Al-Fath
अल-फत्ह
विजय
بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَـٰنِ ٱلرَّحِیمِ
बिस्मि अल्लाह अर-रहमान अर-रहीम
- 1 إِنَّا فَتَحۡنَا لَكَ فَتۡحࣰا مُّبِینࣰا
फ़तहना लका फ़त्हान मुबीनेन
(ऐ रसूल) ये हुबैदिया की सुलह नहीं बल्कि हमने हक़ीक़तन तुमको खुल्लम खुल्ला फतेह अता की
- 2 لِّیَغۡفِرَ لَكَ ٱللَّهُ مَا تَقَدَّمَ مِن ذَنۢبِكَ وَمَا تَأَخَّرَ وَیُتِمَّ نِعۡمَتَهُۥ عَلَیۡكَ وَیَهۡدِیَكَ صِرَ ٰطࣰا مُّسۡتَقِیمࣰا
लियग़फिर लका अल्लाह तक़द्दमा मिन ज़न्बिका वमा ता'अख़्ख़र वयुतम्मा निअमतहु अलैक वह्दियक सिरा विश्वास ता मुस्तक़ीमेन
ताकि ख़ुदा तुम्हारी उम्मत के अगले और पिछले गुनाह माफ़ कर दे और तुम पर अपनी नेअमत पूरी करे और तुम्हें सीधी राह पर साबित क़दम रखे
- 3 وَیَنصُرَكَ ٱللَّهُ نَصۡرًا عَزِیزًا
वा यंसुरका अल्लाह नस्रन अज़ीज़ां
और ख़ुदा तुम्हारी ज़बरदस्त मदद करे
- 4 هُوَ ٱلَّذِیۤ أَنزَلَ ٱلسَّكِینَةَ فِی قُلُوبِ ٱلۡمُؤۡمِنِینَ لِیَزۡدَادُوۤا۟ إِیمَـٰنࣰا مَّعَ إِیمَـٰنِهِمۡۗ وَلِلَّهِ جُنُودُ ٱلسَّمَـٰوَ ٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلِیمًا حَكِیمࣰا
हुव अंज़ल अस-सकीनह फ़े क़ुलूबि अल-मु'मिनीन लेयज़दादुआ ईमान माअ ईमानिहिम वलिल्लाह जुनुदु अस-समावा विश्वास ते वा काना अल्लाह अलीमान हकीमन
वह (वही) ख़ुदा तो है जिसने मोमिनीन के दिलों में तसल्ली नाज़िल फरमाई ताकि अपने (पहले) ईमान के साथ और ईमान को बढ़ाएँ और सारे आसमान व ज़मीन के लशकर तो ख़ुदा ही के हैं और ख़ुदा बड़ा वाक़िफकार हकीम है
- 5 لِّیُدۡخِلَ ٱلۡمُؤۡمِنِینَ وَٱلۡمُؤۡمِنَـٰتِ جَنَّـٰتࣲ تَجۡرِی مِن تَحۡتِهَا ٱلۡأَنۡهَـٰرُ خَـٰلِدِینَ فِیهَا وَیُكَفِّرَ عَنۡهُمۡ سَیِّـَٔاتِهِمۡۚ وَكَانَ ذَ ٰلِكَ عِندَ ٱللَّهِ فَوۡزًا عَظِیمࣰا
लियुधखिल अल-मु'मिनीन वल मु'मिनात तजरी मिन तहतिहा अल-अन्हारु ख़ालिदीन फ़िहा वयुकफ्फिर अन्हुम सैय्यिआतिहिम वा काना ज़ा विश्वास लेका एंदा अल्लाह फौज़न अज़ीम
ताकि मोमिन मर्द और मोमिना औरतों को (बेहिश्त) के बाग़ों में जा पहुँचाए जिनके नीचे नहरें जारी हैं और ये वहाँ हमेशा रहेंगे और उनके गुनाहों को उनसे दूर कर दे और ये ख़ुदा के नज़दीक बड़ी कामयाबी है
- 6 وَیُعَذِّبَ ٱلۡمُنَـٰفِقِینَ وَٱلۡمُنَـٰفِقَـٰتِ وَٱلۡمُشۡرِكِینَ وَٱلۡمُشۡرِكَـٰتِ ٱلظَّاۤنِّینَ بِٱللَّهِ ظَنَّ ٱلسَّوۡءِۚ عَلَیۡهِمۡ دَاۤىِٕرَةُ ٱلسَّوۡءِۖ وَغَضِبَ ٱللَّهُ عَلَیۡهِمۡ وَلَعَنَهُمۡ وَأَعَدَّ لَهُمۡ جَهَنَّمَۖ وَسَاۤءَتۡ مَصِیرࣰا
व युअज़्ज़िब अल मुनाफ़िक़ीन वल्मुनाफिकात वल मुश्रिकीना वल मुश्रिकात अल-ज़न्नीन बिल्लाही ज़न्ना अस-सौई अलैहिम दाइरा वग़दिब अल्लाह अलैहिम वलआनहुम वा अद्द लाहुम वसाअत मसीरन
और मुनाफिक़ मर्द और मुनाफ़िक़ औरतों और मुशरिक मर्द और मुशरिक औरतों पर जो ख़ुदा के हक़ में बुरे बुरे ख्याल रखते हैं अज़ाब नाज़िल करे उन पर (मुसीबत की) बड़ी गर्दिश है (और ख़ुदा) उन पर ग़ज़बनाक है और उसने उस पर लानत की है और उनके लिए जहन्नुम को तैयार कर रखा है और वह (क्या) बुरी जगह है
- 7 وَلِلَّهِ جُنُودُ ٱلسَّمَـٰوَ ٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَزِیزًا حَكِیمًا
वलिल्लाह जुनुदु अस-समावा विश्वास ते वा काना अल्लाह अज़ीज़ां हकीमान
और सारे आसमान व ज़मीन के लश्कर ख़ुदा ही के हैं और ख़ुदा तो बड़ा वाक़िफ़कार (और) ग़ालिब है
- 8 إِنَّاۤ أَرۡسَلۡنَـٰكَ شَـٰهِدࣰا وَمُبَشِّرࣰا وَنَذِیرࣰا
इन्ना अरसलनाका शाहिदान वमुबश्शिरन् वनज़ीरन
(ऐ रसूल) हमने तुमको (तमाम आलम का) गवाह और ख़ुशख़बरी देने वाला और धमकी देने वाला (पैग़म्बर बनाकर) भेजा
- 9 لِّتُؤۡمِنُوا۟ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ وَتُعَزِّرُوهُ وَتُوَقِّرُوهُۚ وَتُسَبِّحُوهُ بُكۡرَةࣰ وَأَصِیلًا
लितुमिनुआ बिल्लाही वेरासुलिहि और उसकी सहायता करो वा तुवक़्क़िरूहु वा तुसब्बिहुहु बुक्रा वा-सीलान
ताकि (मुसलमानों) तुम लोग ख़ुदा और उसके रसूल पर ईमान लाओ और उसकी मदद करो और उसको बुज़ुर्ग़ समझो और सुबह और शाम उसी की तस्बीह करो
- 10 إِنَّ ٱلَّذِینَ یُبَایِعُونَكَ إِنَّمَا یُبَایِعُونَ ٱللَّهَ یَدُ ٱللَّهِ فَوۡقَ أَیۡدِیهِمۡۚ فَمَن نَّكَثَ فَإِنَّمَا یَنكُثُ عَلَىٰ نَفۡسِهِۦۖ وَمَنۡ أَوۡفَىٰ بِمَا عَـٰهَدَ عَلَیۡهُ ٱللَّهَ فَسَیُؤۡتِیهِ أَجۡرًا عَظِیمࣰا
इन्ना अल्लाज़ीना युबाइउनक यूबायउना अल्लाह यादु अल्लाह फ़ौक़ फ़मान नक़त फाइन्नामा यानकुथु अला औफा बिमा अहद अलैहु अल्लाह फसयुतिहि अजरान अज़ीम
बेशक जो लोग तुमसे बैयत करते हैं वह ख़ुदा ही से बैयत करते हैं ख़ुदा की क़ूवत (कुदरत तो बस सबकी कूवत पर) ग़ालिब है तो जो अहद को तोड़ेगा तो अपने अपने नुक़सान के लिए अहद तोड़ता है और जिसने उस बात को जिसका उसने ख़ुदा से अहद किया है पूरा किया तो उसको अनक़रीब ही अज्रे अज़ीम अता फ़रमाएगा
- 11 سَیَقُولُ لَكَ ٱلۡمُخَلَّفُونَ مِنَ ٱلۡأَعۡرَابِ شَغَلَتۡنَاۤ أَمۡوَ ٰلُنَا وَأَهۡلُونَا فَٱسۡتَغۡفِرۡ لَنَاۚ یَقُولُونَ بِأَلۡسِنَتِهِم مَّا لَیۡسَ فِی قُلُوبِهِمۡۚ قُلۡ فَمَن یَمۡلِكُ لَكُم مِّنَ ٱللَّهِ شَیۡـًٔا إِنۡ أَرَادَ بِكُمۡ ضَرًّا أَوۡ أَرَادَ بِكُمۡ نَفۡعَۢاۚ بَلۡ كَانَ ٱللَّهُ بِمَا تَعۡمَلُونَ خَبِیرَۢا
सयाक़ुलु लका अल-मुखल्लफून मिन अल-आराबी शग़लत्ना अम्वा विश्वास लूना वा अह्लूना फ़सतग़फ़िर याक़ुलून बेअल्सिनेतिहिम मा लैस फ़े क़ुल फ़मान यम्लिकु मिन अल्लाह शैअन अरादा बेकुम ज़र्रान औ अरादा बेकुम नफ़अन काना अल्लाह बिमा तामलून ख़बीरा
जो गंवार देहाती (हुदैबिया से) पीछे रह गए अब वह तुमसे कहेंगे कि हमको हमारे माल और लड़के वालों ने रोक रखा तो आप हमारे वास्ते (ख़ुदा से) मग़फिरत की दुआ माँगें ये लोग अपनी ज़बान से ऐसी बातें कहते हैं जो उनके दिल में नहीं (ऐ रसूल) तुम कह दो कि अगर ख़ुदा तुम लोगों को नुक़सान पहुँचाना चाहे या तुम्हें फायदा पहुँचाने का इरादा करे तो ख़ुदा के मुक़ाबले में तुम्हारे लिए किसका बस चल सकता है बल्कि जो कुछ तुम करते हो ख़ुदा उससे ख़ूब वाक़िफ है
- 12 بَلۡ ظَنَنتُمۡ أَن لَّن یَنقَلِبَ ٱلرَّسُولُ وَٱلۡمُؤۡمِنُونَ إِلَىٰۤ أَهۡلِیهِمۡ أَبَدࣰا وَزُیِّنَ ذَ ٰلِكَ فِی قُلُوبِكُمۡ وَظَنَنتُمۡ ظَنَّ ٱلسَّوۡءِ وَكُنتُمۡ قَوۡمَۢا بُورࣰا
ज़ननतुम अन लान यान्क़लिब अर-रसूलु वल्मुमिनून अह्लिहिम वज़ूयिना ज़ा विश्वास लेका फ़े क़ुलूबिकुम वज़नंतुम ज़न्ना वा कुंतुम कौमा बुरा
(ये फ़क़त तुम्हारे हीले हैं) बात ये है कि तुम ये समझे बैठे थे कि रसूल और मोमिनीन हरगिज़ कभी अपने लड़के वालों में पलट कर आने ही के नहीं (और सब मार डाले जाएँगे) और यही बात तुम्हारे दिलों में भी खप गयी थी और इसी वजह से, तुम तरह तरह की बदगुमानियाँ करने लगे थे और (आख़िरकार) तुम लोग आप बरबाद हुए
- 13 وَمَن لَّمۡ یُؤۡمِنۢ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ فَإِنَّاۤ أَعۡتَدۡنَا لِلۡكَـٰفِرِینَ سَعِیرࣰا
वमन लम यूमिन बिल्लाही वेरासुलिहि फे इन्ना अ'तेदना लिल काफिरीन सईरान
और जो शख़्श ख़ुदा और उसके रसूल पर ईमान न लाए तो हमने (ऐसे) काफ़िरों के लिए जहन्नुम की आग तैयार कर रखी है
- 14 وَلِلَّهِ مُلۡكُ ٱلسَّمَـٰوَ ٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۚ یَغۡفِرُ لِمَن یَشَاۤءُ وَیُعَذِّبُ مَن یَشَاۤءُۚ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورࣰا رَّحِیمࣰا
वलिल्लाह मुल्क अस-समावा विश्वास ते यग़फ़िरु यशा वा युअज़्ज़िबु मैन वा काना अल्लाह ग़फ़ूरन रहीमन
और सारे आसमान व ज़मीन की बादशाहत ख़ुदा ही की है जिसे चाहे बख्श दे और जिसे चाहे सज़ा दे और ख़ुदा तो बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
- 15 سَیَقُولُ ٱلۡمُخَلَّفُونَ إِذَا ٱنطَلَقۡتُمۡ إِلَىٰ مَغَانِمَ لِتَأۡخُذُوهَا ذَرُونَا نَتَّبِعۡكُمۡۖ یُرِیدُونَ أَن یُبَدِّلُوا۟ كَلَـٰمَ ٱللَّهِۚ قُل لَّن تَتَّبِعُونَا كَذَ ٰلِكُمۡ قَالَ ٱللَّهُ مِن قَبۡلُۖ فَسَیَقُولُونَ بَلۡ تَحۡسُدُونَنَاۚ بَلۡ كَانُوا۟ لَا یَفۡقَهُونَ إِلَّا قَلِیلࣰا
सयाक़ुलु अल-मुखल्लफून इज़ा इंतालक़्तुम इला मग़ानिम ले ता अख़ुज़ुहा ज़ारोना नत्ताबिउकुम युरीदूना अन युबद्दिलू कलाम लान तत्तबिऊना कज़ा विश्वास लेकुम क़ाला अल्लाह मिन फसयकूलून तहसूदूना कानू यफ़क़हूना इल्ला कलीलान
(मुसलमानों) अब जो तुम (ख़ैबर की) ग़नीमतों के लेने को जाने लगोगे तो जो लोग (हुदैबिया से) पीछे रह गये थे तुम से कहेंगे कि हमें भी अपने साथ चलने दो ये चाहते हैं कि ख़ुदा के क़ौल को बदल दें तुम (साफ) कह दो कि तुम हरगिज़ हमारे साथ नहीं चलने पाओगे ख़ुदा ने पहले ही से ऐसा फ़रमा दिया है तो ये लोग कहेंगे कि तुम लोग तो हमसे हसद रखते हो (ख़ुदा ऐसा क्या कहेगा) बात ये है कि ये लोग बहुत ही कम समझते हैं
- 16 قُل لِّلۡمُخَلَّفِینَ مِنَ ٱلۡأَعۡرَابِ سَتُدۡعَوۡنَ إِلَىٰ قَوۡمٍ أُو۟لِی بَأۡسࣲ شَدِیدࣲ تُقَـٰتِلُونَهُمۡ أَوۡ یُسۡلِمُونَۖ فَإِن تُطِیعُوا۟ یُؤۡتِكُمُ ٱللَّهُ أَجۡرًا حَسَنࣰاۖ وَإِن تَتَوَلَّوۡا۟ كَمَا تَوَلَّیۡتُم مِّن قَبۡلُ یُعَذِّبۡكُمۡ عَذَابًا أَلِیمࣰا
लिल मुखल्लाफ़िना मिन अल-आराबी सतुदऔन इला क़ौम उली तु-का-ति-लु-नाहुम औ युस्लिमूना फा-इन तुतीउ यूतिकुम अल्लाह अजरान वा-इन ततावल्ला मिन क़ब्लु युअज़्ज़िब अज़ाबाँ अलीम
कि जो गवॉर पीछे रह गए थे उनसे कह दो कि अनक़रीब ही तुम सख्त जंगजू क़ौम के (साथ लड़ने के लिए) बुलाए जाओगे कि तुम (या तो) उनसे लड़ते ही रहोगे या मुसलमान ही हो जाएँगे पस अगर तुम (ख़ुदा का) हुक्म मानोगे तो ख़ुदा तुमको अच्छा बदला देगा और अगर तुमने जिस तरह पहली दफा सरताबी की थी अब भी सरताबी करोगे तो वह तुमको दर्दनाक अज़ाब की सज़ा देगा
- 17 لَّیۡسَ عَلَى ٱلۡأَعۡمَىٰ حَرَجࣱ وَلَا عَلَى ٱلۡأَعۡرَجِ حَرَجࣱ وَلَا عَلَى ٱلۡمَرِیضِ حَرَجࣱۗ وَمَن یُطِعِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ یُدۡخِلۡهُ جَنَّـٰتࣲ تَجۡرِی مِن تَحۡتِهَا ٱلۡأَنۡهَـٰرُۖ وَمَن یَتَوَلَّ یُعَذِّبۡهُ عَذَابًا أَلِیمࣰا
लैस अलै अल-आ'मा हरज अलै अल-आ'रजी हरज अलै अलमरीज़ वमन यू-टी अल्लाह वरसुलहु युद्खिल्हु तजरी मिन तहतिहा वमन यतवल्ला युअज़्ज़िबुहु अज़ाबाँ अलीम
(जेहाद से पीछे रह जाने का) न तो अन्धे ही पर कुछ गुनाह है और न लँगड़े पर गुनाह है और न बीमार पर गुनाह है और जो शख़्श ख़ुदा और उसके रसूल का हुक्म मानेगा तो वह उसको (बेहिश्त के) उन सदाबहार बाग़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें जारी होंगी और जो सरताबी करेगा वह उसको दर्दनाक अज़ाब की सज़ा देगा
- 18 ۞ لَّقَدۡ رَضِیَ ٱللَّهُ عَنِ ٱلۡمُؤۡمِنِینَ إِذۡ یُبَایِعُونَكَ تَحۡتَ ٱلشَّجَرَةِ فَعَلِمَ مَا فِی قُلُوبِهِمۡ فَأَنزَلَ ٱلسَّكِینَةَ عَلَیۡهِمۡ وَأَثَـٰبَهُمۡ فَتۡحࣰا قَرِیبࣰا
लाकद रिज़िया अल्लाह अने अल-मु'मिनीन इज़् युबाइउनक तहता अश-शजरा फ़ालम फ़े फा-अंज़ला अस-सकीनह अलैहिम वा असाबहुम फ़त्हान क़रीबन
जिस वक्त मोमिनीन तुमसे दरख्त के नीचे (लड़ने मरने) की बैयत कर रहे थे तो ख़ुदा उनसे इस (बात पर) ज़रूर ख़ुश हुआ ग़रज़ जो कुछ उनके दिलों में था ख़ुदा ने उसे देख लिया फिर उन पर तस्सली नाज़िल फरमाई और उन्हें उसके एवज़ में बहुत जल्द फ़तेह इनायत की
- 19 وَمَغَانِمَ كَثِیرَةࣰ یَأۡخُذُونَهَاۗ وَكَانَ ٱللَّهُ عَزِیزًا حَكِیمࣰا
वमग़ानिम या'ख़ुज़ूनहा वा काना अल्लाह अज़ीज़ां हकीमन
और (इसके अलावा) बहुत सी ग़नीमतें (भी) जो उन्होने हासिल की (अता फरमाई) और ख़ुदा तो ग़ालिब (और) हिकमत वाला है
- 20 وَعَدَكُمُ ٱللَّهُ مَغَانِمَ كَثِیرَةࣰ تَأۡخُذُونَهَا فَعَجَّلَ لَكُمۡ هَـٰذِهِۦ وَكَفَّ أَیۡدِیَ ٱلنَّاسِ عَنكُمۡ وَلِتَكُونَ ءَایَةࣰ لِّلۡمُؤۡمِنِینَ وَیَهۡدِیَكُمۡ صِرَ ٰطࣰا مُّسۡتَقِیمࣰا
वअदकुमु अल्लाह मग़ानिम ता'खुज़ूनाहा फज्जला लकुम हाज़िही व कफ़्फा ऐदिया अन्नास अनकुम वले-त-कू-ना आयत लिल मु'मिनीन वयह्दीकुम सिरा विश्वास ता मुस्तक़ीमेन
ख़ुदा ने तुमसे बहुत सी ग़नीमतों का वायदा फरमाया था कि तुम उन पर काबिज़ हो गए तो उसने तुम्हें ये (ख़ैबर की ग़नीमत) जल्दी से दिलवा दीं और (हुबैदिया से) लोगों की दराज़ी को तुमसे रोक दिया और ग़रज़ ये थी कि मोमिनीन के लिए (क़ुदरत) का नमूना हो और ख़ुदा तुमको सीधी राह पर ले चले
- 21 وَأُخۡرَىٰ لَمۡ تَقۡدِرُوا۟ عَلَیۡهَا قَدۡ أَحَاطَ ٱللَّهُ بِهَاۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَیۡءࣲ قَدِیرࣰا
वा उख़्रा लम तक़दिरु अलय्हा क़द अहात अल्लाह वा काना अल्लाह अला कुल्लि शै कदीरान
और दूसरी (ग़नीमतें भी दी) जिन पर तुम क़ुदरत नहीं रखते थे (और) ख़ुदा ही उन पर हावी था और ख़ुदा तो हर चीज़ पर क़ादिर है
- 22 وَلَوۡ قَـٰتَلَكُمُ ٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ لَوَلَّوُا۟ ٱلۡأَدۡبَـٰرَ ثُمَّ لَا یَجِدُونَ وَلِیࣰّا وَلَا نَصِیرࣰا
वलाउ क़ातलकुमु अल्लाज़ीना कफ़रू लवल्लव अल-अदबार सुम्म यजदोन वलिय्यन नसीर
(और) अगर कुफ्फ़ार तुमसे लड़ते तो ज़रूर पीठ फेर कर भाग जाते फिर वह न (अपना) किसी को सरपरस्त ही पाते न मददगार
- 23 سُنَّةَ ٱللَّهِ ٱلَّتِی قَدۡ خَلَتۡ مِن قَبۡلُۖ وَلَن تَجِدَ لِسُنَّةِ ٱللَّهِ تَبۡدِیلࣰا
सुन्नत अल्लाह अल-लाती क़द ख़लत मिन वेलन तज्द लेसुन्नति अल्लाह तबदीलन
यही ख़ुदा की आदत है जो पहले ही से चली आती है और तुम ख़ुदा की आदत को बदलते न देखोगे
- 24 وَهُوَ ٱلَّذِی كَفَّ أَیۡدِیَهُمۡ عَنكُمۡ وَأَیۡدِیَكُمۡ عَنۡهُم بِبَطۡنِ مَكَّةَ مِنۢ بَعۡدِ أَنۡ أَظۡفَرَكُمۡ عَلَیۡهِمۡۚ وَكَانَ ٱللَّهُ بِمَا تَعۡمَلُونَ بَصِیرًا
वहुव अल्लाज़ी कफ़ ऐदियहुम अनकुम वा इदीकुम बिबत्नि मक्का बादि अज़्फ़ारकुम वा काना अल्लाह बिमा तामलून बसीरान
और वह वही तो है जिसने तुमको उन कुफ्फ़ार पर फ़तेह देने के बाद मक्के की सरहद पर उनके हाथ तुमसे और तुम्हारे हाथ उनसे रोक दिए और तुम लोग जो कुछ भी करते थे ख़ुदा उसे देख रहा था
- 25 هُمُ ٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ وَصَدُّوكُمۡ عَنِ ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِ وَٱلۡهَدۡیَ مَعۡكُوفًا أَن یَبۡلُغَ مَحِلَّهُۥۚ وَلَوۡلَا رِجَالࣱ مُّؤۡمِنُونَ وَنِسَاۤءࣱ مُّؤۡمِنَـٰتࣱ لَّمۡ تَعۡلَمُوهُمۡ أَن تَطَـُٔوهُمۡ فَتُصِیبَكُم مِّنۡهُم مَّعَرَّةُۢ بِغَیۡرِ عِلۡمࣲۖ لِّیُدۡخِلَ ٱللَّهُ فِی رَحۡمَتِهِۦ مَن یَشَاۤءُۚ لَوۡ تَزَیَّلُوا۟ لَعَذَّبۡنَا ٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ مِنۡهُمۡ عَذَابًا أَلِیمًا
हम अल्लाज़ीना कफ़रू वसद्दूकुम अने अल-मस्जिद अल-हराम वल्हदया माकुफ़ान अन याब्लुग़ माहिल्लाहु रेजाल मुअ्मिनून वेनेसा लम ताअलमुहुम अन तथौहुम फ़तुसियाबकुम माअर्रा बेग़ैर इल्मि लियुधखिल अल्लाह फ़े मैन लौ तज़य्यलू लाअज़ाब्ना अल्लाज़ीना कफ़रू मिन्हुम अज़ाबाँ अलीमा
ये वही लोग तो हैं जिन्होने कुफ़्र किया और तुमको मस्जिदुल हराम (में जाने) से रोका और क़ुरबानी के जानवरों को भी (न आने दिया) कि वह अपनी (मुक़र्रर) जगह (में) पहुँचने से रूके रहे और अगर कुछ ऐसे ईमानदार मर्द और ईमानदार औरतें न होती जिनसे तुम वाक़िफ न थे कि तुम उनको (लड़ाई में कुफ्फ़ार के साथ) पामाल कर डालते पस तुमको उनकी तरफ से बेख़बरी में नुकसान पहँच जाता (तो उसी वक्त तुमको फतेह हुई मगर ताख़ीर) इसलिए (हुई) कि ख़ुदा जिसे चाहे अपनी रहमत में दाख़िल करे और अगर वह (ईमानदार कुफ्फ़ार से) अलग हो जाते तो उनमें से जो लोग काफ़िर थे हम उन्हें दर्दनाक अज़ाब की ज़रूर सज़ा देते
- 26 إِذۡ جَعَلَ ٱلَّذِینَ كَفَرُوا۟ فِی قُلُوبِهِمُ ٱلۡحَمِیَّةَ حَمِیَّةَ ٱلۡجَـٰهِلِیَّةِ فَأَنزَلَ ٱللَّهُ سَكِینَتَهُۥ عَلَىٰ رَسُولِهِۦ وَعَلَى ٱلۡمُؤۡمِنِینَ وَأَلۡزَمَهُمۡ كَلِمَةَ ٱلتَّقۡوَىٰ وَكَانُوۤا۟ أَحَقَّ بِهَا وَأَهۡلَهَاۚ وَكَانَ ٱللَّهُ بِكُلِّ شَیۡءٍ عَلِیمࣰا
इज़् जाला अल्लाज़ीना कफ़रू फ़े क़ुलूबिहिमु अल-हमिय्यत हमिय्यत अल जाहिलिय्याह फा-अंज़ला अल्लाह सकीनतहु अला रसूलिहि व अला अल-मु'मिनीन वा अल्ज़म्हुम कलिमा अत-तक़्वा अहक्क बेहा वा अह्लाहा वा काना अल्लाह बिकुल्लि शै अलीमन
(ये वह वक्त) था जब काफ़िरों ने अपने दिलों में ज़िद ठान ली थी और ज़िद भी तो जाहिलियत की सी तो ख़ुदा ने अपने रसूल और मोमिनीन (के दिलों) पर अपनी तरफ़ से तसकीन नाज़िल फ़रमाई और उनको परहेज़गारी की बात पर क़ायम रखा और ये लोग उसी के सज़ावार और अहल भी थे और ख़ुदा तो हर चीज़ से ख़बरदार है
- 27 لَّقَدۡ صَدَقَ ٱللَّهُ رَسُولَهُ ٱلرُّءۡیَا بِٱلۡحَقِّۖ لَتَدۡخُلُنَّ ٱلۡمَسۡجِدَ ٱلۡحَرَامَ إِن شَاۤءَ ٱللَّهُ ءَامِنِینَ مُحَلِّقِینَ رُءُوسَكُمۡ وَمُقَصِّرِینَ لَا تَخَافُونَۖ فَعَلِمَ مَا لَمۡ تَعۡلَمُوا۟ فَجَعَلَ مِن دُونِ ذَ ٰلِكَ فَتۡحࣰا قَرِیبًا
लाकद सदक़ अल्लाह अर-रूया लताधुलुन्न अल-मस्जिद अल-हराम इन शा अल्लाह आमिनिना मुहल्लिकीना रुउसकुम वमुकस्सिरिन तख़ाफूना फ़ालम लम तालमु फजला मिन दूने ज़ा विश्वास लेका फ़त्हान क़रीबन
बेशक ख़ुदा ने अपने रसूल को सच्चा मुताबिके वाक़ेया ख्वाब दिखाया था कि तुम लोग इन्शाअल्लाह मस्जिदुल हराम में अपने सर मुँडवा कर और अपने थोड़े से बाल कतरवा कर बहुत अमन व इत्मेनान से दाख़िल होंगे (और) किसी तरह का ख़ौफ न करोगे तो जो बात तुम नहीं जानते थे उसको मालूम थी तो उसने फ़तेह मक्का से पहले ही बहुत जल्द फतेह अता की
- 28 هُوَ ٱلَّذِیۤ أَرۡسَلَ رَسُولَهُۥ بِٱلۡهُدَىٰ وَدِینِ ٱلۡحَقِّ لِیُظۡهِرَهُۥ عَلَى ٱلدِّینِ كُلِّهِۦۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ شَهِیدࣰا
हुव अरसल रसूलुहु बिल हुदा वेदिने अल-हक़्क़ी लेयुज़्हिरहु अलै अद-दीन व कफ़ा बिल्लाही शहीदन
वह वही तो है जिसने अपने रसूल को हिदायत और सच्चा दीन देकर भेजा ताकि उसको तमाम दीनों पर ग़ालिब रखे और गवाही के लिए तो बस ख़ुदा ही काफ़ी है
- 29 مُّحَمَّدࣱ رَّسُولُ ٱللَّهِۚ وَٱلَّذِینَ مَعَهُۥۤ أَشِدَّاۤءُ عَلَى ٱلۡكُفَّارِ رُحَمَاۤءُ بَیۡنَهُمۡۖ تَرَىٰهُمۡ رُكَّعࣰا سُجَّدࣰا یَبۡتَغُونَ فَضۡلࣰا مِّنَ ٱللَّهِ وَرِضۡوَ ٰنࣰاۖ سِیمَاهُمۡ فِی وُجُوهِهِم مِّنۡ أَثَرِ ٱلسُّجُودِۚ ذَ ٰلِكَ مَثَلُهُمۡ فِی ٱلتَّوۡرَىٰةِۚ وَمَثَلُهُمۡ فِی ٱلۡإِنجِیلِ كَزَرۡعٍ أَخۡرَجَ شَطۡـَٔهُۥ فَـَٔازَرَهُۥ فَٱسۡتَغۡلَظَ فَٱسۡتَوَىٰ عَلَىٰ سُوقِهِۦ یُعۡجِبُ ٱلزُّرَّاعَ لِیَغِیظَ بِهِمُ ٱلۡكُفَّارَۗ وَعَدَ ٱللَّهُ ٱلَّذِینَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ مِنۡهُم مَّغۡفِرَةࣰ وَأَجۡرًا عَظِیمَۢا
मुहम्मद रसूल वल्लाज़ीना अशिद्दाउ अलै अल-कुफ्फारि रुहामाउ तराहुम रुक्कान सुज्दा यब्तगून फ़ज़्लान मिन अल्लाह वरेज़ु विश्वास सेइमाहुम फ़े असर ज़ा विश्वास लेका मिसालुहुम फ़े वमसलुहुम फ़े अल-इंजील कज़रइन अख़रज शतहु फ़ज़रहुई फ़स्तग़्लज़ फ़स्तवा अला सुखेजी युजिबु अल्जुर्रा लेयाग़िज़ा बेहेमु वादा अल्लाह अल्लाज़ीना अमेनुआ वा अमिलू अस-सालिहाति वा अज्रान अज़ीम
मोहम्मद ख़ुदा के रसूल हैं और जो लोग उनके साथ हैं काफ़िरों पर बड़े सख्त और आपस में बड़े रहम दिल हैं तू उनको देखेगा (कि ख़ुदा के सामने) झुके सर बसजूद हैं ख़ुदा के फज़ल और उसकी ख़ुशनूदी के ख्वास्तगार हैं कसरते सुजूद के असर से उनकी पेशानियों में घट्टे पड़े हुए हैं यही औसाफ़ उनके तौरेत में भी हैं और यही हालात इंजील में (भी मज़कूर) हैं गोया एक खेती है जिसने (पहले ज़मीन से) अपनी सूई निकाली फिर (अजज़ा ज़मीन को गेज़ा बनाकर) उसी सूई को मज़बूत किया तो वह मोटी हुई फिर अपनी जड़ पर सीधी खड़ी हो गयी और अपनी ताज़गी से किसानों को ख़ुश करने लगी और इतनी जल्दी तरक्क़ी इसलिए दी ताकि उनके ज़रिए काफ़िरों का जी जलाएँ जो लोग ईमान लाए और अच्छे (अच्छे) काम करते रहे ख़ुदा ने उनसे बख़्शिस और अज्रे अज़ीम का वायदा किया है
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