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Al-Jaathiya

अल-जासिया

घुटने के बल बैठने वाले

37 ayahsMeccanहिन्दी

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بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَـٰنِ ٱلرَّحِیمِ

बिस्मि अल्लाह अर-रहमान अर-रहीम

  1. 1 حمۤ

    हम

    हा मीम

  2. 2 تَنزِیلُ ٱلۡكِتَـٰبِ مِنَ ٱللَّهِ ٱلۡعَزِیزِ ٱلۡحَكِیمِ

    तंज़ील अल किताब मिन अल्लाह अल-अज़ीज़ अल-हकीमी

    ये किताब (क़ुरान) ख़ुदा की तरफ से नाज़िल हुईहै जो ग़ालिब और दाना है

  3. 3 إِنَّ فِی ٱلسَّمَـٰوَ ٰ⁠تِ وَٱلۡأَرۡضِ لَـَٔایَـٰتࣲ لِّلۡمُؤۡمِنِینَ

    इन्ना फ़े अस-समावा विश्वास ते वल अर्दि ला-यात लिल मु'मिनीन

    बेशक आसमान और ज़मीन में ईमान वालों के लिए (क़ुदरते ख़ुदा की) बहुत सी निशानियाँ हैं

  4. 4 وَفِی خَلۡقِكُمۡ وَمَا یَبُثُّ مِن دَاۤبَّةٍ ءَایَـٰتࣱ لِّقَوۡمࣲ یُوقِنُونَ

    वफ़ी ख़ल्किकुम वमा यबुस्सु मिन दाब्बतुन आयात लिक़ौमिन योकुनून

    और तुम्हारी पैदाइश में (भी) और जिन जानवरों को वह (ज़मीन पर) फैलाता रहता है (उनमें भी) यक़ीन करने वालों के वास्ते बहुत सी निशानियाँ हैं

  5. 5 وَٱخۡتِلَـٰفِ ٱلَّیۡلِ وَٱلنَّهَارِ وَمَاۤ أَنزَلَ ٱللَّهُ مِنَ ٱلسَّمَاۤءِ مِن رِّزۡقࣲ فَأَحۡیَا بِهِ ٱلۡأَرۡضَ بَعۡدَ مَوۡتِهَا وَتَصۡرِیفِ ٱلرِّیَـٰحِ ءَایَـٰتࣱ لِّقَوۡمࣲ یَعۡقِلُونَ

    वख्तिलाफ़ अल-लैल वल्नहार अंज़ल अल्लाह मिन अस-समा मिन रिज़्क फ़ा-हया अल-अर्द बाद वा तस्रीफ़ी अर-रियाह आयात लिक़ौमिन याक़िलून

    और रात दिन के आने जाने में और ख़ुदा ने आसमान से जो (ज़रिया) रिज़क (पानी) नाज़िल फरमाया फिर उससे ज़मीन को उसके मर जाने के बाद ज़िन्दा किया (उसमें) और हवाओं फेर बदल में अक्लमन्द लोगों के लिए बहुत सी निशानियाँ हैं

  6. 6 تِلۡكَ ءَایَـٰتُ ٱللَّهِ نَتۡلُوهَا عَلَیۡكَ بِٱلۡحَقِّۖ فَبِأَیِّ حَدِیثِۭ بَعۡدَ ٱللَّهِ وَءَایَـٰتِهِۦ یُؤۡمِنُونَ

    तल्का आयत अल्लाह नात्लुहा अलैक फ़बैय्यि हदीस बाद अल्लाह वा आयातिहि यूमीनून

    ये ख़ुदा की आयतें हैं जिनको हम ठीक (ठीक) तुम्हारे सामने पढ़ते हैं तो ख़ुदा और उसकी आयतों के बाद कौन सी बात होगी

  7. 7 وَیۡلࣱ لِّكُلِّ أَفَّاكٍ أَثِیمࣲ

    वैल लिकुल अफ्फाकिन असीम

    जिस पर ये लोग ईमान लाएंगे हर झूठे गुनाहगार पर अफसोस है

  8. 8 یَسۡمَعُ ءَایَـٰتِ ٱللَّهِ تُتۡلَىٰ عَلَیۡهِ ثُمَّ یُصِرُّ مُسۡتَكۡبِرࣰا كَأَن لَّمۡ یَسۡمَعۡهَاۖ فَبَشِّرۡهُ بِعَذَابٍ أَلِیمࣲ

    यास्माउ आयात अल्लाह तुतला अलय्हि सुम्म युसुर्रु मुस्तकबिरन काअन लम यास्मेहा फबश्शिर्हु बिअज़ाब

    कि ख़ुदा की आयतें उसके सामने पढ़ी जाती हैं और वह सुनता भी है फिर ग़ुरूर से (कुफ़्र पर) अड़ा रहता है गोया उसने उन आयतों को सुना ही नहीं तो (ऐ रसूल) तुम उसे दर्दनाक अज़ाब की ख़ुशख़बरी दे दो

  9. 9 وَإِذَا عَلِمَ مِنۡ ءَایَـٰتِنَا شَیۡـًٔا ٱتَّخَذَهَا هُزُوًاۚ أُو۟لَـٰۤىِٕكَ لَهُمۡ عَذَابࣱ مُّهِینࣱ

    वा इज़ा अलिमा आयातिना शैअन इत्तख़ज़हा हुज़ूअन उलाइक लाहुम अज़ाब मुहीन

    और जब हमारी आयतों में से किसी आयत पर वाक़िफ़ हो जाता है तो उसकी हँसी उड़ाता है ऐसे ही लोगों के वास्ते ज़लील करने वाला अज़ाब है

  10. 10 مِّن وَرَاۤىِٕهِمۡ جَهَنَّمُۖ وَلَا یُغۡنِی عَنۡهُم مَّا كَسَبُوا۟ شَیۡـࣰٔا وَلَا مَا ٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِ ٱللَّهِ أَوۡلِیَاۤءَۖ وَلَهُمۡ عَذَابٌ عَظِیمٌ

    मिन जहन्नम युग्नी मा कसबुआ मिन दूने अल्लाह वलहुम अज़ाब अज़ीम

    जहन्नुम तो उनके पीछे ही (पीछे) है और जो कुछ वह आमाल करते रहे न तो वही उनके कुछ काम आएँगे और न जिनको उन्होंने ख़ुदा को छोड़कर (अपने) सरपरस्त बनाए थे और उनके लिए बड़ा (सख्त) अज़ाब है

  11. 11 هَـٰذَا هُدࣰىۖ وَٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ بِـَٔایَـٰتِ رَبِّهِمۡ لَهُمۡ عَذَابࣱ مِّن رِّجۡزٍ أَلِیمٌ

    हाज़ा वल्लाज़ीना कफ़रू बेआयाति रब्बिहिम लाहुम अज़ाब मिन रिज अलीमुन

    ये (क़ुरान) है और जिन लोगों ने अपने परवरदिगार की आयतों से इन्कार किया उनके लिए सख्त किस्म का दर्दनाक अज़ाब होगा

  12. 12 ۞ ٱللَّهُ ٱلَّذِی سَخَّرَ لَكُمُ ٱلۡبَحۡرَ لِتَجۡرِیَ ٱلۡفُلۡكُ فِیهِ بِأَمۡرِهِۦ وَلِتَبۡتَغُوا۟ مِن فَضۡلِهِۦ وَلَعَلَّكُمۡ تَشۡكُرُونَ

    अल्लाह अल्लाज़ी सख्खर लकुमु अल-बहरा ले-तज्रिया अल-फुल्कु फ़िये बेआम्रिही वलेतबतेग़ू मिन फ़ज़्लिही वेलअलकुम तशकुरून

    ख़ुदा ही तो है जिसने दरिया को तुम्हारे क़ाबू में कर दिया ताकि उसके हुक्म से उसमें कश्तियां चलें और ताकि उसके फज़ल (व करम) से (मआश की) तलाश करो और ताकि तुम शुक्र करो

  13. 13 وَسَخَّرَ لَكُم مَّا فِی ٱلسَّمَـٰوَ ٰ⁠تِ وَمَا فِی ٱلۡأَرۡضِ جَمِیعࣰا مِّنۡهُۚ إِنَّ فِی ذَ ٰ⁠لِكَ لَـَٔایَـٰتࣲ لِّقَوۡمࣲ یَتَفَكَّرُونَ

    व सख्खर मा फ़े अस-समावा विश्वास ते वमा फ़े अल-अर्द जमिअन इन्ना फ़े ज़ा विश्वास लेका ला-यात लिक़ौमिन यतफक्करून

    और जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है सबको अपने (हुक्म) से तुम्हारे काम में लगा दिया है जो लोग ग़ौर करते हैं उनके लिए इसमें (क़ुदरते ख़ुदा की) बहुत सी निशानियाँ हैं

  14. 14 قُل لِّلَّذِینَ ءَامَنُوا۟ یَغۡفِرُوا۟ لِلَّذِینَ لَا یَرۡجُونَ أَیَّامَ ٱللَّهِ لِیَجۡزِیَ قَوۡمَۢا بِمَا كَانُوا۟ یَكۡسِبُونَ

    लिल्लाज़ीन अमेनुआ यग़फ़िरू लिल्लाज़िना यार्जौना अय्याम अल्लाह लेयज़िया कौमा बिमा कानू यक्सिबून

    (ऐ रसूल) मोमिनों से कह दो कि जो लोग ख़ुदा के दिनों की (जो जज़ा के लिए मुक़र्रर हैं) तवक्क़ो नहीं रखते उनसे दरगुज़र करें ताकि वह लोगों के आमाल का बदला दे

  15. 15 مَنۡ عَمِلَ صَـٰلِحࣰا فَلِنَفۡسِهِۦۖ وَمَنۡ أَسَاۤءَ فَعَلَیۡهَاۖ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّكُمۡ تُرۡجَعُونَ

    अमिल सालेह फ़ालेनफ़्सिही असा फ़ाअलयहा सुम्म इला रब्बिकुम तुरजाउन

    जो शख़्श नेक काम करता है तो ख़ास अपने लिए और बुरा काम करेगा तो उस का वबाल उसी पर होगा फिर (आख़िर) तुम अपने परवरदिगार की तरफ लौटाए जाओगे

  16. 16 وَلَقَدۡ ءَاتَیۡنَا بَنِیۤ إِسۡرَ ٰ⁠ۤءِیلَ ٱلۡكِتَـٰبَ وَٱلۡحُكۡمَ وَٱلنُّبُوَّةَ وَرَزَقۡنَـٰهُم مِّنَ ٱلطَّیِّبَـٰتِ وَفَضَّلۡنَـٰهُمۡ عَلَى ٱلۡعَـٰلَمِینَ

    व-लक्द अतिना बनी इस्रा विश्वास ईल अल किताब वल-हुक्म वल-नुबुव्वता वरक़नहुम मिन अत-तय्यिबात वा फ़द्दलनाहुम अलै अल-आलमीन

    और हमने बनी इसराईल को किताब (तौरेत) और हुकूमत और नबूवत अता की और उन्हें उम्दा उम्दा चीज़ें खाने को दीं और उनको सारे जहॉन पर फ़ज़ीलत दी

  17. 17 وَءَاتَیۡنَـٰهُم بَیِّنَـٰتࣲ مِّنَ ٱلۡأَمۡرِۖ فَمَا ٱخۡتَلَفُوۤا۟ إِلَّا مِنۢ بَعۡدِ مَا جَاۤءَهُمُ ٱلۡعِلۡمُ بَغۡیَۢا بَیۡنَهُمۡۚ إِنَّ رَبَّكَ یَقۡضِی بَیۡنَهُمۡ یَوۡمَ ٱلۡقِیَـٰمَةِ فِیمَا كَانُوا۟ فِیهِ یَخۡتَلِفُونَ

    वा अतैनाहुम मिन फ़मा इख्तलाफुआ इल्ला बादि जाआहुम अल-इल्मु बग़िया इन्ना रब्बक याक़्ज़ी बयनहुम यौम अल-क़ियामा कानू फ़िये यख्तलीफ़ून

    और उनको दीन की खुली हुई दलीलें इनायत की तो उन लोगों ने इल्म आ चुकने के बाद बस आपस की ज़िद में एक दूसरे से एख्तेलाफ़ किया कि ये लोग जिन बातों से एख्तेलाफ़ कर रहें हैं क़यामत के दिन तुम्हारा परवरदिगार उनमें फैसला कर देगा

  18. 18 ثُمَّ جَعَلۡنَـٰكَ عَلَىٰ شَرِیعَةࣲ مِّنَ ٱلۡأَمۡرِ فَٱتَّبِعۡهَا وَلَا تَتَّبِعۡ أَهۡوَاۤءَ ٱلَّذِینَ لَا یَعۡلَمُونَ

    सुम्म जाअलनाक अला शरीयत मिन अल-अम्रि फ़त्ताबिहा तत्बि अहवा अल्लाज़ीना यालमून

    फिर (ऐ रसूल) हमने तुमको दीन के खुले रास्ते पर क़ायम किया है तो इसी (रास्ते) पर चले जाओ और नादानों की ख्वाहिशो की पैरवी न करो

  19. 19 إِنَّهُمۡ لَن یُغۡنُوا۟ عَنكَ مِنَ ٱللَّهِ شَیۡـࣰٔاۚ وَإِنَّ ٱلظَّـٰلِمِینَ بَعۡضُهُمۡ أَوۡلِیَاۤءُ بَعۡضࣲۖ وَٱللَّهُ وَلِیُّ ٱلۡمُتَّقِینَ

    इन्नाहुम लैन युग्नू अनक मिन अल्लाह वा इन्ना अज़-ज़़ालिमीन बअसुम औलिया वल्लाहु वलीय्यु अल-मुत्तक़ीन

    ये लोग ख़ुदा के सामने तुम्हारे कुछ भी काम न आएँगे और ज़ालिम लोग एक दूसरे के मददगार हैं और ख़ुदा तो परहेज़गारों का मददगार है

  20. 20 هَـٰذَا بَصَـٰۤىِٕرُ لِلنَّاسِ وَهُدࣰى وَرَحۡمَةࣱ لِّقَوۡمࣲ یُوقِنُونَ

    हाज़ा बसाइर लिल-नास वहूदन लिक़ौमिन योकुनून

    ये (क़ुरान) लोगों (की) हिदायत के लिए दलीलो का मजमूआ है और बातें करने वाले लोगों के लिए (अज़सरतापा) हिदायत व रहमत है

  21. 21 أَمۡ حَسِبَ ٱلَّذِینَ ٱجۡتَرَحُوا۟ ٱلسَّیِّـَٔاتِ أَن نَّجۡعَلَهُمۡ كَٱلَّذِینَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ سَوَاۤءࣰ مَّحۡیَاهُمۡ وَمَمَاتُهُمۡۚ سَاۤءَ مَا یَحۡكُمُونَ

    अम हसिब अल्लाज़ीना इज्तेराहु अस-सय्यिआत अन नजअलहुम कल्लाज़ीना अमेनुआ वा अमिलू अस-सालिहाति सवा महयाहुम वममातुहुम सा यहकुमून

    जो लोग बुरा काम किया करते हैं क्या वह ये समझते हैं कि हम उनको उन लोगों के बराबर कर देंगे जो ईमान लाए और अच्छे अच्छे काम भी करते रहे और उन सब का जीना मरना एक सा होगा ये लोग (क्या) बुरे हुक्म लगाते हैं

  22. 22 وَخَلَقَ ٱللَّهُ ٱلسَّمَـٰوَ ٰ⁠تِ وَٱلۡأَرۡضَ بِٱلۡحَقِّ وَلِتُجۡزَىٰ كُلُّ نَفۡسِۭ بِمَا كَسَبَتۡ وَهُمۡ لَا یُظۡلَمُونَ

    वा-ख़लक़ अल्लाह अस-समावा विश्वास ते वल अर्द बिल-हक्की वलितुज्ज़ा कुल्लु नफ़्स बिमा कसबत वहुम युज़लमून

    और ख़ुदा ने सारे आसमान व ज़मीन को हिकमत व मसलेहत से पैदा किया और ताकि हर शख़्श को उसके किये का बदला दिया जाए और उन पर (किसी तरह का) ज़ुल्म नहीं किया जाएगा

  23. 23 أَفَرَءَیۡتَ مَنِ ٱتَّخَذَ إِلَـٰهَهُۥ هَوَىٰهُ وَأَضَلَّهُ ٱللَّهُ عَلَىٰ عِلۡمࣲ وَخَتَمَ عَلَىٰ سَمۡعِهِۦ وَقَلۡبِهِۦ وَجَعَلَ عَلَىٰ بَصَرِهِۦ غِشَـٰوَةࣰ فَمَن یَهۡدِیهِ مِنۢ بَعۡدِ ٱللَّهِۚ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ

    अफ़रायता मनि इत्तख़ाज़ा इलाहाहु हवाहु वा अदल्लाहु अल्लाह अला वख़तम अला समिही वा क़ल्बिही वजाला अला बसारिहि ग़ेशावा फ़मान यहदिहि बादि अ-फा-ला तज़क्करून

    भला तुमने उस शख़्श को भी देखा है जिसने अपनी नफसियानी ख़वाहिशों को माबूद बना रखा है और (उसकी हालत) समझ बूझ कर ख़ुदा ने उसे गुमराही में छोड़ दिया है और उसके कान और दिल पर अलामत मुक़र्रर कर दी है (कि ये ईमान न लाएगा) और उसकी ऑंख पर पर्दा डाल दिया है फिर ख़ुदा के बाद उसकी हिदायत कौन कर सकता है तो क्या तुम लोग (इतना भी) ग़ौर नहीं करते

  24. 24 وَقَالُوا۟ مَا هِیَ إِلَّا حَیَاتُنَا ٱلدُّنۡیَا نَمُوتُ وَنَحۡیَا وَمَا یُهۡلِكُنَاۤ إِلَّا ٱلدَّهۡرُۚ وَمَا لَهُم بِذَ ٰ⁠لِكَ مِنۡ عِلۡمٍۖ إِنۡ هُمۡ إِلَّا یَظُنُّونَ

    व क़ालू हेया इल्ला हय्यातुना दुनिया नमुतु वनेहया वमा युह्लिकना इल्ला अद-दहरु वमा बेज़ विश्वास लेका इल्मिन हुम इल्ला याज़ुन्नुना

    और वह लोग कहते हैं कि हमारी ज़िन्दगी तो बस दुनिया ही की है (यहीं) मरते हैं और (यहीं) जीते हैं और हमको बस ज़माना ही (जिलाता) मारता है और उनको इसकी कुछ ख़बर तो है नहीं ये लोग तो बस अटकल की बातें करते हैं

  25. 25 وَإِذَا تُتۡلَىٰ عَلَیۡهِمۡ ءَایَـٰتُنَا بَیِّنَـٰتࣲ مَّا كَانَ حُجَّتَهُمۡ إِلَّاۤ أَن قَالُوا۟ ٱئۡتُوا۟ بِـَٔابَاۤىِٕنَاۤ إِن كُنتُمۡ صَـٰدِقِینَ

    वा इज़ा तुतला अलैहिम आयातुना मा काना हुज्जतुहुम अन अतुआ बेआबाइनेआ इन सादिक़ीन

    और जब उनके सामने हमारी खुली खुली आयतें पढ़ी जाती हैं तो उनकी कट हुज्जती बस यही होती है कि वह कहते हैं कि अगर तुम सच्चे हो तो हमारे बाप दादाओं को (जिला कर) ले तो आओ

  26. 26 قُلِ ٱللَّهُ یُحۡیِیكُمۡ ثُمَّ یُمِیتُكُمۡ ثُمَّ یَجۡمَعُكُمۡ إِلَىٰ یَوۡمِ ٱلۡقِیَـٰمَةِ لَا رَیۡبَ فِیهِ وَلَـٰكِنَّ أَكۡثَرَ ٱلنَّاسِ لَا یَعۡلَمُونَ

    कुल अल्लाह युहियीकुम सुम्म युमैतुकुम सुम्म यजमाउकुम इला यौम अल-क़ियामा रैब फ़िये वलाकिन अक्सर अन्नास यालमून

    (ऐ रसूल) तुम कह दो कि ख़ुदा ही तुमको ज़िन्दा (पैदा) करता है और वही तुमको मारता है फिर वही तुमको क़यामत के दिन जिस (के होने) में किसी तरह का शक़ नहीं जमा करेगा मगर अक्सर लोग नहीं जानते

  27. 27 وَلِلَّهِ مُلۡكُ ٱلسَّمَـٰوَ ٰ⁠تِ وَٱلۡأَرۡضِۚ وَیَوۡمَ تَقُومُ ٱلسَّاعَةُ یَوۡمَىِٕذࣲ یَخۡسَرُ ٱلۡمُبۡطِلُونَ

    वलिल्लाह मुल्क अस-समावा विश्वास ते वयोम तक़ूमु अस-साआ यौमाइज़ि यख्सरु अल-मुब्तिलून

    और सारे आसमान व ज़मीन की बादशाहत ख़ास ख़ुदा की है और जिस रोज़ क़यामत बरपा होगी उस रोज़ अहले बातिल बड़े घाटे में रहेंगे

  28. 28 وَتَرَىٰ كُلَّ أُمَّةࣲ جَاثِیَةࣰۚ كُلُّ أُمَّةࣲ تُدۡعَىٰۤ إِلَىٰ كِتَـٰبِهَا ٱلۡیَوۡمَ تُجۡزَوۡنَ مَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ

    वेतरा कुल्ला उम्माह जासिया कुल्लु उम्माह तुदआ इला किताबिहा अल-यौम तुज्वोन तामलून

    और (ऐ रसूल) तुम हर उम्मत को देखोगे कि (फैसले की मुन्तज़िर अदब से) घूटनों के बल बैठी होगी और हर उम्मत अपने नामाए आमाल की तरफ बुलाइ जाएगी जो कुछ तुम लोग करते थे आज तुमको उसका बदला दिया जाएगा

  29. 29 هَـٰذَا كِتَـٰبُنَا یَنطِقُ عَلَیۡكُم بِٱلۡحَقِّۚ إِنَّا كُنَّا نَسۡتَنسِخُ مَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ

    हाज़ा किताबुना यान्तिकु कुन्ना नस्तान्सिखु तामलून

    ये हमारी किताब (जिसमें आमाल लिखे हैं) तुम्हारे मुक़ाबले में ठीक ठीक बोल रही है जो कुछ भी तुम करते थे हम लिखवाते जाते थे

  30. 30 فَأَمَّا ٱلَّذِینَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ فَیُدۡخِلُهُمۡ رَبُّهُمۡ فِی رَحۡمَتِهِۦۚ ذَ ٰ⁠لِكَ هُوَ ٱلۡفَوۡزُ ٱلۡمُبِینُ

    फ़ाम्मा अल्लाज़ीना अमेनुआ वा अमिलू अस-सालिहाति फ़ैदखिलुहुम फ़े रहमतिहि ज़ा विश्वास लेका हुव अल-फौज़ु अल-मुबीनु

    ग़रज़ जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे (अच्छे) काम किये तो उनको उनका परवरदिगार अपनी रहमत (से बेहिश्त) में दाख़िल करेगा यही तो सरीही कामयाबी है

  31. 31 وَأَمَّا ٱلَّذِینَ كَفَرُوۤا۟ أَفَلَمۡ تَكُنۡ ءَایَـٰتِی تُتۡلَىٰ عَلَیۡكُمۡ فَٱسۡتَكۡبَرۡتُمۡ وَكُنتُمۡ قَوۡمࣰا مُّجۡرِمِینَ

    वा अम्मा अल्लाज़ीना अफ़लम आयाति तुतला अलैकुम फ़ास्तक्बर्तुम वा कुंतुम क़ौमन मुजरिमीन

    और जिन्होंने कुफ्र एख्तेयार किया (उनसे कहा जाएगा) तो क्या तुम्हारे सामने हमारी आयतें नहीं पढ़ी जाती थीं (ज़रूर) तो तुमने तकब्बुर किया और तुम लोग तो गुनेहगार हो गए

  32. 32 وَإِذَا قِیلَ إِنَّ وَعۡدَ ٱللَّهِ حَقࣱّ وَٱلسَّاعَةُ لَا رَیۡبَ فِیهَا قُلۡتُم مَّا نَدۡرِی مَا ٱلسَّاعَةُ إِن نَّظُنُّ إِلَّا ظَنࣰّا وَمَا نَحۡنُ بِمُسۡتَیۡقِنِینَ

    वा इज़ा क़िला इन्ना वअदा अल्लाह हक़् वल-साअह रैब फ़िहा क़ुलतुम मा अस-साआ इन नज़़्ुन इल्ला ज़न्नन वमा नह्नु बेमुस्तय्किनीन

    और जब (तुम से) कहा जाता था कि ख़ुदा का वायदा सच्चा है और क़यामत (के आने) में कुछ शुबहा नहीं तो तुम कहते थे कि हम नहीं जानते कि क़यामत क्या चीज़ है हम तो बस (उसे) एक ख्याली बात समझते हैं और हम तो (उसका) यक़ीन नहीं रखते

  33. 33 وَبَدَا لَهُمۡ سَیِّـَٔاتُ مَا عَمِلُوا۟ وَحَاقَ بِهِم مَّا كَانُوا۟ بِهِۦ یَسۡتَهۡزِءُونَ

    वबदा लाहुम सैय्यतु वहाक मा कानू बेहि यसतहज़िउन

    और उनके करतूतों की बुराईयाँ उस पर ज़ाहिर हो जाएँगी और जिस (अज़ाब) की ये हँसी उड़ाया करते थे उन्हें (हर तरफ से) घेर लेगा

  34. 34 وَقِیلَ ٱلۡیَوۡمَ نَنسَىٰكُمۡ كَمَا نَسِیتُمۡ لِقَاۤءَ یَوۡمِكُمۡ هَـٰذَا وَمَأۡوَىٰكُمُ ٱلنَّارُ وَمَا لَكُم مِّن نَّـٰصِرِینَ

    वकील अल-यौम नंसाकुम नसीतुम लीक़ा यौमिकुम हाज़ा वमवयकुम वमा मिन नासिरीन

    और (उनसे) कहा जाएगा कि जिस तरह तुमने उस दिन के आने को भुला दिया था उसी तरह आज हम तुमको अपनी रहमत से अमदन भुला देंगे और तुम्हारा ठिकाना दोज़ख़ है और कोई तुम्हारा मददगार नहीं

  35. 35 ذَ ٰ⁠لِكُم بِأَنَّكُمُ ٱتَّخَذۡتُمۡ ءَایَـٰتِ ٱللَّهِ هُزُوࣰا وَغَرَّتۡكُمُ ٱلۡحَیَوٰةُ ٱلدُّنۡیَاۚ فَٱلۡیَوۡمَ لَا یُخۡرَجُونَ مِنۡهَا وَلَا هُمۡ یُسۡتَعۡتَبُونَ

    ज़ा विश्वास बेअन्नाकुमु इत्तख़ज़ुम आयात अल्लाह हुज़ुआन वग़र्रतकुम अल-हयातु फ़ल्यौम युखरजून मिन्हा हुम युस्तातबून

    ये इस सबब से कि तुम लोगों ने ख़ुदा की आयतों को हँसी ठट्ठा बना रखा था और दुनयावी ज़िन्दगी ने तुमको धोखे में डाल दिया था ग़रज़ ये लोग न तो आज दुनिया से निकाले जाएँगे और न उनको इसका मौका दिया जाएगा कि (तौबा करके ख़ुदा को) राज़ी कर ले

  36. 36 فَلِلَّهِ ٱلۡحَمۡدُ رَبِّ ٱلسَّمَـٰوَ ٰ⁠تِ وَرَبِّ ٱلۡأَرۡضِ رَبِّ ٱلۡعَـٰلَمِینَ

    फा लिल्लाहि रब्बी अस-समावा विश्वास ते वरबि अल-अर्द रब्बी अल-आलमीन

    पस सब तारीफ ख़ुदा ही के लिए सज़ावार है जो सारे आसमान का मालिक और ज़मीन का मालिक (ग़रज़) सारे जहॉन का मालिक है

  37. 37 وَلَهُ ٱلۡكِبۡرِیَاۤءُ فِی ٱلسَّمَـٰوَ ٰ⁠تِ وَٱلۡأَرۡضِۖ وَهُوَ ٱلۡعَزِیزُ ٱلۡحَكِیمُ

    वल्लाहु अल-किब्रिया फ़े अस-समावा विश्वास ते वहुव अल-अज़ीज़ अल-हकीम

    और सारे आसमान व ज़मीन में उसके लिए बड़ाई है और वही (सब पर) ग़ालिब हिकमत वाला है

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