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Az-Zukhruf

अज़-ज़ुख़्रुफ़

सोने का आभूषण

89 ayahsMeccanहिन्दी

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بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَـٰنِ ٱلرَّحِیمِ

बिस्मि अल्लाह अर-रहमान अर-रहीम

  1. 1 حمۤ

    हम

    हा मीम

  2. 2 وَٱلۡكِتَـٰبِ ٱلۡمُبِینِ

    वल किताबि अल-मुबीनी

    रौशन किताब (क़ुरान) की क़सम

  3. 3 إِنَّا جَعَلۡنَـٰهُ قُرۡءَ ٰ⁠ نًا عَرَبِیࣰّا لَّعَلَّكُمۡ تَعۡقِلُونَ

    जाअलनाह कुरान विश्वास ना अरबी लअल्लकुम तअक़िलून

    हमने इस किताब को अरबी ज़बान कुरान ज़रूर बनाया है ताकि तुम समझो

  4. 4 وَإِنَّهُۥ فِیۤ أُمِّ ٱلۡكِتَـٰبِ لَدَیۡنَا لَعَلِیٌّ حَكِیمٌ

    वा इन्नाहु उम्मी अल किताब लाअली हकीमुन

    और बेशक ये (क़ुरान) असली किताब (लौह महफूज़) में (भी जो) मेरे पास है लिखी हुई है (और) यक़ीनन बड़े रूतबे की (और) पुरअज़ हिकमत है

  5. 5 أَفَنَضۡرِبُ عَنكُمُ ٱلذِّكۡرَ صَفۡحًا أَن كُنتُمۡ قَوۡمࣰا مُّسۡرِفِینَ

    अफा नाद्रिबु अनकुमु अज़-ज़िक्र सफ्हन अन क़ौमन मुसरिफ़ीना

    भला इस वजह से कि तुम ज्यादती करने वाले लोग हो हम तुमको नसीहत करने से मुँह मोड़ेंगे (हरगिज़ नहीं)

  6. 6 وَكَمۡ أَرۡسَلۡنَا مِن نَّبِیࣲّ فِی ٱلۡأَوَّلِینَ

    मिन नबी फ़े अल-अव्वालीन

    और हमने अगले लोगों को बहुत से पैग़म्बर भेजे थे

  7. 7 وَمَا یَأۡتِیهِم مِّن نَّبِیٍّ إِلَّا كَانُوا۟ بِهِۦ یَسۡتَهۡزِءُونَ

    वमा या'तिहिम मिन नबी इल्ला कानू बेहि यसतहज़िउन

    और कोई पैग़म्बर उनके पास ऐसा नहीं आया जिससे इन लोगों ने ठट्ठे नहीं किए हो

  8. 8 فَأَهۡلَكۡنَاۤ أَشَدَّ مِنۡهُم بَطۡشࣰا وَمَضَىٰ مَثَلُ ٱلۡأَوَّلِینَ

    फ़ा'हलक्ना अशद्द बत्श वमाज़ा मिसाल अल-अव्वालीन

    तो उनमें से जो ज्यादा ज़ोरावर थे तो उनको हमने हलाक कर मारा और (दुनिया में) अगलों के अफ़साने जारी हो गए

  9. 9 وَلَىِٕن سَأَلۡتَهُم مَّنۡ خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَ ٰ⁠تِ وَٱلۡأَرۡضَ لَیَقُولُنَّ خَلَقَهُنَّ ٱلۡعَزِیزُ ٱلۡعَلِیمُ

    वलाइन सअलतहुम ख़लक़ अस-समावा विश्वास ते वल अर्द लयकुल्लुन्न ख़लक़हुन्ना अल-अज़ीज़ अल-अलीम

    और (ऐ रसूल) अगर तुम उनसे पूछो कि सारे आसमान व ज़मीन को किसने पैदा किया तो वह ज़रूर कह देंगे कि उनको बड़े वाक़िफ़कार ज़बरदस्त (ख़ुदा ने) पैदा किया है

  10. 10 ٱلَّذِی جَعَلَ لَكُمُ ٱلۡأَرۡضَ مَهۡدࣰا وَجَعَلَ لَكُمۡ فِیهَا سُبُلࣰا لَّعَلَّكُمۡ تَهۡتَدُونَ

    अल्लाज़ी जाला लकुमु अल-अर्द मेहदान वजाला लकुम फ़िहा सुबुलन लअल्लकुम तहतेदून

    जिसने तुम लोगों के वास्ते ज़मीन का बिछौना बनाया और (फिर) उसमें तुम्हारे नफ़े के लिए रास्ते बनाए ताकि तुम राह मालूम करो

  11. 11 وَٱلَّذِی نَزَّلَ مِنَ ٱلسَّمَاۤءِ مَاۤءَۢ بِقَدَرࣲ فَأَنشَرۡنَا بِهِۦ بَلۡدَةࣰ مَّیۡتࣰاۚ كَذَ ٰ⁠لِكَ تُخۡرَجُونَ

    वल्लाज़ी नज़्ज़ाल मिन अस-समा मा बेकदर फा अनशर्ना बेहि बल्दा मैत कज़ा विश्वास लेका तुख़्रजून

    और जिसने एक (मुनासिब) अन्दाजे क़े साथ आसमान से पानी बरसाया फिर हम ही ने उसके (ज़रिए) से मुर्दा (परती) शहर को ज़िन्दा (आबाद) किया उसी तरह तुम भी (क़यामत के दिन क़ब्रों से) निकाले जाओगे

  12. 12 وَٱلَّذِی خَلَقَ ٱلۡأَزۡوَ ٰ⁠جَ كُلَّهَا وَجَعَلَ لَكُم مِّنَ ٱلۡفُلۡكِ وَٱلۡأَنۡعَـٰمِ مَا تَرۡكَبُونَ

    वल्लाज़ी ख़लक़ अल-अज़्वा विश्वास जा कुल्लाहा वजाला मिन अल-फुल्क वल अनआम तर्कबून

    और जिसने हर किस्म की चीज़े पैदा कीं और तुम्हारे लिए कश्तियां बनायीं और चारपाए (पैदा किए) जिन पर तुम सवार होते हो

  13. 13 لِتَسۡتَوُۥا۟ عَلَىٰ ظُهُورِهِۦ ثُمَّ تَذۡكُرُوا۟ نِعۡمَةَ رَبِّكُمۡ إِذَا ٱسۡتَوَیۡتُمۡ عَلَیۡهِ وَتَقُولُوا۟ سُبۡحَـٰنَ ٱلَّذِی سَخَّرَ لَنَا هَـٰذَا وَمَا كُنَّا لَهُۥ مُقۡرِنِینَ

    लेतास्तुवा अला ज़ुहूरिही सुम्म तज़्कुरू नियमत रब्बिकुम इज़ा इस्तवैतुम अलय्हि व तक़ूलू सुभान अल्लाज़ी सख्खर लना हाज़ा वमा कुन्ना मुक़्रिनीना

    ताकि तुम उसकी पीठ पर चढ़ो और जब उस पर (अच्छी तरह) सीधे हो बैठो तो अपने परवरदिगार का एहसान माना करो और कहो कि वह (ख़ुदा हर ऐब से) पाक है जिसने इसको हमारा ताबेदार बनाया हालॉकि हम तो ऐसे (ताक़तवर) न थे कि उस पर क़ाबू पाते

  14. 14 وَإِنَّاۤ إِلَىٰ رَبِّنَا لَمُنقَلِبُونَ

    इला रब्बीना लमुन्क़लीबून

    और हमको तो यक़ीनन अपने परवरदिगार की तरफ लौट कर जाना है

  15. 15 وَجَعَلُوا۟ لَهُۥ مِنۡ عِبَادِهِۦ جُزۡءًاۚ إِنَّ ٱلۡإِنسَـٰنَ لَكَفُورࣱ مُّبِینٌ

    वजअलू इबादिहि जुज़-अन इन्ना अल-इंसान लाकाफूर मुबीन

    और उन लोगों ने उसके बन्दों में से उसके लिए औलाद क़रार दी है इसमें शक़ नहीं कि इन्सान खुल्लम खुल्ला बड़ा ही नाशक्रा है

  16. 16 أَمِ ٱتَّخَذَ مِمَّا یَخۡلُقُ بَنَاتࣲ وَأَصۡفَىٰكُم بِٱلۡبَنِینَ

    अमि इत्तख़ाज़ा मेमा याख़्लुक़ु बनात वा-अस-फा-कुम बेलबनीन

    क्या उसने अपनी मख़लूक़ात में से ख़ुद तो बेटियाँ ली हैं और तुमको चुनकर बेटे दिए हैं

  17. 17 وَإِذَا بُشِّرَ أَحَدُهُم بِمَا ضَرَبَ لِلرَّحۡمَـٰنِ مَثَلࣰا ظَلَّ وَجۡهُهُۥ مُسۡوَدࣰّا وَهُوَ كَظِیمٌ

    वा इज़ा बुश्शिर अहदुहुम बिमा दारबा लिल रहमान ज़ल्ला वज्हुहु मुसव्वद्दन वहुव क़ाज़िम

    हालॉकि जब उनमें किसी शख़्श को उस चीज़ (बेटी) की ख़ुशख़बरी दी जाती है जिसकी मिसल उसने ख़ुदा के लिए बयान की है तो वह (ग़ुस्से के मारे) सियाह हो जाता है और ताव पेंच खाने लगता है

  18. 18 أَوَمَن یُنَشَّؤُا۟ فِی ٱلۡحِلۡیَةِ وَهُوَ فِی ٱلۡخِصَامِ غَیۡرُ مُبِینࣲ

    अव मन यूनश्शौ फ़े अल-हिल्यति वहुव फ़े अल-खिसामी ग़ैर मुबीन

    क्या वह (औरत) जो ज़ेवरों में पाली पोसी जाए और झगड़े में (अच्छी तरह) बात तक न कर सकें (ख़ुदा की बेटी हो सकती है)

  19. 19 وَجَعَلُوا۟ ٱلۡمَلَـٰۤىِٕكَةَ ٱلَّذِینَ هُمۡ عِبَـٰدُ ٱلرَّحۡمَـٰنِ إِنَـٰثًاۚ أَشَهِدُوا۟ خَلۡقَهُمۡۚ سَتُكۡتَبُ شَهَـٰدَتُهُمۡ وَیُسۡـَٔلُونَ

    वजअलू अल-मलाइका अल्लाज़ीना हुम इबादु अर-रहमान इनासा अशहिदु ख़लक़हुम सतुक्ताबु शहादतुहुम वयुसेलूना

    और उन लोगों ने फ़रिश्तों को कि वह भी ख़ुदा के बन्दे हैं (ख़ुदा की) बेटियाँ बनायी हैं लोग फरिश्तों की पैदाइश क्यों खड़े देख रहे थे अभी उनकी शहादत क़लम बन्द कर ली जाती है

  20. 20 وَقَالُوا۟ لَوۡ شَاۤءَ ٱلرَّحۡمَـٰنُ مَا عَبَدۡنَـٰهُمۗ مَّا لَهُم بِذَ ٰ⁠لِكَ مِنۡ عِلۡمٍۖ إِنۡ هُمۡ إِلَّا یَخۡرُصُونَ

    व क़ालू लौ शा अर-रहमान अबेद्नाहुम मा बेज़ विश्वास लेका इल्मिन हुम इल्ला यखरुसून

    और (क़यामत) में उनसे बाज़पुर्स की जाएगी और कहते हैं कि अगर ख़ुदा चाहता तो हम उनकी परसतिश न करते उनको उसकी कुछ ख़बर ही नहीं ये लोग तो बस अटकल पच्चू बातें किया करते हैं

  21. 21 أَمۡ ءَاتَیۡنَـٰهُمۡ كِتَـٰبࣰا مِّن قَبۡلِهِۦ فَهُم بِهِۦ مُسۡتَمۡسِكُونَ

    अम अतीनाहुम किताबन मिन क़ब्लिही फह्म बेहि मुस्तम्सिकूना

    या हमने उनको उससे पहले कोई किताब दी थी कि ये लोग उसे मज़बूत थामें हुए हैं

  22. 22 بَلۡ قَالُوۤا۟ إِنَّا وَجَدۡنَاۤ ءَابَاۤءَنَا عَلَىٰۤ أُمَّةࣲ وَإِنَّا عَلَىٰۤ ءَاثَـٰرِهِم مُّهۡتَدُونَ

    क़ालू अबाना उम्माह वा इन्ना आसारिहिम मुहतदून

    बल्कि ये लोग तो ये कहते हैं कि हमने अपने बाप दादाओं को एक तरीके पर पाया और हम उनको क़दम ब क़दम ठीक रास्ते पर चले जा रहें हैं

  23. 23 وَكَذَ ٰ⁠لِكَ مَاۤ أَرۡسَلۡنَا مِن قَبۡلِكَ فِی قَرۡیَةࣲ مِّن نَّذِیرٍ إِلَّا قَالَ مُتۡرَفُوهَاۤ إِنَّا وَجَدۡنَاۤ ءَابَاۤءَنَا عَلَىٰۤ أُمَّةࣲ وَإِنَّا عَلَىٰۤ ءَاثَـٰرِهِم مُّقۡتَدُونَ

    वक़ज़ा विश्वास लेका मा मिन क़ब्लिक फ़े क़रिया मिन नज़ीर इल्ला क़ाला मुतरफुहा अबाना उम्माह वा इन्ना आसारिहिम मुक्तदुन

    और (ऐ रसूल) इसी तरह हमने तुमसे पहले किसी बस्ती में कोई डराने वाला (पैग़म्बर) नहीं भेजा मगर वहाँ के ख़ुशहाल लोगों ने यही कहा कि हमने अपने बाप दादाओं को एक तरीके पर पाया, और हम यक़ीनी उनके क़दम ब क़दम चले जा रहे हैं

  24. 24 ۞ قَـٰلَ أَوَلَوۡ جِئۡتُكُم بِأَهۡدَىٰ مِمَّا وَجَدتُّمۡ عَلَیۡهِ ءَابَاۤءَكُمۡۖ قَالُوۤا۟ إِنَّا بِمَاۤ أُرۡسِلۡتُم بِهِۦ كَـٰفِرُونَ

    क़ाल औवलौ जेत्कुम बेअहदा मेमा वजदतुम अलय्हि अबाओकुम क़ालू उरसिलतुम बेहि काफ़िरून

    (इस पर) उनके पैग़म्बर ने कहा भी जिस तरीक़े पर तुमने अपने बाप दादाओं को पाया अगरचे मैं तुम्हारे पास इससे बेहतर राहे रास्त पर लाने वाला दीन लेकर आया हूँ (तो भी न मानोगे) वह बोले (कुछ हो मगर) हम तो उस दीन को जो तुम देकर भेजे गए हो मानने वाले नहीं

  25. 25 فَٱنتَقَمۡنَا مِنۡهُمۡۖ فَٱنظُرۡ كَیۡفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلۡمُكَذِّبِینَ

    फ़ान्तक़्मना फ़ानज़ुर कैफ़ा काना अक़ीबा अल-मुकज़्ज़िबीन

    तो हमने उनसे बदला लिया (तो ज़रा) देखो तो कि झुठलाने वालों का क्या अन्जाम हुआ

  26. 26 وَإِذۡ قَالَ إِبۡرَ ٰ⁠هِیمُ لِأَبِیهِ وَقَوۡمِهِۦۤ إِنَّنِی بَرَاۤءࣱ مِّمَّا تَعۡبُدُونَ

    वा इज़ क़ाला इबरा विश्वास हेय्मु लेआबिहिह वा क़ौमिहि इन्नानी बराऊन मिम्मा ताबुदून

    (और वह वख्त याद करो) जब इब्राहीम ने अपने (मुँह बोले) बाप (आज़र) और अपनी क़ौम से कहा कि जिन चीज़ों को तुम लोग पूजते हो मैं यक़ीनन उससे बेज़ार हूँ

  27. 27 إِلَّا ٱلَّذِی فَطَرَنِی فَإِنَّهُۥ سَیَهۡدِینِ

    इल्ला अल्लाज़ी फ़तरनी फा-इन्नहु सय्यदीन

    मगर उसकी इबादत करता हूँ, जिसने मुझे पैदा किया तो वही बहुत जल्द मेरी हिदायत करेगा

  28. 28 وَجَعَلَهَا كَلِمَةَۢ بَاقِیَةࣰ فِی عَقِبِهِۦ لَعَلَّهُمۡ یَرۡجِعُونَ

    वजालहा फ़े अक़िबिही ला'अल्लाहुम यार्जिहून

    और उसी (ईमान) को इब्राहीम ने अपनी औलाद में हमेशा बाक़ी रहने वाली बात छोड़ गए ताकि वह (ख़ुदा की तरफ रूजू) करें

  29. 29 بَلۡ مَتَّعۡتُ هَـٰۤؤُلَاۤءِ وَءَابَاۤءَهُمۡ حَتَّىٰ جَاۤءَهُمُ ٱلۡحَقُّ وَرَسُولࣱ مُّبِینࣱ

    मत्तक्तु हाउलाए वआबआहुम हत्ता जाआहुम वेरासुल मुबीन

    बल्कि मैं उनको और उनके बाप दादाओं को फायदा पहुँचाता रहा यहाँ तक कि उनके पास (दीने) हक़ और साफ़ साफ़ बयान करने वाला रसूल आ पहुँचा

  30. 30 وَلَمَّا جَاۤءَهُمُ ٱلۡحَقُّ قَالُوا۟ هَـٰذَا سِحۡرࣱ وَإِنَّا بِهِۦ كَـٰفِرُونَ

    वलम्मा जाआहुम हाज़ा सेहर वा इन्ना बेहि काफ़िरून

    और जब उनके पास (दीन) हक़ आ गया तो कहने लगे ये तो जादू है और हम तो हरगिज़ इसके मानने वाले नहीं

  31. 31 وَقَالُوا۟ لَوۡلَا نُزِّلَ هَـٰذَا ٱلۡقُرۡءَانُ عَلَىٰ رَجُلࣲ مِّنَ ٱلۡقَرۡیَتَیۡنِ عَظِیمٍ

    व क़ालू लौला नुज़्ज़िल हाज़ा कुरआन अला रजुल मिन अल-क़रयतैनी अज़ीम

    और कहने लगे कि ये क़ुरान इन दो बस्तियों (मक्के ताएफ) में से किसी बड़े आदमी पर क्यों नहीं नाज़िल किया गया

  32. 32 أَهُمۡ یَقۡسِمُونَ رَحۡمَتَ رَبِّكَۚ نَحۡنُ قَسَمۡنَا بَیۡنَهُم مَّعِیشَتَهُمۡ فِی ٱلۡحَیَوٰةِ ٱلدُّنۡیَاۚ وَرَفَعۡنَا بَعۡضَهُمۡ فَوۡقَ بَعۡضࣲ دَرَجَـٰتࣲ لِّیَتَّخِذَ بَعۡضُهُم بَعۡضࣰا سُخۡرِیࣰّاۗ وَرَحۡمَتُ رَبِّكَ خَیۡرࣱ مِّمَّا یَجۡمَعُونَ

    अहुम यक़्सिमून रहमत नह्नु क़समना माइशतहुम फ़े अल-हयाति व रफ़ा'ना बसहुम फ़ौक़ बस लियत्तखिज़ा बस सुखरिय्याँ वरहमतु रब्बिक ख़ैर मिम्मा यजमाऊँ

    ये लोग तुम्हारे परवरदिगार की रहमत को (अपने तौर पर) बाँटते हैं हमने तो इनके दरमियान उनकी रोज़ी दुनयावी ज़िन्दगी में बाँट ही दी है और एक के दूसरे पर दर्जे बुलन्द किए हैं ताकि इनमें का एक दूसरे से ख़िदमत ले और जो माल (मतआ) ये लोग जमा करते फिरते हैं ख़ुदा की रहमत (पैग़म्बर) इससे कहीं बेहतर है

  33. 33 وَلَوۡلَاۤ أَن یَكُونَ ٱلنَّاسُ أُمَّةࣰ وَ ٰ⁠حِدَةࣰ لَّجَعَلۡنَا لِمَن یَكۡفُرُ بِٱلرَّحۡمَـٰنِ لِبُیُوتِهِمۡ سُقُفࣰا مِّن فِضَّةࣲ وَمَعَارِجَ عَلَیۡهَا یَظۡهَرُونَ

    वलौला अन याकूना अन-नास और विश्वास लजाअल्ना यक्फुरु बिस्मि र-रहमानि लिबुयोतेहेम सुकुफ़न मिन चांदी वमारिज अलय्हा यज़हरून

    और अगर ये बात न होती कि (आख़िर) सब लोग एक ही तरीक़े के हो जाएँगे तो हम उनके लिए जो ख़ुदा से इन्कार करते हैं उनके घरों की छतें और वही सीढ़ियाँ जिन पर वह चढ़ते हैं (उतरते हैं)

  34. 34 وَلِبُیُوتِهِمۡ أَبۡوَ ٰ⁠بࣰا وَسُرُرًا عَلَیۡهَا یَتَّكِـُٔونَ

    वलीबुयूतिहें अबू विश्वास बा वसुरुरां अलय्हा यत्तकिऊन

    और उनके घरों के दरवाज़े और वह तख्त जिन पर तकिये लगाते हैं चाँदी और सोने के बना देते

  35. 35 وَزُخۡرُفࣰاۚ وَإِن كُلُّ ذَ ٰ⁠لِكَ لَمَّا مَتَـٰعُ ٱلۡحَیَوٰةِ ٱلدُّنۡیَاۚ وَٱلۡـَٔاخِرَةُ عِندَ رَبِّكَ لِلۡمُتَّقِینَ

    वज़ुख़्रुफ़ान वा-इन कुल्लु ज़ा विश्वास लेका लम्मा मताउ अल-हयाति वल-आख़िरतु एंदा रब्बिक लिल मुत्तक़ीन

    ये सब साज़ो सामान, तो बस दुनियावी ज़िन्दगी के (चन्द रोज़ा) साज़ो सामान हैं (जो मिट जाएँगे) और आख़ेरत (का सामान) तो तुम्हारे परवरदिगार के यहॉ ख़ास परहेज़गारों के लिए है

  36. 36 وَمَن یَعۡشُ عَن ذِكۡرِ ٱلرَّحۡمَـٰنِ نُقَیِّضۡ لَهُۥ شَیۡطَـٰنࣰا فَهُوَ لَهُۥ قَرِینࣱ

    वमन या'शु अन ज़िक्रि अर-रहमान नुकैय्यिद शैतान फहुवा करीन

    और जो शख़्श ख़ुदा की चाह से अन्धा बनता है हम (गोया ख़ुद) उसके वास्ते शैतान मुक़र्रर कर देते हैं तो वही उसका (हर दम का) साथी है

  37. 37 وَإِنَّهُمۡ لَیَصُدُّونَهُمۡ عَنِ ٱلسَّبِیلِ وَیَحۡسَبُونَ أَنَّهُم مُّهۡتَدُونَ

    वा इन्नाहुम ला-या-सुद-दु-ना-हुम अने अस-सबील वयहसबून अन्नहुम मुहतदून

    और वह (शयातीन) उन लोगों को (ख़ुदा की) राह से रोकते रहते हैं बावजूद इसके वह उसी ख्याल में हैं कि वह यक़ीनी राहे रास्त पर हैं

  38. 38 حَتَّىٰۤ إِذَا جَاۤءَنَا قَالَ یَـٰلَیۡتَ بَیۡنِی وَبَیۡنَكَ بُعۡدَ ٱلۡمَشۡرِقَیۡنِ فَبِئۡسَ ٱلۡقَرِینُ

    इज़ा जाआना क़ाला यलयत बय्नि ुबैनक बुअद अल-मशरिकैन फ़बिस अल-करीन

    यहाँ तक कि जब (क़यामत में) हमारे पास आएगा तो (अपने साथी शैतान से) कहेगा काश मुझमें और तुममें पूरब पश्चिम का फ़ासला होता ग़रज़ (शैतान भी) क्या ही बुरा रफीक़ है

  39. 39 وَلَن یَنفَعَكُمُ ٱلۡیَوۡمَ إِذ ظَّلَمۡتُمۡ أَنَّكُمۡ فِی ٱلۡعَذَابِ مُشۡتَرِكُونَ

    वेलन यानफ़ाकुमु अल-यौम ज़ालमतुम अन्नाकुम फ़े अल-अज़ाबि मुश्तरिकूना

    और जब तुम नाफरमानियाँ कर चुके तो (शयातीन के साथ) तुम्हारा अज़ाब में शरीक होना भी आज तुमको (अज़ाब की कमी में) कोई फायदा नहीं पहुँचा सकता

  40. 40 أَفَأَنتَ تُسۡمِعُ ٱلصُّمَّ أَوۡ تَهۡدِی ٱلۡعُمۡیَ وَمَن كَانَ فِی ضَلَـٰلࣲ مُّبِینࣲ

    अफ़अन्त तुस्मिउ अस-सुम्म औ तहदी अल-उमिया वमन काना फ़े ज़लालीन

    तो (ऐ रसूल) क्या तुम बहरों को सुना सकते हो या अन्धे को और उस शख़्श को जो सरीही गुमराही में पड़ा हो रास्ता दिखा सकते हो (हरगिज़ नहीं)

  41. 41 فَإِمَّا نَذۡهَبَنَّ بِكَ فَإِنَّا مِنۡهُم مُّنتَقِمُونَ

    फ़ेइम्मा नज़्हबन्न बेक मुन्तक़ीमून

    तो अगर हम तुमको (दुनिया से) ले भी जाएँ तो भी हमको उनसे बदला लेना ज़रूरी है

  42. 42 أَوۡ نُرِیَنَّكَ ٱلَّذِی وَعَدۡنَـٰهُمۡ فَإِنَّا عَلَیۡهِم مُّقۡتَدِرُونَ

    औ नुरियन्नक अल्लाज़ी वअदनाहुम मुक्तदिरुन

    या (तुम्हारी ज़िन्दगी ही में) जिस अज़ाब का हमने उनसे वायदा किया है तुमको दिखा दें तो उन पर हर तरह क़ाबू रखते हैं

  43. 43 فَٱسۡتَمۡسِكۡ بِٱلَّذِیۤ أُوحِیَ إِلَیۡكَۖ إِنَّكَ عَلَىٰ صِرَ ٰ⁠طࣲ مُّسۡتَقِیمࣲ

    फ़ास्तमसिक बिल्लाज़ी उहिया इन्नका अला सिरा विश्वास ते मुस्तक़ीम

    तो तुम्हारे पास जो वही भेजी गयी है तुम उसे मज़बूत पकड़े रहो इसमें शक़ नहीं कि तुम सीधी राह पर हो

  44. 44 وَإِنَّهُۥ لَذِكۡرࣱ لَّكَ وَلِقَوۡمِكَۖ وَسَوۡفَ تُسۡـَٔلُونَ

    वा इन्नाहु लज़िक्र लाका वलिकौमि वसौफ़ तसअलून

    और ये (क़ुरान) तुम्हारे लिए और तुम्हारी क़ौम के लिए नसीहत है और अनक़रीब ही तुम लोगों से इसकी बाज़पुर्स की जाएगी

  45. 45 وَسۡـَٔلۡ مَنۡ أَرۡسَلۡنَا مِن قَبۡلِكَ مِن رُّسُلِنَاۤ أَجَعَلۡنَا مِن دُونِ ٱلرَّحۡمَـٰنِ ءَالِهَةࣰ یُعۡبَدُونَ

    वसल मिन क़ब्लिक मिन रुसुलेना अजल्ना मिन दूने अर-रहमान आलिह यूब्दून

    और हमने तुमसे पहले अपने जितने पैग़म्बर भेजे हैं उन सब से दरियाफ्त कर देखो क्या हमने ख़ुदा कि सिवा और माबूद बनाएा थे कि उनकी इबादत की जाए

  46. 46 وَلَقَدۡ أَرۡسَلۡنَا مُوسَىٰ بِـَٔایَـٰتِنَاۤ إِلَىٰ فِرۡعَوۡنَ وَمَلَإِی۟هِۦ فَقَالَ إِنِّی رَسُولُ رَبِّ ٱلۡعَـٰلَمِینَ

    व-लक्द इला फ़िरऔन व मलाइहि फ़काला इन्नी रसूल रब्बी अल-आलमीन

    और हम ही ने यक़ीनन मूसा को अपनी निशानियाँ देकर फिरऔन और उसके दरबारियों के पास (पैग़म्बर बनाकर) भेजा था तो मूसा ने कहा कि मैं सारे जहॉन के पालने वाले (ख़ुदा) का रसूल हूँ

  47. 47 فَلَمَّا جَاۤءَهُم بِـَٔایَـٰتِنَاۤ إِذَا هُم مِّنۡهَا یَضۡحَكُونَ

    फ़लम्मा जाआहुम इज़ा यज़्हकूना

    तो जब मूसा उन लोगों के पास हमारे मौजिज़े लेकर आए तो वह लोग उन मौजिज़ों की हँसी उड़ाने लगे

  48. 48 وَمَا نُرِیهِم مِّنۡ ءَایَةٍ إِلَّا هِیَ أَكۡبَرُ مِنۡ أُخۡتِهَاۖ وَأَخَذۡنَـٰهُم بِٱلۡعَذَابِ لَعَلَّهُمۡ یَرۡجِعُونَ

    वमा नूरिहेम आयत इल्ला हेया उख्तिहा वअख़ज़नाहुम बिल आज़ाब ला'अल्लाहुम यार्जिहून

    और हम जो मौजिज़ा उन को दिखाते थे वह दूसरे से बढ़ कर होता था और आख़िर हमने उनको अज़ाब में गिरफ्तार किया ताकि ये लोग बाज़ आएँ

  49. 49 وَقَالُوا۟ یَـٰۤأَیُّهَ ٱلسَّاحِرُ ٱدۡعُ لَنَا رَبَّكَ بِمَا عَهِدَ عِندَكَ إِنَّنَا لَمُهۡتَدُونَ

    व क़ालू या अय्युहा अस-साहिरु उद़उ लना रब्बक बिमा अहिद इंदक इन्नना लामुहतेदून

    और (जब) अज़ाब में गिरफ्तार हुए तो (मूसा से) कहने लगे ऐ जादूगर इस एहद के मुताबिक़ जो तुम्हारे परवरदिगार ने तुमसे किया है हमारे वास्ते दुआ कर

  50. 50 فَلَمَّا كَشَفۡنَا عَنۡهُمُ ٱلۡعَذَابَ إِذَا هُمۡ یَنكُثُونَ

    फ़लम्मा कशफ़ना अन्हुमु अल-अज़ाब इज़ा हुम यानकुसुन

    (अगर अब की छूटे) तो हम ज़रूर ऊपर आ जाएँगे फिर जब हमने उनसे अज़ाब को हटा दिया तो वह फौरन (अपना) अहद तोड़ बैठे

  51. 51 وَنَادَىٰ فِرۡعَوۡنُ فِی قَوۡمِهِۦ قَالَ یَـٰقَوۡمِ أَلَیۡسَ لِی مُلۡكُ مِصۡرَ وَهَـٰذِهِ ٱلۡأَنۡهَـٰرُ تَجۡرِی مِن تَحۡتِیۤۚ أَفَلَا تُبۡصِرُونَ

    वनेडियम फ़िरऔन फ़े क़ाला या क़ौमि अलैस लेइ मुल्क मिस्र वहादिहि अल-अन्हारु तजरी मिन तहती अ-फा-ला तुब्सिरून

    और फिरऔन ने अपने लोगों में पुकार कर कहा ऐ मेरी क़ौम क्या (ये) मुल्क मिस्र हमारा नहीं और (क्या) ये नहरें जो हमारे (शाही महल के) नीचे बह रही हैं (हमारी नहीं) तो क्या तुमको इतना भी नहीं सूझता

  52. 52 أَمۡ أَنَا۠ خَیۡرࣱ مِّنۡ هَـٰذَا ٱلَّذِی هُوَ مَهِینࣱ وَلَا یَكَادُ یُبِینُ

    अम अना ख़ैर हाज़ा अल्लाज़ी हुव महीन यकादु योबिनु

    या (सूझता है कि) मैं इस शख़्श (मूसा) से जो एक ज़लील आदमी है और (हकले पन की वजह से) साफ़ गुफ्तगू भी नहीं कर सकता

  53. 53 فَلَوۡلَاۤ أُلۡقِیَ عَلَیۡهِ أَسۡوِرَةࣱ مِّن ذَهَبٍ أَوۡ جَاۤءَ مَعَهُ ٱلۡمَلَـٰۤىِٕكَةُ مُقۡتَرِنِینَ

    उल्किय अलय्हि अस्विरह मिन ज़हाबिन औ जा अल-मलाइका मुक्तरिनीन

    कहीं बहुत बेहतर हूँ (अगर ये बेहतर है तो इसके लिए सोने के कंगन) (ख़ुदा के हॉ से) क्यों नहीं उतारे गये या उसके साथ फ़रिश्ते जमा होकर आते

  54. 54 فَٱسۡتَخَفَّ قَوۡمَهُۥ فَأَطَاعُوهُۚ إِنَّهُمۡ كَانُوا۟ قَوۡمࣰا فَـٰسِقِینَ

    फ़स्तख़्फ़ कौमहू फ़ाअताऊहु इन्नाहुम कानू क़ौमन फासिकिना

    ग़रज़ फिरऔन ने (बातें बनाकर) अपनी क़ौम की अक़ल मार दी और वह लोग उसके ताबेदार बन गये बेशक वह लोग बदकार थे ही

  55. 55 فَلَمَّاۤ ءَاسَفُونَا ٱنتَقَمۡنَا مِنۡهُمۡ فَأَغۡرَقۡنَـٰهُمۡ أَجۡمَعِینَ

    असाफ़ूना इंतक़मना मिन्हुम फ़ाअग्रक्नाहुम अजमैन

    ग़रज़ जब उन लोगों ने हमको झुझंला दिया तो हमने भी उनसे बदला लिया तो हमने उन सब (के सब) को डुबो दिया

  56. 56 فَجَعَلۡنَـٰهُمۡ سَلَفࣰا وَمَثَلࣰا لِّلۡـَٔاخِرِینَ

    फजलनाहुम सलफ़न वमसलन लिल आख़िरीन

    फिर हमने उनको गया गुज़रा और पिछलों के वास्ते इबरत बना दिया

  57. 57 ۞ وَلَمَّا ضُرِبَ ٱبۡنُ مَرۡیَمَ مَثَلًا إِذَا قَوۡمُكَ مِنۡهُ یَصِدُّونَ

    वलम्मा ज़ुरिब इब्नु मरयम मिसालन इज़ा क़ौमुक मिन्हु यासिद्दून

    और(ऐ रसूल) जब मरियम के बेटे (ईसा) की मिसाल बयान की गयी तो उससे तुम्हारी क़ौम के लोग खिलखिला कर हंसने लगे

  58. 58 وَقَالُوۤا۟ ءَأَ ٰ⁠لِهَتُنَا خَیۡرٌ أَمۡ هُوَۚ مَا ضَرَبُوهُ لَكَ إِلَّا جَدَلَۢاۚ بَلۡ هُمۡ قَوۡمٌ خَصِمُونَ

    ए अ विश्वास लेहतुना खैरुन अम दर्बुहु लका इल्ला जदलन हुम कौम ख़सीमूना

    और बोल उठे कि भला हमारे माबूद अच्छे हैं या वह (ईसा) उन लोगों ने जो ईसा की मिसाल तुमसे बयान की है तो सिर्फ झगड़ने को

  59. 59 إِنۡ هُوَ إِلَّا عَبۡدٌ أَنۡعَمۡنَا عَلَیۡهِ وَجَعَلۡنَـٰهُ مَثَلࣰا لِّبَنِیۤ إِسۡرَ ٰ⁠ۤءِیلَ

    हुव इल्ला अब्द अनअम्ना अलय्हि वजअल्ना लीबानी इस्रा विश्वास ईल

    बल्कि (हक़ तो यह है कि) ये लोग हैं झगड़ालू ईसा तो बस हमारे एक बन्दे थे जिन पर हमने एहसान किया (नबी बनाया और मौजिज़े दिये) और उनको हमने बनी इसराईल के लिए (अपनी कुदरत का) नमूना बनाया

  60. 60 وَلَوۡ نَشَاۤءُ لَجَعَلۡنَا مِنكُم مَّلَـٰۤىِٕكَةࣰ فِی ٱلۡأَرۡضِ یَخۡلُفُونَ

    वलाउ नेशा लजअल्ना मलाईका फ़े अल-अर्द याख़्लुफ़ून

    और अगर हम चाहते तो तुम ही लोगों में से (किसी को) फ़रिश्ते बना देते जो तुम्हारी जगह ज़मीन में रहते

  61. 61 وَإِنَّهُۥ لَعِلۡمࣱ لِّلسَّاعَةِ فَلَا تَمۡتَرُنَّ بِهَا وَٱتَّبِعُونِۚ هَـٰذَا صِرَ ٰ⁠طࣱ مُّسۡتَقِیمࣱ

    वा इन्नाहु लैल्म लिल्स्साअति फ़ला तम्तेरुन्ना बेहा व त्तबिऊनी हाज़ा सिरा विश्वास

    और वह तो यक़ीनन क़यामत की एक रौशन दलील है तुम लोग इसमें हरगिज़ यक़ न करो और मेरी पैरवी करो यही सीधा रास्ता है

  62. 62 وَلَا یَصُدَّنَّكُمُ ٱلشَّیۡطَـٰنُۖ إِنَّهُۥ لَكُمۡ عَدُوࣱّ مُّبِینࣱ

    यसुद्दन्नकुम इन्नाहु लकुम अदुव्वुन मुबीन

    और (कहीं) शैतान तुम लोगों को (इससे) रोक न दे वही यक़ीनन तुम्हारा खुल्लम खुल्ला दुश्मन है

  63. 63 وَلَمَّا جَاۤءَ عِیسَىٰ بِٱلۡبَیِّنَـٰتِ قَالَ قَدۡ جِئۡتُكُم بِٱلۡحِكۡمَةِ وَلِأُبَیِّنَ لَكُم بَعۡضَ ٱلَّذِی تَخۡتَلِفُونَ فِیهِۖ فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِیعُونِ

    वलम्मा जा ईसा बेल-बय्यिनात क़ाला क़द जेत्कुम बिल हिकमह वलैउबैयिन बस अल्लाज़ी तख्तलीफून फत्ताक़ुआ अल्लाह वा ती उनी

    और जब ईसा वाज़ेए व रौशन मौजिज़े लेकर आये तो (लोगों से) कहा मैं तुम्हारे पास दानाई (की किताब) लेकर आया हूँ ताकि बाज़ बातें जिन में तुम लोग एख्तेलाफ करते थे तुमको साफ-साफ बता दूँ तो तुम लोग ख़ुदा से डरो और मेरा कहा मानो

  64. 64 إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ رَبِّی وَرَبُّكُمۡ فَٱعۡبُدُوهُۚ هَـٰذَا صِرَ ٰ⁠طࣱ مُّسۡتَقِیمࣱ

    इन्ना अल्लाह हुव व रब्बुकुम फ़ाबुदुहु हाज़ा सिरा विश्वास

    बेशक ख़ुदा ही मेरा और तुम्हार परवरदिगार है तो उसी की इबादत करो यही सीधा रास्ता है

  65. 65 فَٱخۡتَلَفَ ٱلۡأَحۡزَابُ مِنۢ بَیۡنِهِمۡۖ فَوَیۡلࣱ لِّلَّذِینَ ظَلَمُوا۟ مِنۡ عَذَابِ یَوۡمٍ أَلِیمٍ

    फ़ख़्तलफ़ अल-अहज़ाब बय्निहिम फवैल लिल्लाज़ीन ज़लामू अज़ाब यौम अलीम

    तो इनमें से कई फिरक़े उनसे एख्तेलाफ करने लगे तो जिन लोगों ने ज़ुल्म किया उन पर दर्दनांक दिन के अज़ब से अफ़सोस है

  66. 66 هَلۡ یَنظُرُونَ إِلَّا ٱلسَّاعَةَ أَن تَأۡتِیَهُم بَغۡتَةࣰ وَهُمۡ لَا یَشۡعُرُونَ

    हल यान्ज़ुरून इल्ला अस-साआ अन ता'तियाहुम वहुम यशउरून

    क्या ये लोग बस क़यामत के ही मुन्ज़िर बैठे हैं कि अचानक ही उन पर आ जाए और उन को ख़बर तक न हो

  67. 67 ٱلۡأَخِلَّاۤءُ یَوۡمَىِٕذِۭ بَعۡضُهُمۡ لِبَعۡضٍ عَدُوٌّ إِلَّا ٱلۡمُتَّقِینَ

    अल-अखिला यौमिज़ि बअसुम लिबस अदुव्व इल्ला अल-मुत्तक़ीन

    (दिली) दोस्त इस दिन (बाहम) एक दूसरे के दुशमन होगें मगर परहेज़गार कि वह दोस्त ही रहेगें

  68. 68 یَـٰعِبَادِ لَا خَوۡفٌ عَلَیۡكُمُ ٱلۡیَوۡمَ وَلَاۤ أَنتُمۡ تَحۡزَنُونَ

    या इबादी खौफ़ुन अलैकुम अल-यौम वला अंतुम तहज़नून

    और ख़ुदा उनसे कहेगा ऐ मेरे बन्दों आज न तो तुमको कोई ख़ौफ है और न तुम ग़मग़ीन होगे

  69. 69 ٱلَّذِینَ ءَامَنُوا۟ بِـَٔایَـٰتِنَا وَكَانُوا۟ مُسۡلِمِینَ

    अल्लाज़ीना अमेनुआ बे-आ-या-ती-ना वा कानू मुस्लिमीन

    (यह) वह लोग हैं जो हमारी आयतों पर ईमान लाए और (हमारे) फ़रमाबरदार थे

  70. 70 ٱدۡخُلُوا۟ ٱلۡجَنَّةَ أَنتُمۡ وَأَزۡوَ ٰ⁠جُكُمۡ تُحۡبَرُونَ

    उधुलू अल जन्नत अंतुम वज़ुआ विश्वास जुकुम तुहबरून

    तो तुम अपनी बीवियों समैत एजाज़ व इकराम से बेहिश्त में दाखिल हो जाओ

  71. 71 یُطَافُ عَلَیۡهِم بِصِحَافࣲ مِّن ذَهَبࣲ وَأَكۡوَابࣲۖ وَفِیهَا مَا تَشۡتَهِیهِ ٱلۡأَنفُسُ وَتَلَذُّ ٱلۡأَعۡیُنُۖ وَأَنتُمۡ فِیهَا خَـٰلِدُونَ

    यूताफ़ु बेसफ़ मिन ज़हब वफीहा तश्तहिये वतलज़्ज़ु अल-अयुनु और तुम फ़िहा ख़ालिदून

    उन पर सोने की एक रिक़ाबियों और प्यालियों का दौर चलेगा और वहाँ जिस चीज़ को जी चाहे और जिससे ऑंखें लज्ज़त उठाएं (सब मौजूद हैं) और तुम उसमें हमेशा रहोगे

  72. 72 وَتِلۡكَ ٱلۡجَنَّةُ ٱلَّتِیۤ أُورِثۡتُمُوهَا بِمَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ

    वतिल्क अल जन्नतु उओरिथ्तुमुहा बिमा तामलून

    और ये जन्नत जिसके तुम वारिस (हिस्सेदार) कर दिये गये हो तुम्हारी क़ारगुज़ारियों का सिला है

  73. 73 لَكُمۡ فِیهَا فَـٰكِهَةࣱ كَثِیرَةࣱ مِّنۡهَا تَأۡكُلُونَ

    लकुम फ़िहा फ़ाकिता ता'कुलोन

    वहाँ तुम्हारे वास्ते बहुत से मेवे हैं जिनको तुम खाओगे

  74. 74 إِنَّ ٱلۡمُجۡرِمِینَ فِی عَذَابِ جَهَنَّمَ خَـٰلِدُونَ

    इन्ना अल-मुजरिमीन फ़े अज़ाब जहन्नम ख़ालिदून

    (गुनाहगार कुफ्फ़ार) तो यक़ीकन जहन्नुम के अज़ाब में हमेशा रहेगें

  75. 75 لَا یُفَتَّرُ عَنۡهُمۡ وَهُمۡ فِیهِ مُبۡلِسُونَ

    यूफ़त्तारु अन्हुम वहुम फ़िये मुब्लिसून

    जो उनसे कभी नाग़ा न किया जाएगा और वह इसी अज़ाब में नाउम्मीद होकर रहेंगें

  76. 76 وَمَا ظَلَمۡنَـٰهُمۡ وَلَـٰكِن كَانُوا۟ هُمُ ٱلظَّـٰلِمِینَ

    वमा ज़लमनाहुम वलाकिन कानू हम अज़-ज़़ालिमीन

    और हमने उन पर कोई ज़ुल्म नहीं किया बल्कि वह लोग ख़ुद अपने ऊपर ज़ुल्म कर रहे हैं

  77. 77 وَنَادَوۡا۟ یَـٰمَـٰلِكُ لِیَقۡضِ عَلَیۡنَا رَبُّكَۖ قَالَ إِنَّكُم مَّـٰكِثُونَ

    वनादौ यामलिकु लेयक़्ज़ि अलैना क़ाला इन्नाकुम माकिसुन

    और (जहन्नुमी) पुकारेगें कि ऐ मालिक (दरोग़ा ए जहन्नुम कोई तरकीब करो) तुम्हारा परवरदिगार हमें मौत ही दे दे वह जवाब देगा कि तुमको इसी हाल में रहना है

  78. 78 لَقَدۡ جِئۡنَـٰكُم بِٱلۡحَقِّ وَلَـٰكِنَّ أَكۡثَرَكُمۡ لِلۡحَقِّ كَـٰرِهُونَ

    लकद जेनाकुम बिल-हक्की वलाकिन अक्सरकुम लिल-हक़्क़ी कारिहून

    (ऐ कुफ्फ़ार मक्का) हम तो तुम्हारे पास हक़ लेकर आयें हैं तुम मे से बहुत से हक़ (बात से चिढ़ते) हैं

  79. 79 أَمۡ أَبۡرَمُوۤا۟ أَمۡرࣰا فَإِنَّا مُبۡرِمُونَ

    अम अब्रामुआ अमरान मुब्रिमून

    क्या उन लोगों ने कोई बात ठान ली है हमने भी (कुछ ठान लिया है)

  80. 80 أَمۡ یَحۡسَبُونَ أَنَّا لَا نَسۡمَعُ سِرَّهُمۡ وَنَجۡوَىٰهُمۚ بَلَىٰ وَرُسُلُنَا لَدَیۡهِمۡ یَكۡتُبُونَ

    अम यहसबून अन्ना नसमाउ सेर्राहुम वनजवाहुम वर्सुलुना लदयहिम यक्तुबून

    क्या ये लोग कुछ समझते हैं कि हम उनके भेद और उनकी सरग़ोशियों को नहीं सुनते हॉ (ज़रूर सुनते हैं) और हमारे फ़रिश्ते उनके पास हैं और उनकी सब बातें लिखते जाते हैं

  81. 81 قُلۡ إِن كَانَ لِلرَّحۡمَـٰنِ وَلَدࣱ فَأَنَا۠ أَوَّلُ ٱلۡعَـٰبِدِینَ

    क़ुल इन काना लिल रहमान वलद फ़ाना अव्वलु अल-आबिदीन

    (ऐ रसूल) तुम कह दो कि अगर ख़ुदा की कोई औलाद होती तो मैं सबसे पहले उसकी इबादत को तैयार हूँ

  82. 82 سُبۡحَـٰنَ رَبِّ ٱلسَّمَـٰوَ ٰ⁠تِ وَٱلۡأَرۡضِ رَبِّ ٱلۡعَرۡشِ عَمَّا یَصِفُونَ

    सुभान रब्बी अस-समावा विश्वास ते वल अर्दि रब्बी अल-अर्श अम्मा यासिफ़ून

    ये लोग जो कुछ बयान करते हैं सारे आसमान व ज़मीन का मालिक अर्श का मालिक (ख़ुदा) उससे पाक व पाक़ीज़ा है

  83. 83 فَذَرۡهُمۡ یَخُوضُوا۟ وَیَلۡعَبُوا۟ حَتَّىٰ یُلَـٰقُوا۟ یَوۡمَهُمُ ٱلَّذِی یُوعَدُونَ

    फ़ज़रुहुम याखुज़ुवा वय्ल'अबू हत्ता येलाक़ुआ यौमहुम अल्लाज़ी यूओअदून

    तो तुम उन्हें छोड़ दो कि पड़े बक बक करते और खेलते रहते हैं यहाँ तक कि जिस दिन का उनसे वायदा किया जाता है

  84. 84 وَهُوَ ٱلَّذِی فِی ٱلسَّمَاۤءِ إِلَـٰهࣱ وَفِی ٱلۡأَرۡضِ إِلَـٰهࣱۚ وَهُوَ ٱلۡحَكِیمُ ٱلۡعَلِیمُ

    वहुव अल्लाज़ी फ़े अस-समा इलाह वफ़ी अल-अर्द वहुव अल-हकीम अल-अलीम

    उनके सामने आ मौजूद हो और आसमान में भी (उसी की इबादत की जाती है और वही ज़मीन में भी माबूद है और वही वाकिफ़कार हिकमत वाला है

  85. 85 وَتَبَارَكَ ٱلَّذِی لَهُۥ مُلۡكُ ٱلسَّمَـٰوَ ٰ⁠تِ وَٱلۡأَرۡضِ وَمَا بَیۡنَهُمَا وَعِندَهُۥ عِلۡمُ ٱلسَّاعَةِ وَإِلَیۡهِ تُرۡجَعُونَ

    व तबारक अल्लाज़ी मुल्क अस-समावा विश्वास ते वल अर्दि वमा बय्नहुमा वा इंदहु इल्मु अस-साअत वा इलय्हि तुरजाउन

    और वही बहुत बाबरकत है जिसके लिए सारे आसमान व ज़मीन और दोनों के दरमियान की हुक़ुमत है और क़यामत की ख़बर भी उसी को है और तुम लोग उसकी तरफ लौटाए जाओगे

  86. 86 وَلَا یَمۡلِكُ ٱلَّذِینَ یَدۡعُونَ مِن دُونِهِ ٱلشَّفَـٰعَةَ إِلَّا مَن شَهِدَ بِٱلۡحَقِّ وَهُمۡ یَعۡلَمُونَ

    यम्लिकु अल्लाज़ीना यदऊन मिन अश-शफ़ाआह इल्ला मैन शहीद बिल-हक्की वहुम यालमून

    और ख़ुदा के सिवा जिनकी ये लोग इबादत करतें हैं वह तो सिफारिश का भी एख्तेयार नहीं रख़ते मगर (हॉ) जो लोग समझ बूझ कर हक़ बात (तौहीद) की गवाही दें (तो खैर)

  87. 87 وَلَىِٕن سَأَلۡتَهُم مَّنۡ خَلَقَهُمۡ لَیَقُولُنَّ ٱللَّهُۖ فَأَنَّىٰ یُؤۡفَكُونَ

    वलाइन सअलतहुम ख़लकहुम लयकुल्लुन्न फा अन्ना युफ़्कौन

    और अगर तुम उनसे पूछोगे कि उनको किसने पैदा किया तो ज़रूर कह देगें कि अल्लाह ने फिर (बावजूद इसके) ये कहाँ बहके जा रहे हैं

  88. 88 وَقِیلِهِۦ یَـٰرَبِّ إِنَّ هَـٰۤؤُلَاۤءِ قَوۡمࣱ لَّا یُؤۡمِنُونَ

    वक़ीलिहि या रब्बी इन्ना हाउलाए क़ौम ला यूमीनून

    और (उसी को) रसूल के उस क़ौल का भी इल्म है कि परवरदिगार ये लोग हरगिज़ ईमान न लाएँगे

  89. 89 فَٱصۡفَحۡ عَنۡهُمۡ وَقُلۡ سَلَـٰمࣱۚ فَسَوۡفَ یَعۡلَمُونَ

    फ़ासफ़ह अन्हुम वा क़ुल फासोफ यालमून

    तो तुम उनसे मुँह फेर लो और कह दो कि तुम को सलाम तो उन्हें अनक़रीब ही (शरारत का नतीजा) मालूम हो जाएगा

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