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Al-Ahqaf

अल-अहकाफ

रेत के टीले

35 ayahsMeccanहिन्दी

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بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَـٰنِ ٱلرَّحِیمِ

बिस्मि अल्लाह अर-रहमान अर-रहीम

  1. 1 حمۤ

    हम

    हा मीम

  2. 2 تَنزِیلُ ٱلۡكِتَـٰبِ مِنَ ٱللَّهِ ٱلۡعَزِیزِ ٱلۡحَكِیمِ

    तंज़ील अल किताब मिन अल्लाह अल-अज़ीज़ अल-हकीमी

    ये किताब ग़ालिब (व) हकीम ख़ुदा की तरफ से नाज़िल हुई है

  3. 3 مَا خَلَقۡنَا ٱلسَّمَـٰوَ ٰ⁠تِ وَٱلۡأَرۡضَ وَمَا بَیۡنَهُمَاۤ إِلَّا بِٱلۡحَقِّ وَأَجَلࣲ مُّسَمࣰّىۚ وَٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ عَمَّاۤ أُنذِرُوا۟ مُعۡرِضُونَ

    ख़लक़ना अस-समावा विश्वास ते वल अर्द वमा इल्ला बिल-हक्की वा अजल मुसम्मन वल्लाज़ीना कफ़रू उन्ज़िरु मुआरिदून

    हमने तो सारे आसमान व ज़मीन और जो कुछ इन दोनों के दरमियान है हिकमत ही से एक ख़ास वक्त तक के लिए ही पैदा किया है और कुफ्फ़ार जिन चीज़ों से डराए जाते हैं उन से मुँह फेर लेते हैं

  4. 4 قُلۡ أَرَءَیۡتُم مَّا تَدۡعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ أَرُونِی مَاذَا خَلَقُوا۟ مِنَ ٱلۡأَرۡضِ أَمۡ لَهُمۡ شِرۡكࣱ فِی ٱلسَّمَـٰوَ ٰ⁠تِۖ ٱئۡتُونِی بِكِتَـٰبࣲ مِّن قَبۡلِ هَـٰذَاۤ أَوۡ أَثَـٰرَةࣲ مِّنۡ عِلۡمٍ إِن كُنتُمۡ صَـٰدِقِینَ

    क़ुल मा तदउन मिन दूने अल्लाह अरूनी ख़लक़ू मिन अल-अर्द अम लाहुम शिर्क फ़े अस-समावा विश्वास इतूनी बेकेता्ब मिन क़ब्लि औ असारा इन सादिक़ीन

    (ऐ रसूल) तुम पूछो कि ख़ुदा को छोड़ कर जिनकी तुम इबादत करते हो क्या तुमने उनको देखा है मुझे भी तो दिखाओ कि उन लोगों ने ज़मीन में क्या चीज़े पैदा की हैं या आसमानों (के बनाने) में उनकी शिरकत है तो अगर तुम सच्चे हो तो उससे पहले की कोई किताब (या अगलों के) इल्म का बक़िया हो तो मेरे सामने पेश करो

  5. 5 وَمَنۡ أَضَلُّ مِمَّن یَدۡعُوا۟ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَن لَّا یَسۡتَجِیبُ لَهُۥۤ إِلَىٰ یَوۡمِ ٱلۡقِیَـٰمَةِ وَهُمۡ عَن دُعَاۤىِٕهِمۡ غَـٰفِلُونَ

    अदल्लु मेमन यादुआ मिन दूने अल्लाह मैन ला यास्तजिबु इला यौम अल-क़ियामा वहुम अन दुआईहिम ग़ाफ़िलून

    और उस शख़्श से बढ़ कर कौन गुमराह हो सकता है जो ख़ुदा के सिवा ऐसे शख़्श को पुकारे जो उसे क़यामत तक जवाब ही न दे और उनको उनके पुकारने की ख़बरें तक न हों

  6. 6 وَإِذَا حُشِرَ ٱلنَّاسُ كَانُوا۟ لَهُمۡ أَعۡدَاۤءࣰ وَكَانُوا۟ بِعِبَادَتِهِمۡ كَـٰفِرِینَ

    वा इज़ा हुशिरा अन-नास कानू लाहुम अ'दा वा कानू बि इबादतिहिम काफ़िरीन

    और जब लोग (क़यामत) में जमा किये जाएगें तो वह (माबूद) उनके दुशमन हो जाएंगे और उनकी परसतिश से इन्कार करेंगे

  7. 7 وَإِذَا تُتۡلَىٰ عَلَیۡهِمۡ ءَایَـٰتُنَا بَیِّنَـٰتࣲ قَالَ ٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ لِلۡحَقِّ لَمَّا جَاۤءَهُمۡ هَـٰذَا سِحۡرࣱ مُّبِینٌ

    वा इज़ा तुतला अलैहिम आयातुना क़ाला अल्लाज़ीना कफ़रू लिल-हक़्क़ी लम्मा हाज़ा सेहर मुबीन

    और जब हमारी खुली खुली आयतें उनके सामने पढ़ी जाती हैं तो जो लोग काफिर हैं हक़ के बारे में जब उनके पास आ चुका तो कहते हैं ये तो सरीही जादू है

  8. 8 أَمۡ یَقُولُونَ ٱفۡتَرَىٰهُۖ قُلۡ إِنِ ٱفۡتَرَیۡتُهُۥ فَلَا تَمۡلِكُونَ لِی مِنَ ٱللَّهِ شَیۡـًٔاۖ هُوَ أَعۡلَمُ بِمَا تُفِیضُونَ فِیهِۚ كَفَىٰ بِهِۦ شَهِیدَۢا بَیۡنِی وَبَیۡنَكُمۡۖ وَهُوَ ٱلۡغَفُورُ ٱلرَّحِیمُ

    अम याक़ुलून इफ़्तराहु क़ुल इनि इफ़्तरैतुहु फ़ला तमलीकून लेइ मिन अल्लाह हुव अ'लामु बिमा तुफ़ीज़ून कफा बेहि शहीदा बय्नि ओबैनेकुम वहुव अल-ग़फ़ूर अर-रहीम

    क्या ये कहते हैं कि इसने इसको ख़ुद गढ़ लिया है तो (ऐ रसूल) तुम कह दो कि अगर मैं इसको (अपने जी से) गढ़ लेता तो तुम ख़ुदा के सामने मेरे कुछ भी काम न आओगे जो जो बातें तुम लोग उसके बारे में करते रहते हो वह ख़ूब जानता है मेरे और तुम्हारे दरमियान वही गवाही को काफ़ी है और वही बड़ा बख्शने वाला है मेहरबान है

  9. 9 قُلۡ مَا كُنتُ بِدۡعࣰا مِّنَ ٱلرُّسُلِ وَمَاۤ أَدۡرِی مَا یُفۡعَلُ بِی وَلَا بِكُمۡۖ إِنۡ أَتَّبِعُ إِلَّا مَا یُوحَىٰۤ إِلَیَّ وَمَاۤ أَنَا۠ إِلَّا نَذِیرࣱ مُّبِینࣱ

    क़ुल कुंतु बिदान मिन अल-रुसुली युफ़लु बे अत्ताबिउ इल्ला इलय्य अना इल्ला नज़ीर मुबीन

    (ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं कोई नया रसूल तो आया नहीं हूँ और मैं कुछ नहीं जानता कि आइन्दा मेरे साथ क्या किया जाएगा और न (ये कि) तुम्हारे साथ क्या किया जाएगा मैं तो बस उसी का पाबन्द हूँ जो मेरे पास वही आयी है और मैं तो बस एलानिया डराने वाला हूँ

  10. 10 قُلۡ أَرَءَیۡتُمۡ إِن كَانَ مِنۡ عِندِ ٱللَّهِ وَكَفَرۡتُم بِهِۦ وَشَهِدَ شَاهِدࣱ مِّنۢ بَنِیۤ إِسۡرَ ٰ⁠ۤءِیلَ عَلَىٰ مِثۡلِهِۦ فَـَٔامَنَ وَٱسۡتَكۡبَرۡتُمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا یَهۡدِی ٱلۡقَوۡمَ ٱلظَّـٰلِمِینَ

    क़ुल अराअतुम इन काना एंदे अल्लाह व कफ़र्तुम बेहि वशहिद शाहिद बनी इस्रा विश्वास ईल अला मिस्लिही फ़ामेना वस्तकबरतुम इन्ना अल्लाह अल-कौम अज़-ज़़ालिमीन

    (ऐ रसूल) तुम कह दो कि भला देखो तो कि अगर ये (क़ुरान) ख़ुदा की तरफ से हो और तुम उससे इन्कार कर बैठे हालॉकि (बनी इसराईल में से) एक गवाह उसके मिसल की गवाही भी दे चुका और ईमान भी ले आया और तुमने सरकशी की (तो तुम्हारे ज़ालिम होने में क्या शक़ है) बेशक ख़ुदा ज़ालिम लोगों को मन्ज़िल मक़सूद तक नहीं पहुँचाता

  11. 11 وَقَالَ ٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ لِلَّذِینَ ءَامَنُوا۟ لَوۡ كَانَ خَیۡرࣰا مَّا سَبَقُونَاۤ إِلَیۡهِۚ وَإِذۡ لَمۡ یَهۡتَدُوا۟ بِهِۦ فَسَیَقُولُونَ هَـٰذَاۤ إِفۡكࣱ قَدِیمࣱ

    व काला अल्लाज़ीना कफ़रू लिल्लाज़िना अमेनुआ लौ काना खैरन मा वा इज़ लम यहतदुआ बेहि फसयकूलून इफ़्क कदीम

    और काफिर लोग मोमिनों के बारे में कहते हैं कि अगर ये (दीन) बेहतर होता तो ये लोग उसकी तरफ हमसे पहले न दौड़ पड़ते और जब क़ुरान के ज़रिए से उनकी हिदायत न हुई तो अब भी कहेंगे ये तो एक क़दीमी झूठ है

  12. 12 وَمِن قَبۡلِهِۦ كِتَـٰبُ مُوسَىٰۤ إِمَامࣰا وَرَحۡمَةࣰۚ وَهَـٰذَا كِتَـٰبࣱ مُّصَدِّقࣱ لِّسَانًا عَرَبِیࣰّا لِّیُنذِرَ ٱلَّذِینَ ظَلَمُوا۟ وَبُشۡرَىٰ لِلۡمُحۡسِنِینَ

    वमेन क़ब्लिही किताब मूसा इमाम वरहमतन वहाझा किताब मुसद्दिकुन लिसान अरबी लिंज़िरा अल्लाज़ीना ज़लामू वबुश्रा लिल मुहसिनीन

    और इसके क़ब्ल मूसा की किताब पेशवा और (सरासर) रहमत थी और ये (क़ुरान) वह किताब है जो अरबी ज़बान में (उसकी) तसदीक़ करती है ताकि (इसके ज़रिए से) ज़ालिमों को डराए और नेकी कारों के लिए (अज़सरतापा) ख़ुशख़बरी है

  13. 13 إِنَّ ٱلَّذِینَ قَالُوا۟ رَبُّنَا ٱللَّهُ ثُمَّ ٱسۡتَقَـٰمُوا۟ فَلَا خَوۡفٌ عَلَیۡهِمۡ وَلَا هُمۡ یَحۡزَنُونَ

    इन्ना अल्लाज़ीना अल्लाह सुम्म इस्तक़ामू फ़ला खौफ़ुन अलैहिम हुम यहज़नून

    बेशक जिन लोगों ने कहा कि हमारा परवरदिगार ख़ुदा है फिर वह इस पर क़ायम रहे तो (क़यामत में) उनको न कुछ ख़ौफ़ होगा और न वह ग़मग़ीन होंगे

  14. 14 أُو۟لَـٰۤىِٕكَ أَصۡحَـٰبُ ٱلۡجَنَّةِ خَـٰلِدِینَ فِیهَا جَزَاۤءَۢ بِمَا كَانُوا۟ یَعۡمَلُونَ

    उलाइक असहाबु अल जन्नत ख़ालिदीन फ़िहा जज़ा बिमा कानू यामलून

    यही तो अहले जन्नत हैं कि हमेशा उसमें रहेंगे (ये) उसका सिला है जो ये लोग (दुनिया में) किया करते थे

  15. 15 وَوَصَّیۡنَا ٱلۡإِنسَـٰنَ بِوَ ٰ⁠لِدَیۡهِ إِحۡسَـٰنًاۖ حَمَلَتۡهُ أُمُّهُۥ كُرۡهࣰا وَوَضَعَتۡهُ كُرۡهࣰاۖ وَحَمۡلُهُۥ وَفِصَـٰلُهُۥ ثَلَـٰثُونَ شَهۡرًاۚ حَتَّىٰۤ إِذَا بَلَغَ أَشُدَّهُۥ وَبَلَغَ أَرۡبَعِینَ سَنَةࣰ قَالَ رَبِّ أَوۡزِعۡنِیۤ أَنۡ أَشۡكُرَ نِعۡمَتَكَ ٱلَّتِیۤ أَنۡعَمۡتَ عَلَیَّ وَعَلَىٰ وَ ٰ⁠لِدَیَّ وَأَنۡ أَعۡمَلَ صَـٰلِحࣰا تَرۡضَىٰهُ وَأَصۡلِحۡ لِی فِی ذُرِّیَّتِیۤۖ إِنِّی تُبۡتُ إِلَیۡكَ وَإِنِّی مِنَ ٱلۡمُسۡلِمِینَ

    ववसैना अल-इंसान बेवा विश्वास लेदयहि इह्सानान हमलत्हु उम्मुहु कुरहान ववज़अथु वहम्लुहु वफेसालुहु थेलाथूना शहर इज़ा बलाग़ा अशुद्दाहु वबलग़ा अरबईन क़ाला रब्बी ओज़िनी अश्कुर निअमतक अनअम्त अलय्य व अला और विश्वास लेदय्य अ'लम सालेह तर्ज़ाहु वा-अस्लिह लेइ फ़े ज़ुर्रिय्यती इन्नी तुब्तु इलैक वा इन्नी मिन अल-मुस्लिमीन

    और हमने इन्सान को अपने माँ बाप के साथ भलाई करने का हुक्म दिया (क्यों कि) उसकी माँ ने रंज ही की हालत में उसको पेट में रखा और रंज ही से उसको जना और उसका पेट में रहना और उसको दूध बढ़ाई के तीस महीने हुए यहाँ तक कि जब अपनी पूरी जवानी को पहुँचता और चालीस बरस (के सिन) को पहुँचता है तो (ख़ुदा से) अर्ज़ करता है परवरदिगार तो मुझे तौफ़ीक़ अता फरमा कि तूने जो एहसानात मुझ पर और मेरे वालदैन पर किये हैं मैं उन एहसानों का शुक्रिया अदा करूँ और ये (भी तौफीक दे) कि मैं ऐसा नेक काम करूँ जिसे तू पसन्द करे और मेरे लिए मेरी औलाद में सुलाह व तक़वा पैदा करे तेरी तरफ रूजू करता हूँ और मैं यक़ीनन फरमाबरदारो में हूँ

  16. 16 أُو۟لَـٰۤىِٕكَ ٱلَّذِینَ نَتَقَبَّلُ عَنۡهُمۡ أَحۡسَنَ مَا عَمِلُوا۟ وَنَتَجَاوَزُ عَن سَیِّـَٔاتِهِمۡ فِیۤ أَصۡحَـٰبِ ٱلۡجَنَّةِۖ وَعۡدَ ٱلصِّدۡقِ ٱلَّذِی كَانُوا۟ یُوعَدُونَ

    उलाइक अल्लाज़ीना नतकब्बलु अन्हुम अह्सन वना तजावज़ु अन असहाबि वअदा अस-सिद्क़ि अल्लाज़ी कानू यूओअदून

    यही वह लोग हैं जिनके नेक अमल हम क़ुबूल फरमाएँगे और बेहिश्त (के जाने) वालों में उनके गुनाहों से दरग़ुज़र करेंगे (ये वह) सच्चा वायदा है जो उन से किया जाता था

  17. 17 وَٱلَّذِی قَالَ لِوَ ٰ⁠لِدَیۡهِ أُفࣲّ لَّكُمَاۤ أَتَعِدَانِنِیۤ أَنۡ أُخۡرَجَ وَقَدۡ خَلَتِ ٱلۡقُرُونُ مِن قَبۡلِی وَهُمَا یَسۡتَغِیثَانِ ٱللَّهَ وَیۡلَكَ ءَامِنۡ إِنَّ وَعۡدَ ٱللَّهِ حَقࣱّ فَیَقُولُ مَا هَـٰذَاۤ إِلَّاۤ أَسَـٰطِیرُ ٱلۡأَوَّلِینَ

    वल्लाज़ी क़ाला लेवा विश्वास लेदयहि उफ़ लाकुमा अता'इदानिनि उख़रज वक़िद ख़लेती अल-कुरूनु मिन क़बली वहुमा यास्तग़िथान अल्लाह वैलक आमिन इन्ना वअदा अल्लाह हक़् फ़याक़ुलु असतीरु अल-अव्वालीन

    और जिसने अपने माँ बाप से कहा कि तुम्हारा बुरा हो, क्या तुम मुझे धमकी देते हो कि मैं दोबारा (कब्र से) निकाला जाऊँगा हालॉकि बहुत से लोग मुझसे पहले गुज़र चुके (और कोई ज़िन्दा न हुआ) और दोनों फ़रियाद कर रहे थे कि तुझ पर वाए हो ईमान ले आ ख़ुदा का वायदा ज़रूर सच्चा है तो वह बोल उठा कि ये तो बस अगले लोगों के अफ़साने हैं

  18. 18 أُو۟لَـٰۤىِٕكَ ٱلَّذِینَ حَقَّ عَلَیۡهِمُ ٱلۡقَوۡلُ فِیۤ أُمَمࣲ قَدۡ خَلَتۡ مِن قَبۡلِهِم مِّنَ ٱلۡجِنِّ وَٱلۡإِنسِۖ إِنَّهُمۡ كَانُوا۟ خَـٰسِرِینَ

    उलाइक अल्लाज़ीना हक़्क़ा अलय्हिमु अल क़ौलु उमम क़द ख़लत मिन मिन अल-जिन्न इन्नाहुम कानू ख़ासिरीन

    ये वही लोग हैं कि जिन्नात और आदमियों की (दूसरी) उम्मतें जो उनसे पहले गुज़र चुकी हैं उन ही के शुमूल में उन पर भी अज़ाब का वायदा मुस्तहक़ हो चुका है ये लोग बेशक घाटा उठाने वाले थे

  19. 19 وَلِكُلࣲّ دَرَجَـٰتࣱ مِّمَّا عَمِلُوا۟ۖ وَلِیُوَفِّیَهُمۡ أَعۡمَـٰلَهُمۡ وَهُمۡ لَا یُظۡلَمُونَ

    वलीकुल मिम्मा वली युफ्फियहुम अआमालहुम वहुम युज़लमून

    और लोगों ने जैसे काम किये होंगे उसी के मुताबिक सबके दर्जे होंगे और ये इसलिए कि ख़ुदा उनके आमाल का उनको पूरा पूरा बदला दे और उन पर कुछ भी ज़ुल्म न किया जाएं

  20. 20 وَیَوۡمَ یُعۡرَضُ ٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ عَلَى ٱلنَّارِ أَذۡهَبۡتُمۡ طَیِّبَـٰتِكُمۡ فِی حَیَاتِكُمُ ٱلدُّنۡیَا وَٱسۡتَمۡتَعۡتُم بِهَا فَٱلۡیَوۡمَ تُجۡزَوۡنَ عَذَابَ ٱلۡهُونِ بِمَا كُنتُمۡ تَسۡتَكۡبِرُونَ فِی ٱلۡأَرۡضِ بِغَیۡرِ ٱلۡحَقِّ وَبِمَا كُنتُمۡ تَفۡسُقُونَ

    वयोम युरज़ु अल्लाज़ीना कफ़रू अलै अन-नार अज़्हब्तुम तय्यिबातिकुम फ़े हयातिकुमु दुनिया वस्तम्तातुम बेहा फ़ल्यौम तुज्वोन अज़ाब अल-हूनी बिमा तस्तक़्बिरून फ़े अल-अर्द बेग़ैर अल-हक़्क़ी वोबिमा तफ़्सुकून

    और जिस दिन कुफ्फार जहन्नुम के सामने लाएँ जाएँगे (तो उनसे कहा जाएगा कि) तुमने अपनी दुनिया की ज़िन्दगी में अपने मज़े उड़ा चुके और उसमें ख़ूब चैन कर चुके तो आज तुम पर ज़िल्लत का अज़ाब किया जाएगा इसलिए कि तुम अपनी ज़मीन में अकड़ा करते थे और इसलिए कि तुम बदकारियां करते थे

  21. 21 ۞ وَٱذۡكُرۡ أَخَا عَادٍ إِذۡ أَنذَرَ قَوۡمَهُۥ بِٱلۡأَحۡقَافِ وَقَدۡ خَلَتِ ٱلنُّذُرُ مِنۢ بَیۡنِ یَدَیۡهِ وَمِنۡ خَلۡفِهِۦۤ أَلَّا تَعۡبُدُوۤا۟ إِلَّا ٱللَّهَ إِنِّیۤ أَخَافُ عَلَیۡكُمۡ عَذَابَ یَوۡمٍ عَظِیمࣲ

    वज़कुर अखा आदिन इज़् अंज़रा कौमहू बिल अहकाफ वक़िद ख़लेती अन-नुज़ुर बय्न यदय्हि अल्ला ताबुदू इल्ला अल्लाह अखाफु अलैकुम अज़ाब यौम अज़ीम

    और (ऐ रसूल) तुम आद को भाई (हूद) को याद करो जब उन्होंने अपनी क़ौम को (सरज़मीन) अहक़ाफ में डराया और उनके पहले और उनके बाद भी बहुत से डराने वाले पैग़म्बर गुज़र चुके थे (और हूद ने अपनी क़ौम से कहा) कि ख़ुदा के सिवा किसी की इबादत न करो क्योंकि तुम्हारे बारे में एक बड़े सख्त दिन के अज़ाब से डरता हूँ

  22. 22 قَالُوۤا۟ أَجِئۡتَنَا لِتَأۡفِكَنَا عَنۡ ءَالِهَتِنَا فَأۡتِنَا بِمَا تَعِدُنَاۤ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّـٰدِقِینَ

    क़ालू अजितना लेता'फ़िकना अलीहतिना फ़ातिना बिमा ता'इदुना इन कोंता मिन अस-सादिकीन

    वह बोले क्या तुम हमारे पास इसलिए आए हो कि हमको हमारे माबूदों से फेर दो तो अगर तुम सच्चे हो तो जिस अज़ाब की तुम हमें धमकी देते हो ले आओ

  23. 23 قَالَ إِنَّمَا ٱلۡعِلۡمُ عِندَ ٱللَّهِ وَأُبَلِّغُكُم مَّاۤ أُرۡسِلۡتُ بِهِۦ وَلَـٰكِنِّیۤ أَرَىٰكُمۡ قَوۡمࣰا تَجۡهَلُونَ

    क़ाला अल-इल्मु एंदा अल्लाह वा उबल्लिगुकुम उर्सिल्तु बेहि वलाकिनि अरियाकुम क़ौमन तज्हलून

    हूद ने कहा (इसका) इल्म तो बस ख़ुदा के पास है और (मैं जो एहकाम देकर भेजा गया हूँ) वह तुम्हें पहुँचाए देता हूँ मगर मैं तुमको देखता हूँ कि तुम जाहिल लोग हो

  24. 24 فَلَمَّا رَأَوۡهُ عَارِضࣰا مُّسۡتَقۡبِلَ أَوۡدِیَتِهِمۡ قَالُوا۟ هَـٰذَا عَارِضࣱ مُّمۡطِرُنَاۚ بَلۡ هُوَ مَا ٱسۡتَعۡجَلۡتُم بِهِۦۖ رِیحࣱ فِیهَا عَذَابٌ أَلِیمࣱ

    फ़लम्मा राअव्हु आरिदान मुस्तक़्बिल औदियतिहिम हाज़ा आरिज़ मुम्तिरुना हुव इस्तअज्जलतुम रेह फ़िहा अज़ाब अलीम

    तो जब उन लोगों ने इस (अज़ाब) को देखा कि वबाल की तरह उनके मैदानों की तरफ उम्ड़ा आ रहा है तो कहने लगे ये तो बादल है जो हम पर बरस कर रहेगा (नहीं) बल्कि ये वह (अज़ाब) जिसकी तुम जल्दी मचा रहे थे (ये) वह ऑंधी है जिसमें दर्दनाक (अज़ाब) है

  25. 25 تُدَمِّرُ كُلَّ شَیۡءِۭ بِأَمۡرِ رَبِّهَا فَأَصۡبَحُوا۟ لَا یُرَىٰۤ إِلَّا مَسَـٰكِنُهُمۡۚ كَذَ ٰ⁠لِكَ نَجۡزِی ٱلۡقَوۡمَ ٱلۡمُجۡرِمِینَ

    तुदम्मिरु कुल्ला शै बेआम्रि रब्बिहा फ़ाअस्बहु इल्ला मसाकिनुहुम कज़ा विश्वास लेका नज्ज़ी अल-कौम अल-मुजरिमीन

    जो अपने परवरदिगार के हुक्म से हर चीज़ को तबाह व बरबाद कर देगी तो वह ऐसे (तबाह) हुए कि उनके घरों के सिवा कुछ नज़र ही नहीं आता था हम गुनाहगारों की यूँ ही सज़ा किया करते हैं

  26. 26 وَلَقَدۡ مَكَّنَّـٰهُمۡ فِیمَاۤ إِن مَّكَّنَّـٰكُمۡ فِیهِ وَجَعَلۡنَا لَهُمۡ سَمۡعࣰا وَأَبۡصَـٰرࣰا وَأَفۡـِٔدَةࣰ فَمَاۤ أَغۡنَىٰ عَنۡهُمۡ سَمۡعُهُمۡ وَلَاۤ أَبۡصَـٰرُهُمۡ وَلَاۤ أَفۡـِٔدَتُهُم مِّن شَیۡءٍ إِذۡ كَانُوا۟ یَجۡحَدُونَ بِـَٔایَـٰتِ ٱللَّهِ وَحَاقَ بِهِم مَّا كَانُوا۟ بِهِۦ یَسۡتَهۡزِءُونَ

    व-लक्द मक्कानाहुम फ़ेमा इन मक्कानकुम फ़िये वजअल्ना लाहुम समआ वा बसारन वाफ़िदातिन अग़्ना अन्हुम समउहुम वला अब्सारुहुम वला अफिदातुहुम मिन शै इज़् कानू यजहदूना बेआयाति अल्लाह वहाक मा कानू बेहि यसतहज़िउन

    और हमने उनको ऐसे कामों में मक़दूर दिये थे जिनमें तुम्हें (कुछ भी) मक़दूर नहीं दिया और उन्हें कान और ऑंख और दिल (सब कुछ दिए थे) तो चूँकि वह लोग ख़ुदा की आयतों से इन्कार करने लगे तो न उनके कान ही कुछ काम आए और न उनकी ऑंखें और न उनके दिल और जिस (अज़ाब) की ये लोग हँसी उड़ाया करते थे उसने उनको हर तरफ से घेर लिया

  27. 27 وَلَقَدۡ أَهۡلَكۡنَا مَا حَوۡلَكُم مِّنَ ٱلۡقُرَىٰ وَصَرَّفۡنَا ٱلۡـَٔایَـٰتِ لَعَلَّهُمۡ یَرۡجِعُونَ

    व-लक्द हव्लकुम मिन अल-कुरा वसर्रफ़ना अल-आयाति ला'अल्लाहुम यार्जिहून

    और (ऐ अहले मक्का) हमने तुम्हारे इर्द गिर्द की बस्तियों को हलाक कर मारा और (अपनी क़ुदरत की) बहुत सी निशानियाँ तरह तरह से दिखा दी ताकि ये लोग बाज़ आएँ (मगर कौन सुनता है)

  28. 28 فَلَوۡلَا نَصَرَهُمُ ٱلَّذِینَ ٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِ ٱللَّهِ قُرۡبَانًا ءَالِهَةَۢۖ بَلۡ ضَلُّوا۟ عَنۡهُمۡۚ وَذَ ٰ⁠لِكَ إِفۡكُهُمۡ وَمَا كَانُوا۟ یَفۡتَرُونَ

    फ़लौला नस्रहुमु अल्लाज़ीना मिन दूने अल्लाह कुरबान आलिहा ज़ल्लू वज़ा विश्वास लेका इफ़्कुहुम वमा कानू यफ़्तारून

    तो ख़ुदा के सिवा जिन को उन लोगों ने तक़र्रुब (ख़ुदा) के लिए माबूद बना रखा था उन्होंने (अज़ाब के वक्त) उनकी क्यों न मदद की बल्कि वह तो उनसे ग़ायब हो गये और उनके झूठ और उनकी (इफ़तेरा) परदाज़ियों की ये हक़ीक़त थी

  29. 29 وَإِذۡ صَرَفۡنَاۤ إِلَیۡكَ نَفَرࣰا مِّنَ ٱلۡجِنِّ یَسۡتَمِعُونَ ٱلۡقُرۡءَانَ فَلَمَّا حَضَرُوهُ قَالُوۤا۟ أَنصِتُوا۟ۖ فَلَمَّا قُضِیَ وَلَّوۡا۟ إِلَىٰ قَوۡمِهِم مُّنذِرِینَ

    वा इज़ सर्फ़ना इलैक नफ़रन मिन अल-जिन्न यास्तमिउन कुरान फ़लम्मा हज़रुहु क़ालू अन्सितु फ़लम्मा कुज़िया वल्लाव इला कौमिहिम मुन्ज़िरीन

    और जब हमने जिनों में से कई शख़्शों को तुम्हारी तरफ मुतावज्जे किया कि वह दिल लगाकर क़ुरान सुनें तो जब उनके पास हाज़िर हुए तो एक दुसरे से कहने लगे ख़ामोश बैठे (सुनते) रहो फिर जब (पढ़ना) तमाम हुआ तो अपनी क़ौम की तरफ़ वापस गए

  30. 30 قَالُوا۟ یَـٰقَوۡمَنَاۤ إِنَّا سَمِعۡنَا كِتَـٰبًا أُنزِلَ مِنۢ بَعۡدِ مُوسَىٰ مُصَدِّقࣰا لِّمَا بَیۡنَ یَدَیۡهِ یَهۡدِیۤ إِلَى ٱلۡحَقِّ وَإِلَىٰ طَرِیقࣲ مُّسۡتَقِیمࣲ

    या क़ौमना समिअना किताबन उन्ज़िल बादि मुसद्दिक़न लिमा बयना यदय्हि यहदी इला अल-हक़्क़ी वा इला तरीक़ मुस्तक़ीम

    कि (उनको अज़ाब से) डराएं तो उन से कहना शुरू किया कि ऐ भाइयों हम एक किताब सुन आए हैं जो मूसा के बाद नाज़िल हुई है (और) जो किताबें, पहले (नाज़िल हुयीं) हैं उनकी तसदीक़ करती हैं सच्चे (दीन) और सीधी राह की हिदायत करती हैं

  31. 31 یَـٰقَوۡمَنَاۤ أَجِیبُوا۟ دَاعِیَ ٱللَّهِ وَءَامِنُوا۟ بِهِۦ یَغۡفِرۡ لَكُم مِّن ذُنُوبِكُمۡ وَیُجِرۡكُم مِّنۡ عَذَابٍ أَلِیمࣲ

    या क़ौमना अजीबू दाइया अल्लाह वअमिनु बेहि यग़फ़िर मिन ज़ुनुबिकुम वयुजिर्कुम अज़ाबिन

    ऐ हमारी क़ौम ख़ुदा की तरफ बुलाने वाले की बात मानों और ख़ुदा पर ईमान लाओ वह तुम्हारे गुनाह बख्श देगा और (क़यामत) में तुम्हें दर्दनाक अज़ाब से पनाह में रखेगा

  32. 32 وَمَن لَّا یُجِبۡ دَاعِیَ ٱللَّهِ فَلَیۡسَ بِمُعۡجِزࣲ فِی ٱلۡأَرۡضِ وَلَیۡسَ لَهُۥ مِن دُونِهِۦۤ أَوۡلِیَاۤءُۚ أُو۟لَـٰۤىِٕكَ فِی ضَلَـٰلࣲ مُّبِینٍ

    वमन ला यूजिब दाइया अल्लाह फ़लैस बिमुजिज़ फ़े अल-अर्द वलैस मिन उलाइक फ़े ज़लालीन मुबीन

    और जिसने ख़ुदा की तरफ बुलाने वाले की बात न मानी तो (याद रहे कि) वह (ख़ुदा को रूए) ज़मीन में आजिज़ नहीं कर सकता और न उस के सिवा कोई सरपरस्त होगा यही लोग गुमराही में हैं

  33. 33 أَوَلَمۡ یَرَوۡا۟ أَنَّ ٱللَّهَ ٱلَّذِی خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَ ٰ⁠تِ وَٱلۡأَرۡضَ وَلَمۡ یَعۡیَ بِخَلۡقِهِنَّ بِقَـٰدِرٍ عَلَىٰۤ أَن یُحۡـِۧیَ ٱلۡمَوۡتَىٰۚ بَلَىٰۤۚ إِنَّهُۥ عَلَىٰ كُلِّ شَیۡءࣲ قَدِیرࣱ

    औलम यारो अन्ना अल्लाह अल्लाज़ी ख़लक़ अस-समावा विश्वास ते वल अर्द वलम या'या बेख़ल्किहिन्न बेकादिर अन युहिया बला इन्नाहु अला कुल्लि शै क़दीर

    क्या इन लोगों ने ये ग़ौर नहीं किया कि जिस ख़ुदा ने सारे आसमान और ज़मीन को पैदा किया और उनके पैदा करने से ज़रा भी थका नहीं वह इस बात पर क़ादिर है कि मुर्दो को ज़िन्दा करेगा हाँ (ज़रूर) वह हर चीज़ पर क़ादिर है

  34. 34 وَیَوۡمَ یُعۡرَضُ ٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ عَلَى ٱلنَّارِ أَلَیۡسَ هَـٰذَا بِٱلۡحَقِّۖ قَالُوا۟ بَلَىٰ وَرَبِّنَاۚ قَالَ فَذُوقُوا۟ ٱلۡعَذَابَ بِمَا كُنتُمۡ تَكۡفُرُونَ

    वयोम युरज़ु अल्लाज़ीना कफ़रू अलै अन-नार अलैस हाज़ा व रब्बना क़ाला फ़ज़ूकू अल-अज़ाब बिमा तक़्फ़ुरून

    जिस दिन कुफ्फ़ार (जहन्नुम की) आग के सामने पेश किए जाएँगे (तो उन से पूछा जाएगा) क्या अब भी ये बरहक़ नहीं है वह लोग कहेंगे अपने परवरदिगार की क़सम हाँ (हक़ है) ख़ुदा फ़रमाएगा तो लो अब अपने इन्कार व कुफ्र के बदले अज़ाब के मज़े चखो

  35. 35 فَٱصۡبِرۡ كَمَا صَبَرَ أُو۟لُوا۟ ٱلۡعَزۡمِ مِنَ ٱلرُّسُلِ وَلَا تَسۡتَعۡجِل لَّهُمۡۚ كَأَنَّهُمۡ یَوۡمَ یَرَوۡنَ مَا یُوعَدُونَ لَمۡ یَلۡبَثُوۤا۟ إِلَّا سَاعَةࣰ مِّن نَّهَارِۭۚ بَلَـٰغࣱۚ فَهَلۡ یُهۡلَكُ إِلَّا ٱلۡقَوۡمُ ٱلۡفَـٰسِقُونَ

    फ़ास्बिर सबर उलू अल-अज़्मि मिन अल-रुसुली तस्तअ'जिल काअन्नाहुम यौम यारवोन यूओअदून लम यल्बथुआ इल्ला साअत मिन नहार बलाग़ फहल योल्कु इल्ला अल-कौम अल-फ़ासिक़ून

    तो (ऐ रसूल) पैग़म्बरों में से जिस तरह अव्वलुल अज्म (आली हिम्मत), सब्र करते रहे तुम भी सब्र करो और उनके लिए (अज़ाब) की ताज़ील की ख्वाहिश न करो जिस दिन यह लोग उस कयामत को देखेंगे जिसको उनसे वायदा किया जाता है तो (उनको मालूम होगा कि) गोया ये लोग (दुनिया में) बहुत रहे होगें तो सारे दिन में से एक घड़ी भर तो बस वही लोग हलाक होंगे जो बदकार थे

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