَنُوطࣱ
ला यासमु अल-इन्सान मिन दुआ अल-खैरी वा-इन मस्साहु अश-शर्रु फ़याउस क़नूत
इन्सान भलाई की दुआए मांगने से तो कभी उकताता नहीं और अगर उसको कोई तकलीफ पहुँच जाए तो (फौरन) न उम्मीद और बेआस हो जाता है
- 50 وَلَىِٕنۡ أَذَقۡنَـٰهُ رَحۡمَةࣰ مِّنَّا مِنۢ بَعۡدِ ضَرَّاۤءَ مَسَّتۡهُ لَیَقُولَنَّ هَـٰذَا لِی وَمَاۤ أَظُنُّ ٱلسَّاعَةَ قَاۤىِٕمَةࣰ وَلَىِٕن رُّجِعۡتُ إِلَىٰ رَبِّیۤ إِنَّ لِی عِندَهُۥ لَلۡحُسۡنَىٰۚ فَلَنُنَبِّئَنَّ ٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ بِمَا عَمِلُوا۟ وَلَنُذِیقَنَّهُم مِّنۡ عَذَابٍ غَلِیظࣲ
अज़ाक़ना रहमतन मिन्ना बादि ज़र्रा मस्तुहु लैकुल्लन्न हाज़ा लेइ अज़ुन्नु अस-साआ क़ाइमा वलाइन रुजिप्तु इला रब्बी इन्ना लेइ इंदहु लिल्हुस्ना फ़ालुनुब्बिअन्न अल्लाज़ीना कफ़रू बिमा वलानुज़ीकन्नाहुम अज़ाबिन ग़लीज़
और अगर उसको कोई तकलीफ पहुँच जाने के बाद हम उसको अपनी रहमत का मज़ा चखाएँ तो यक़ीनी कहने लगता है कि ये तो मेरे लिए ही है और मैं नहीं ख़याल करता कि कभी क़यामत बरपा होगी और अगर (क़यामत हो भी और) मैं अपने परवरदिगार की तरफ़ लौटाया भी जाऊँ तो भी मेरे लिए यक़ीनन उसके यहाँ भलाई ही तो है जो आमाल करते रहे हम उनको (क़यामत में) ज़रूर बता देंगें और उनको सख्त अज़ाब का मज़ा चख़ाएगें
- 51 وَإِذَاۤ أَنۡعَمۡنَا عَلَى ٱلۡإِنسَـٰنِ أَعۡرَضَ وَنَـَٔا بِجَانِبِهِۦ وَإِذَا مَسَّهُ ٱلشَّرُّ فَذُو دُعَاۤءٍ عَرِیضࣲ
अनअम्ना अलै अल-इंसान अअरबा वेनाया बेजानिबिहि वा इज़ा मस्सहु अश-शर्रु फ़ज़ू दुआ अरीज़
(वह अलग) और जब हम इन्सान पर एहसान करते हैं तो (हमारी तरफ से) मुँह फेर लेता है और मुँह बदलकर चल देता है और जब उसे तकलीफ़ पहुँचती है तो लम्बी चौड़ी दुआएँ करने लगता है
- 52 قُلۡ أَرَءَیۡتُمۡ إِن كَانَ مِنۡ عِندِ ٱللَّهِ ثُمَّ كَفَرۡتُم بِهِۦ مَنۡ أَضَلُّ مِمَّنۡ هُوَ فِی شِقَاقِۭ بَعِیدࣲ
क़ुल अराअतुम इन काना एंदे अल्लाह सुम्म बेहि अदल्लु हुव फ़े शकाक
(ऐ रसूल) तुम कहो कि भला देखो तो सही कि अगर ये (क़ुरान) ख़ुदा की बारगाह से (आया) हो और फिर तुम उससे इन्कार करो तो जो (ऐसे) परले दर्जे की मुख़ालेफत में (पड़ा) हो उससे बढ़कर और कौन गुमराह हो सकता है
- 53 سَنُرِیهِمۡ ءَایَـٰتِنَا فِی ٱلۡـَٔافَاقِ وَفِیۤ أَنفُسِهِمۡ حَتَّىٰ یَتَبَیَّنَ لَهُمۡ أَنَّهُ ٱلۡحَقُّۗ أَوَلَمۡ یَكۡفِ بِرَبِّكَ أَنَّهُۥ عَلَىٰ كُلِّ شَیۡءࣲ شَهِیدٌ
सनुरिहें आयातिना फ़े अल-अफाक अनफुसिहिम हत्ता यतबय्यना लाहुम अन्नाहु औलम यक्फि बिरब्बिक अला कुल्लि शै शहीद
हम अनक़रीब ही अपनी (क़ुदरत) की निशानियाँ अतराफ (आलम) में और ख़़ुद उनमें भी दिखा देगें यहाँ तक कि उन पर ज़ाहिर हो जाएगा कि वही यक़ीनन हक़ है क्या तुम्हारा परवरदिगार इसके लिए काफी नहीं कि वह हर चीज़ पर क़ाबू रखता है
- 54 أَلَاۤ إِنَّهُمۡ فِی مِرۡیَةࣲ مِّن لِّقَاۤءِ رَبِّهِمۡۗ أَلَاۤ إِنَّهُۥ بِكُلِّ شَیۡءࣲ مُّحِیطُۢ
अला इन्नाहुम फ़े मरयम मिन लिक़ाए अला इन्नाहु बिकुल्लि शै मुहित
देखो ये लोग अपने परवरदिगार के रूबरू हाज़िर होने से शक़ में (पड़े) हैं सुन रखो वह हर चीज़ पर हावी है
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